योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उपशम प्रकरण । ८०३
हैं तो उसमें आत्मबुद्धि होती है और सम्यक्ज्ञान से लीन हो जाता है । जैसे रस्सी में असम्यक्ज्ञान से सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में संवेदन भासता है । तीनों जगत् ब्रह्म संवित् रूप हैं, संवेदन भी कुछ भिन्न नहीं । जिनको यह निश्चय दृढ़ होता है उनको बुद्धेश्वर सम्यक्ज्ञानी कहते हैं । प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जो जगत् है उसमें वस्तुबुद्धि त्याग करने से भी संसार के पार होता है और जो अवस्तुरूप जानकर न त्यागेगा तो जगत् बड़े विस्तार को पावेगा । हे रामजी ! संवेदन का जो उत्थान होता है सो बड़े दुःखों का देनेवाला है और संवेदन जो जड़वत् अजड़ है वह परम सुख सम्पदा का कारण है सो उत्थान से रहित आनन्दस्वरूप है । जिसको संवेदन उत्थान से रहित असंवेदन संवित् आत्मा की बुद्धि हुई है वह संसारसमुद्र से पार होता है । रामजी ने पूछा, हे प्रभो ! जड़ता से रहित असंवेदन कैसे होता है और असंवेदन से जड़ता कैसे निवृत्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो सब ठौर में आसक्त नहीं होता और कहीं चित्त की वृत्ति नहीं लगती और जिसमें जीवत्व को कुछ ज्ञान न रहे वह असंवेदन जड़ता से रहित संवेदन स्पन्दरूप है जिससे दृश्य भासता है सो दृश्य की ओर से जड़ है और स्वरूप में चेतन है वह अजड़ कहलाता है । हे रामजी ! हृदयाकाश जो चेतन संवित् है उससे संवेदन का स्पर्श कुछ न हो ऐसा संवित् अजड़ है । देवता, नाग, दैत्य, राक्षस, हाथी, मनुष्य आदिक स्थावर जङ्गमरूप सब वही धारती है । हे रामजी ! अपनी चेष्टा से संवित् आपको आप ही बँधाती है । जैसे कुसवारी आप ही आपको गृह में बँधाती है तैसे ही संवित् आपको बँधाती है । जब अपनी ओर आती है तब आप ही आपको प्राप्त होती है । हे रामजी ! जगत् जाग्रत् रूपी समुद्र है उसमें संवित् रूपी जल है जिससे सब स्थान पूर्ण हो गये हैं । अन्तरिक्ष, पृथ्वी, आकाश, पर्वत, नदी आदिक सब संवित् रूपी जल की लहरें हैं इससे सब जगत् संवित् मात्र है और उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है । यह सम्यक्ज्ञान है । इस संवित् का बीज चिन्मात्र है उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है । यह सम्यक्ज्ञान है इस संवित् का बीज चिन्-मात्र है और चिन्मात्रसत्ता से संवित् उदय हुआ है—जैसे प्रकाश से ज्योति
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उदय होती है । इस सत्ता के दो रूप हैं-एक रूप नाना प्रकार हो भासता है और दूसरा एक ही रूप है । घट, पट, तत्त्व आदिक एक सत्ता के नाना प्रकार विभाग स्थित हैं और विभाग से रहित एक सत्ता स्थित है-वह सत्तासमान अद्वैतरूप परमार्थ है । हे रामजी ! विषय को त्यागकर जो चिन्मात्र है वह अलेप एक रूप है सो ही महासत्ता है । उसको ज्ञानवान् परमसत्ता कहते हैं । नाना आकार भी वह सत्ता कभी नहीं धारती । यह संवेदन से हुए हैं इस कारण अवस्तुरूप हैं । एक रूप जो परम सत्ता निर्मल अविनाशी है वह न कभी नष्ट होता है और न विस्मरण होता है, क्योंकि अनुभवरूप है । हे रामजी ! एक कालसत्ता है और एक आकाशसत्ता है सो यह सत्ता अवस्तुरूप है। इस विभागसत्ता को त्यागकर चिन्मात्रसत्ता के परायण हो । कालसत्ता और आकाशसत्ता यद्यपि उत्तम है परन्तु वास्तव नहीं । जहाँ नाना विभागकल्पना, आकार और