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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 792

उपशम प्रकरण ।

८०१

कारण नहीं होती क्योंकि मन में मन का सद्भाव नहीं होता है। जैसे नटुवा अभिमान से रहित अनेक प्रकार के स्वाँग धरता है तैसे ही वह अभिमान से रहित चेष्टा करता है और जैसे कुम्हार का चक्र भ्रमता भ्रमता तोड़ना से रहित हुआ शनैःशनैः स्थिर हो जाता है तैसे ही ज्ञानवान् का चित्त चेष्टा करता दृष्ट भी आता है परन्तु जन्म का कारण नहीं होता और प्रारब्धभोग समाप्त होता है तब स्वाभाविक ठहर जाता है। जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही राग से रहित ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती, देखने मात्र ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य होती है। जैसे भुना और कच्चा बीज एक समान भासता है परन्तु कच्चा उगता है और भुना नहीं उगता तैसे ही ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती क्योंकि उसका चित्त शान्त हो जाता है। हे रामजी! जिसकी चेष्टा अभिमान से रहित है वह जीवन्मुक्त कहाता है। उसका चित्त केवल चिन्मात्र को प्राप्त हुआ है और वह जब शरीर को त्यागता है तब अचित्तरूप चिदाकाश होता है। हे रामजी! चित्त के दो बीज हैं—एक प्राणों का फुरना और दूसरा वासना का फुरना। जब दोनों में एक का अभाव हो जाता है तब दोनों नष्ट हो जाते हैं—ये परस्पर कारणरूप हैं। जैसे ताल से मेघ जल पान करके फिर वर्षा से ताल को पुष्ट करता है सो परस्पर कारणरूप है, तैसे ही प्राणस्पन्द और वासना परस्पर कारणरूप हैं। जैसे बीज से अंकुर होते हैं और अंकुर से बीज होते हैं तैसे ही प्राणस्पन्द से वासना होती है और वासना से प्राणस्पन्द होता है। ये दोनों चित्त के कारण हैं। जैसे फूल बिना सुगन्ध नहीं और सुगन्ध बिना फूल नहीं होता तैसे ही वासना बिना प्राण नहीं होते और प्राण बिना वासना नहीं होती। हे रामजी! जब वासना फुरती है तब संवित् में क्षोभ होता है और वह प्राणों को जगाती है तब उससे जगत् उपजता है। जब हृदय में प्राणस्पन्द के धर्म होते हैं तब संवित् क्षोभवान् होता है और चित्त-रूपी बालक उपजता है। इस प्रकार वासना और प्राण दोनों चित्त के कारण हैं। जब दोनों में एक का नाश हो जावे तब दोनों नाश हो जावें और चित्त का भी नाश हो जावे। हे रामजी! चित्तरूपी एक वृक्ष

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