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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 794

उपशम प्रकरण । ८०३

हैं तो उसमें आत्मबुद्धि होती है और सम्यक्ज्ञान से लीन हो जाता है । जैसे रस्सी में असम्यक्ज्ञान से सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में संवेदन भासता है । तीनों जगत् ब्रह्म संवित् रूप हैं, संवेदन भी कुछ भिन्न नहीं । जिनको यह निश्चय दृढ़ होता है उनको बुद्धेश्वर सम्यक्ज्ञानी कहते हैं । प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जो जगत् है उसमें वस्तुबुद्धि त्याग करने से भी संसार के पार होता है और जो अवस्तुरूप जानकर न त्यागेगा तो जगत् बड़े विस्तार को पावेगा । हे रामजी ! संवेदन का जो उत्थान होता है सो बड़े दुःखों का देनेवाला है और संवेदन जो जड़वत् अजड़ है वह परम सुख सम्पदा का कारण है सो उत्थान से रहित आनन्दस्वरूप है । जिसको संवेदन उत्थान से रहित असंवेदन संवित् आत्मा की बुद्धि हुई है वह संसारसमुद्र से पार होता है । रामजी ने पूछा, हे प्रभो ! जड़ता से रहित असंवेदन कैसे होता है और असंवेदन से जड़ता कैसे निवृत्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो सब ठौर में आसक्त नहीं होता और कहीं चित्त की वृत्ति नहीं लगती और जिसमें जीवत्व को कुछ ज्ञान न रहे वह असंवेदन जड़ता से रहित संवेदन स्पन्दरूप है जिससे दृश्य भासता है सो दृश्य की ओर से जड़ है और स्वरूप में चेतन है वह अजड़ कहलाता है । हे रामजी ! हृदयाकाश जो चेतन संवित् है उससे संवेदन का स्पर्श कुछ न हो ऐसा संवित् अजड़ है । देवता, नाग, दैत्य, राक्षस, हाथी, मनुष्य आदिक स्थावर जङ्गमरूप सब वही धारती है । हे रामजी ! अपनी चेष्टा से संवित् आपको आप ही बँधाती है । जैसे कुसवारी आप ही आपको गृह में बँधाती है तैसे ही संवित् आपको बँधाती है । जब अपनी ओर आती है तब आप ही आपको प्राप्त होती है । हे रामजी ! जगत् जाग्रत् रूपी समुद्र है उसमें संवित् रूपी जल है जिससे सब स्थान पूर्ण हो गये हैं । अन्तरिक्ष, पृथ्वी, आकाश, पर्वत, नदी आदिक सब संवित् रूपी जल की लहरें हैं इससे सब जगत् संवित् मात्र है और उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है । यह सम्यक्ज्ञान है । इस संवित् का बीज चिन्मात्र है उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है । यह सम्यक्ज्ञान है इस संवित् का बीज चिन्-मात्र है और चिन्मात्रसत्ता से संवित् उदय हुआ है—जैसे प्रकाश से ज्योति