नाना कारण हैं वह पवित्रकर्त्ता पावन नहीं । इसी से कहा है कि आकाश काल आदिक सत्ता वास्तव नहीं और सत्तासमान जो संवित्मात्र है वह सबका बीज है उसी से सबकी प्रवृत्ति होती है । हे रामजी ! जो कुछ पदार्थ हैं उनकी कलना सत्तासमान में हुई है । उस अनन्त, अनादि बीजरूप परमपद का बीज और कोई नहीं । जब उसका भान हो तब यह निर्विकार होकर स्थित हो । जीवन्मुक्त उसी को कहते हैं जिसे दृश्य की भावना कुछ न फुरे । जैसे बालक मूक और अभिमान से रहित होता है तैसे ही ज्ञान से जीव निर्वासनिक हो तब जड़ता से मुक्त होता है और सर्व आत्मभाव को प्राप्त होता है । जिस संवित् में दृश्य का स्पर्श होता है वह संवित् जड़ है, क्योंकि शुद्धस्वरूप में मलीन का स्पर्श होता है। जो संवित् द्वैत फुरने से रहित है वह शुद्ध और अजड़ है और द्वैतभाव को ग्रहण करती है वह स्वरूप की ओर से जड़ है । हे रामजी ! जिसकी स्वरूप की ओर स्थित हुई है और दृश्यभाव का लेप नहीं होता है वह सर्ववासना को त्यागकर निर्विकल्प समाधि में लगता है । जैसे आकाश में नीलता स्वाभाविक वर्तती है तैसे ही योगी आनन्द में वर्तती है और निस्संवेदन संवित् में प्रविष्ट होकर वही रूप हो जाता है जिसके मन की
उपशम प्रकरण। ८०५
वृत्ति वहाँ स्थिर हो जाती है और बैठते, चलते, स्पर्श करते, सुगन्ध लेते, देखते, सुनते और सब इन्द्रियों की क्रिया करते भी मन स्थिर रहता है दृश्य का अभिमान नहीं फुरता वह अजड़ कहाता है और संवेदन से रहित सुखी होता है। हे रामजी ! ऐसी दृष्टि प्रथम तो कष्टरूप भासती है परन्तु पीछे सब दुःख का नाशकर्ता होती है, इससे इसी दृष्टि का आश्रय करके दुःखरूप जो संसारसमुद्र है उससे तर जाओ। जैसे वट का बीज सूक्ष्म होता है पर विस्तार को पाकर आकाश को स्पर्श करने लगता है तैसे ही सूक्ष्म संवेदन से जब संकल्प फैलता है तब वही बड़े जगत् के विस्तार को धारता है और जन्म के जाल को प्राप्त होता है। बीजरूप से आपही अपने को जन्मों में डालता और फिर फिर मोह में गिरता है। जब संवित् अपनी ओर होती है तब मोक्ष को प्राप्त होता है और जैसी भावना स्वरूप में दृढ होती है वही सिद्ध होती है। जैसे नटुआ अनेक स्वाँग को धारता है तैसे ही संवित् अनेक आकारों को धारती है। जब नट भूमिका को त्यागता है तब अपने स्वरूप में प्राप्त होता है। हे रामजी ! संवित्स्वरूप नटकी जगतरूप धारकर नृत्य करती है। जो दुःखरूप संसार-समुद्र में न गिरे सो सत्ता सब कारणों की कारण है और उसका कारण कोई नहीं और वही सब सारों का सार है उसका सार कोई नहीं। उसी चेतनरूपी बड़े दर्पण में समस्त जगत् प्रतिबिम्बित होता है। जैसे ताल में किनारे के वृक्ष प्रतिबिम्बित होते हैं तैसे ही सब वस्तु चिद्दर्पण में प्रतिबिम्बित होती है। हे रामजी! जो कुछ पदार्थ हैं वे सब आत्मसत्ता से सिद्ध होते हैं और उसी अनुभव में सबका अनुभव होता है। जैसे षड्रसों का स्वाद जिह्वा से सिद्ध होता तैसे ही सब पदार्थ चिदाकाश के आश्रय सिद्ध होते हैं। जगद्गण उसी से उपजते हैं, उसी में वर्तते और बढ़ते हैं, उसी में स्थित दिखते हैं और उसी में लय होते हैं। सबका अधिष्ठान वही सत्ता है और गुरु का गुरु, लघु की लघुता, स्थूल की स्थूलता, सूक्ष्म की सूक्ष्मता, द्रव्यों का द्रव्य, कष्टों में कष्ट, बड़े में बड़ाई, तेज का तेज, तम का तम, वस्तु की वस्तु, द्रष्टा का द्रष्टा, किंचन में किंचन, निष्किंचन में निष्किंचन, तत्त्वों का तत्त्व, असत्य का असत्य, सत्य का सत्य, आश्रय में आश्रय और
