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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 801, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 801

८१० | योगवाशिष्ठ ।

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जिस पुरुष ने आत्मविचार कर अपना चित्त अल्प भी निग्रह किया है वह सम्पूर्ण फल को प्राप्त होगा और उसी का जन्म सफल होगा । हे रामजी ! जिस चित्त में विचाररूपी कण का उदय हुआ है वह अभ्यास से बड़े विस्तार को पावेगा । हृदय में जो वैराग पूर्वक विचार उपजता है तो वह बढ़ता जाता है और अविद्या रूपी अवगुणों को काट डालेगा और सब शुभगुण आन उसमें आलय करेंगे—जैसे जल से पूर्ण हुए ताल का सब पक्षी आन आश्रय करते हैं । हे रामजी ! जिसको सम्यक्ज्ञान प्राप्त होता है और निर्मल बोध से यथादर्शन होता है उसको इन्द्रियाँ चला नहीं सकतीं । जबतक स्व-रूप का प्रमाद होता है तबतक आधि-व्याधि दुःख होते हैं और जब स्व-रूप में स्थित होती है तब शरीर और मन के दुःख वश नहीं कर सकते—जैसे बिजली को कोई ग्रहण नहीं कर सकता, तैसे पुष्टिकर मेघों को कोई पकड़ नहीं सकता, जैसे आकाश के चन्द्रमा को मुष्टि में कोई नहीं पकड़ सकता और मूढ़ ली चन्द्रमा को मोह नहीं सकती, तैसे ही ज्ञानवान् को कोई दुःख वश नहीं कर सकता । हे रामजी ! जो हाथी मद से मत्त है और जिसके मस्तक से मद झरता है और भँवरे उसके आगे शब्द करते हैं उसको मच्छरों के प्रहार और स्त्री के श्वास नहीं छेद सकते, तैसे ही ज्ञानवान् को विषयों के रागद्वेष नहीं चला सकते । जिस हाथी के मस्तक से मोती निकलता है ऐसे बलवान् हस्ती को नखों से विदारनेवाले सिंह को हरिण नहीं मार सकता, तैसे ही ज्ञानवान् को दुःख नहीं चला सकता जिसके फूत्कार से वन के वृक्ष जल जाते हैं ऐसे सर्प को दर्दुर नहीं ग्रास कर सकते, तैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष नहीं चला सकते । जैसे राज-सिंहासन पर बैठे राजा को तस्कर दुःख दे नहीं सकते तैसे ही जो ज्ञानी स्वरूप में स्थित है उसको इन्द्रियों के विषय दुःख नहीं दे सकते । जो विचार से रहित देहाभिमानी हैं और आत्मतत्त्व को नहीं प्राप्त हुए उनको विषय उड़ा ले जाते हैं—जैसे सूखे पत्र को पवन उड़ा ले जाता है—और ज्ञानवान् को नहीं चला सकते । जैसे पर्वत मन्द पवन से चलायमान नहीं होता, तैसे ही ज्ञानवान् सुख दुःख में चलायमान नहीं होता और