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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 793, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 793
८०२योगवासिष्ठ ।

है, सुखदुःखरूपी उसके स्कन्ध हैं, चिन्तारूपी फल है, कार्यरूपी पत्र हैं, वृत्तिरूपी बेल से वेष्टित हुआ है और रागद्वेषरूपी दो बगले उस पर आन बैठे हैं तृष्णारूपी काली सर्पिणी से वेष्टित है और इन्द्रियाँरूपी पक्षी उस पर आन बैठे हैं, इच्छादिक रोगों से पुष्ट होता है और अज्ञान इसका मूल है । जब अवासणारूपी खड्ग से शीघ्र ही काटा जाता है तब संसार की अभावना और स्वरूप की भावना से शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । जैसे तीक्ष्ण पवन से पका हुआ फल वृक्ष से शीघ्र ही गिर पड़ता है तैसे ही आत्मभाव से फल गिर पड़ता है । हे रामजी ! चित्तरूपी आँधी ने सब दिशा मलीन करके प्रकाश को घेर लिया है और तृष्णारूपी तृण उसमें उड़ते हैं। शरीररूपी स्तम्भाकार बायगोला अज्ञानरूपी कुण्ड से उपजा हुआ बड़े क्षोभ को प्राप्त करता है । जब हृदय में प्रकाश हो तब तम को दूर करे और जब स्पन्द रोकिये तब धूलि शान्त हो जाती है । आत्मविचार से जब वासना रहित हो तब शरीररूपी धुआँ शान्त हो जावे । हे रामजी ! प्राणों के रोकने से शान्ति होती है और वासना के न उदय होने से चित्त स्थिर हो जाता है । प्राणस्पन्द और वासना का बीज संवेदन है, जब शुद्ध संवित्मात्र से संवेदन को त्याग करे तब वासना और प्राण दोनों न फुरैं । जैसे वृक्ष का बीज और मूल काट डालिये तो फिर नहीं उगता, तैसे ही इनका मूल संवेदन है । जब संवेदन का अभाव हो तब दोनों नहीं बनते । संवेदन का बीज आत्मसत्ता है, संवित्सत्ता से संवेदन प्रकट हुआ है उससे भिन्न नहीं । जैसे तिलों में तेल के सिवा और कुछ नहीं होता तैसे ही संवित्सत्ता के सिवा हृदय में और कुछ नहीं पाया जाता-वही संकल्प द्वारा संवेदन को देखता है । जैसे स्वप्न में मनुष्य अपनी मृत्यु देखता है और देशान्तर को प्राप्त होता है तैसे ही आत्मसत्ता संवेदनरूप होती है अर्थात् चिन्मात्र संवित् में संवेदन का उत्थान होता है कि 'अहं अस्मि' तब संवेदन जगत्जाल दिखाती है । अपना ही संवेदन उठकर आपको भ्रम दिलाता है—जैसे बालक को अपने संकल्प से उपजा वैताल सत्य भासता है और जैसे स्थाणु में पुरुष भासता है तैसे ही संवित् में संवेदन भासता है । हे रामजी ! असम्पक्ज्ञान से संवेदनरूप हो जाता