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अनाश्रम में अनाश्रम वही है। हे रामजी! ऐसी जो परमपावन सत्ता है उसमें प्रयत्न करके स्थित हो, फिर जैसे इच्छा हो तैसे करो। वह आत्मतत्त्व निर्मल, अजर, अमर, शान्तरूप और चित्त के क्षोभ से रहित है, उसमें भव (संसार) से मुक्ति के निमित्त स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे स्मृतिबीजविचारो नाम सप्तशीतितमस्सर्गः ॥८७॥
रामजी ने पूछा, हे महानन्द के देनेवाले! यह जो बीजों का बीज आपने कहा है सो किस प्रकार प्राप्त हो? जिस प्रकार उस पद की शीघ्र प्राप्ति हो वह उपाय कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इन सबके बीज का जो उत्तर दिया है उस उपाय से परमपद की प्राप्ति होती है। अब और भी जो तुमने पूछा है वह सुनो। सत्तासमान में स्थित होने के निमित्त यत्न कर्तव्य है। जो कुछ संसार की वासना है बल करके उसको त्याग करिये और शुद्ध आत्मा में तीव्र अभ्यास करिये तब शीघ्र ही अविघ्न आत्म-स्वरूप की प्राप्ति होगी। हे तत्त्ववेत्ता! उस पद में एक क्षण भी स्थित होगे तो अक्षयभाव को प्राप्त होगे। हे रामजी! सत्तासमान संवित्-मात्र तत्त्व है उसमें स्थित होके जो इच्छा हो सो करो तब उसके सिवा और कुछ सिद्ध न होगा—सब वही भासेगा। ऐसा जो अनुभवतत्त्व है वह तुम्हारा स्वरूप है उसके ध्यान में स्थित हुए तुमको कुछ खेद न होगा। संवेदन के साथ ऐसा ध्यान नहीं होता और वह ऊँचा पद है पुरुष प्रयत्न से उस पद को प्राप्त हो। हे रामजी! केवल संवेदन के साथ ध्यान नहीं होता क्योंकि सर्वत्रसम्भव संवित् तत्त्व है। संवित् सर्वदा सर्व-काल सहायक होती है और सबसे मिली हुई है जो कुछ चित्तवे जो इच्छित हो, जो कुछ करे सो सब संवित् से सिद्ध होता है। हे रामजी! आत्मतत्त्व प्रत्यक्ष है पर उसका भान नहीं होता और जो कुछ भासता है वही अविद्या आवरण है सो इसका दुःख होता है। स्वरूप के प्रसाद से जो दृश्य की वासना करता है उसकी दृढ़ता से अन्तःकरण दुःख पाता है। जब यत्न करके वासना का त्याग करिये तब मन और शरीर के दुःख सब नाश हो जायेंगे। पूर्व जो मोह दृढ़ हो रहा है—जैसे मेरु को मूल
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से उखाड़ना कठिन है तैसे ही वासना का त्याग कठिन है । वह वासना मन से होती है, जब तक मन क्षय नहीं होता तब तक वासना भी क्षय नहीं होती । तत्त्वज्ञान बिना मन का नाश नहीं होता । वासना और मन का आवरण एक साथ दूर होता है । यह परस्पर कारणरूप है । इससे हे रामजी ! तुम पुरुषप्रयत्न करके मन के संकल्प विकल्प को निवृत्त करो और अभ्यास और विचार करके विवेक का उपाय करो और भोगों की वासना दूर से त्यागो—इसी से तुम शान्तिमान होगे । इन तीनों के सम अभ्यास से तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय का बारम्बार अभ्यास करो । जबतक इनको न साधोगे तबतक अनेक उपायों से भी शान्ति को न प्राप्त होगे । हे रामजी ! वासना क्षय हो और मनोनाश और तत्त्वज्ञान से वासना क्षय न करे तो कार्य सिद्ध नहीं होता और जो मनोनाश करे और तत्त्वज्ञान से वासना क्षय न करे तब भी कल्याण न होगा और तत्त्वज्ञान का विचार करे और वासना क्षय न हो तो भी कुशल न होगी । जब इन तीनों का सम अभ्यास हो तब फल की प्राप्ति हो । हे रामजी ! एक के सेवन से सिद्धता नहीं प्राप्त होती—जैसे मन्त्र को कोई प्रतिबन्ध लय न करे तो मन्त्र फलदायक नहीं होता और एक-एक चरण पढ़े तो भी फलदायक नहीं होता जबतक सब मन्त्र संध्यादिक एक ठौर नहीं होते तबतक मन्त्र नहीं फुरते, तैसे ही अकेले से कार्य सिद्ध नहीं होता । जब चिरकाल इनको इकट्ठा सेवे तब कार्य हो । जैसे सेनासंयुक्त बड़ा शत्रु हो और उसके मारने को एक शूरमा जावे तो शत्रु को मार नहीं सकता और यदि इकट्ठे सेना पर जा पड़ें तब उसको जीत लेवें, तैसे ही संसाररूपी शत्रु के नाश के लिये जब तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय का इकट्ठा अभ्यास हो तब संसाररूपी शत्रु का नाश हो । हे रामजी ! जब तीनों का अभ्यास करोगे तब हृदय की 'अहं' 'मम' ग्रन्थि टूट पड़ेगी । अनेक जन्मों की संसारसत्यता जो इसके हृदय में स्थित हो रही है सो अभ्यासयोग से टूट पड़ेगी इससे चलते, बैठते, खाते, पीते, सुनते, सूँघते, स्पर्श करते और जागते इन तीनों का अभ्यास करो । हे रामजी ! वासना के त्याग से प्राणस्पन्द रोका जाता है । जब प्राणों
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का स्पन्द रोका तब चित्त अचित्त हो जाता है। एक प्राणों के रोकने से ही वासना क्षय हो जाती है, तब भी चित्त अचित्त हो जाता है। आत्म-योग से अथवा वासना के त्याग से आत्मतत्त्व प्रकाशेगा। इनमें जो तुम्हारी इच्छा हो वही करो, चाहे प्राणों को योग से रोको और चाहे वासना का त्याग करो। प्राणायाम तब होता है जब गुरु की दी हुई युक्ति स्थित होती है और आसन और आहार के संयम से प्राणों का स्पन्द रोका जाता है। जब सम्यक्ज्ञान से जगत् को अवास्तव जानता है तैसे वासना नहीं प्रवर्त्तती । जो जगत् के आदि और अन्त में स्थित है उसमें मन जब स्थित होता है तब वासना नहीं उपजती । हे रामजी ! जब व्यवहार में निःसंग और संसार की भावना से विवर्जित होता है और शरीर में असत् बुद्धि होती है तब भी वासना नहीं प्रवर्त्तती और जब विचार करके वासना क्षय हो तब चित्त भी नष्ट हो जावेगा जैसे वायु के ठहरने से धूल नहीं उड़ती तैसे ही वासना के क्षय हुए चित्त नहीं उपजता । जो प्राणस्पन्द है वही चित्तस्पन्द है। जब वासना फुरती है तब जगतभ्रम उपजता है। जैसे पवन से धूल उपजती है तैसे ही चित्त से वासना उपजती है जब प्राणस्पन्द ठहरता है तब चित्त भी ठहर जाता है, इससे यत्न करके प्राणस्पन्द अथवा वासना के जीतने का अभ्यास करो तब शान्तिमान् होगे और जो यह उपाय न करो और दूसरे यत्न से चित्त वश करने का उपाय करोगे तो बहुत काल में आत्म-पद को पावोगे। हे रामजी ! इस युक्ति के बिना मन के जीतने का और कोई उपाय नहीं है । जैसे मतवाले हाथी को अंकुश बिना वश करने का उपाय और कोई नहीं तैसे ही मन भी युक्ति बिना वश नहीं होता । वह युक्ति यह है, कि सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों का विचार करना । इस उपाय से तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और प्राणों का स्पन्द रोकना होता है । चित्त वश करने की यह परमयुक्ति है-इससे चित्त शीघ्र ही जीता जाता है। जो इन उपायों का त्यागकर हठ से मन वश किया चाहते हैं वे क्या करते हैं ? जैसे तम के नाश करने को दीपक जलावे तो नाश हो जाता है और शस्त्रों से तम को काटे तो तम नाश न
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होवेगा तैसे ही और उपायों से चित्त वश न होगा। इस बिना जो और उपाय करते हैं वे मूर्ख हैं। जैसे मतवाला हाथी कमल की ताँत से बाँधा नहीं जाता और जो कोई इससे बाँधने लगे तो महामूर्ख है, तैसे ही मन के जीतने को और प्रकार जो हठ करते हैं सो महामूढ़ हैं। और उपाय करके क्लेश प्राप्त होगा आत्मसुख प्राप्त न होगा। जैसे दुर्भागी जीवों को कहीं सुख नहीं होता है। हे रामजी! जिसने तीर्थ, दान, तप और देवताओं की पूजा—यह चारों साधन किये हैं और मन जीतने का उपाय नहीं किया वह मृग की नाईं भ्रमता फिरता है और पहाड़ों की कन्दरा में फल और पत्र खाता फिरता है, क्योंकि उसने मन का नाश नहीं किया इससे आत्मपद को नहीं पाया वह पशुओं के समान है, जैसे और पशु होते हैं तैसे ही वह भी है। हे रामजी! जिस पुरुष ने मन को वश नहीं किया उसको शान्ति नहीं होती। जैसे कोमल अङ्गवाला मृग घाम में जाने से शान्ति पाता और जैसे जल में पड़ा तृण नदी के वेग से भटककर कष्टवान् होता है तैसे ही वह पुरुष कर्म करता है और मन को स्थित किये बिना कष्ट पाता है। कभी दुःख से जलता है और कभी कर्मों के वश से स्वर्ग को प्राप्त होता है पर वह भी नष्ट हो जाते हैं। जैसे जल में तरंग उछलते हैं, कभी अधः को जाते और कभी ऊर्ध्व को जाते हैं तैसे ही कर्मों के वश से जीव स्वर्ग नरक में भ्रमते हैं। इससे ऐसी दृष्टि का त्याग करके शुद्ध संवित्मात्र का आश्रय करे और वीतराग होकर स्थित हो। हे रामजी! जगत् में ज्ञान-वान ही सुखी है और जीता भी वही है, और सब दुःखी और मृतक समान हैं। और बली भी ज्ञानवान् ही है जो मोहरूपी शत्रु को मारकर संसारसमुद्र के पार होता है और सब निर्बल हैं। इससे तुम भी ज्ञानवान् हो संवेदन रहित जो संवित्मात्र तत्त्व है उसमें स्थित हो वह एक है और सबके आदि, सबसे उत्तम, कलना से रहित और सबमें स्थित है तो कर्त्ता हुए भी अकर्त्ता होगे और परब्रह्म उदय होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे अष्टाशीतितमस्सर्गः ॥ ८८ ॥
८१० | योगवाशिष्ठ ।
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जिस पुरुष ने आत्मविचार कर अपना चित्त अल्प भी निग्रह किया है वह सम्पूर्ण फल को प्राप्त होगा और उसी का जन्म सफल होगा । हे रामजी ! जिस चित्त में विचाररूपी कण का उदय हुआ है वह अभ्यास से बड़े विस्तार को पावेगा । हृदय में जो वैराग पूर्वक विचार उपजता है तो वह बढ़ता जाता है और अविद्या रूपी अवगुणों को काट डालेगा और सब शुभगुण आन उसमें आलय करेंगे—जैसे जल से पूर्ण हुए ताल का सब पक्षी आन आश्रय करते हैं । हे रामजी ! जिसको सम्यक्ज्ञान प्राप्त होता है और निर्मल बोध से यथादर्शन होता है उसको इन्द्रियाँ चला नहीं सकतीं । जबतक स्व-रूप का प्रमाद होता है तबतक आधि-व्याधि दुःख होते हैं और जब स्व-रूप में स्थित होती है तब शरीर और मन के दुःख वश नहीं कर सकते—जैसे बिजली को कोई ग्रहण नहीं कर सकता, तैसे पुष्टिकर मेघों को कोई पकड़ नहीं सकता, जैसे आकाश के चन्द्रमा को मुष्टि में कोई नहीं पकड़ सकता और मूढ़ ली चन्द्रमा को मोह नहीं सकती, तैसे ही ज्ञानवान् को कोई दुःख वश नहीं कर सकता । हे रामजी ! जो हाथी मद से मत्त है और जिसके मस्तक से मद झरता है और भँवरे उसके आगे शब्द करते हैं उसको मच्छरों के प्रहार और स्त्री के श्वास नहीं छेद सकते, तैसे ही ज्ञानवान् को विषयों के रागद्वेष नहीं चला सकते । जिस हाथी के मस्तक से मोती निकलता है ऐसे बलवान् हस्ती को नखों से विदारनेवाले सिंह को हरिण नहीं मार सकता, तैसे ही ज्ञानवान् को दुःख नहीं चला सकता जिसके फूत्कार से वन के वृक्ष जल जाते हैं ऐसे सर्प को दर्दुर नहीं ग्रास कर सकते, तैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष नहीं चला सकते । जैसे राज-सिंहासन पर बैठे राजा को तस्कर दुःख दे नहीं सकते तैसे ही जो ज्ञानी स्वरूप में स्थित है उसको इन्द्रियों के विषय दुःख नहीं दे सकते । जो विचार से रहित देहाभिमानी हैं और आत्मतत्त्व को नहीं प्राप्त हुए उनको विषय उड़ा ले जाते हैं—जैसे सूखे पत्र को पवन उड़ा ले जाता है—और ज्ञानवान् को नहीं चला सकते । जैसे पर्वत मन्द पवन से चलायमान नहीं होता, तैसे ही ज्ञानवान् सुख दुःख में चलायमान नहीं होता और
उपशम प्रकरण। ८११
जो विचार से रहित है वह जगत् को सत् मानता है । सांसारिक पदार्थों में रत मनुष्य गुरु और शास्त्रों के मार्ग से विमुख है और मूढ़ होकर खाने पीने में सावधान है वह विचार से शून्य व मृतक समान है । उसको यह विचार कर्तव्य है कि 'मैं कौन हूँ' 'यह जगत् क्या है' 'कैसे उत्पन्न हुआ है' और 'कैसे निवृत्त होगा' । इस प्रकार विचारकर सन्तों के संग और अध्यात्मशास्त्र के विचार से जो पुरुष दृश्यभाव को त्यागकर आत्मतत्त्व में स्थित होता है वह परमपद पाता है । जैसे दीपक के प्रकाश से पदार्थ पाया जाता है, तैसे ही विचार से आत्मतत्त्व पाया जाता है । हे रामजी ! जिसको शास्त्रविचार से आत्मतत्त्व का बोध होता है वह ज्ञानी कहलाता है और वह ज्ञान ज्ञेय के साथ अभिन्नरूप है । अध्यात्मविद्या के विचार करके आत्मज्ञान प्राप्त होता है । जैसे दूध से मथकर मक्खन निकाला जाता है, तैसे ही विचार से आत्मज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञेय जो भीतर है सोई परब्रह्मस्वरूप है और सत्य है पर असत्य की नाई होकर स्थित है । ज्ञानवान् उसको पाकर तृप्त होता है और जीवन्मुक्त होकर अपने आपमें प्रकाशता है । जैसे चक्रवर्ती राज्य से आनन्द और तृप्ति होती है तैसे ही ज्ञानवान् ब्रह्मानन्द में इन्द्रियों की इच्छा से रहित शोभता है और शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाँचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं होता । सुन्दर राग, तन्त्री के शब्द, स्त्रियों के गाने और कोकिलापक्षी और गन्धर्व गन्धर्वी आदि के जो गायन हैं उनमें वह आसक्त नहीं होता । अगर, चन्दन, मन्दार कल्पवृक्ष के सुन्दर फूलों की सुगन्ध, अप्सरा और नागकन्याओं की नाईं सुन्दर स्त्रियों का स्पर्श करने और हीरे, मणि और भूषण और नाना प्रकार के वस्त्रों में वह बन्धवान् नहीं होता । जैसे चन्द्रमा सुन्दर और शीतल है परन्तु सूर्यमुखी कमलों को विकाश नहीं कर सकता तैसे ही सुन्दर स्पर्श ज्ञानी के चित्त को हर्षवान् नहीं करता । जैसे मरुस्थल में हंस प्रसन्न नहीं होता तैसे ज्ञानवान् स्पर्श से प्रसन्न नहीं होता और रसादिक में भी बन्धवान् नहीं होता । दूध, दही, घृतादिक रस, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, यह चारों प्रकार के भोजन और कटु, तीक्ष्ण, मीठा, खारा आदि जितने रस हैं इनकी इच्छा ज्ञानवान् नहीं
८१२ योगवाशिष्ठ ।
करते और किसी में बन्धवान् नहीं होते। वे आत्मबोध से नित्य तृप्त हैं और किसी भोग की इच्छा नहीं करते जैसे ब्राह्मण मुर्गी के मांस के खाने की इच्छा नहीं करते तैसे ही ज्ञानवान् उर्वशी, रम्भा मेनका आदि अप्सराओं की इच्छा नहीं करते और चन्दन, अगर, कस्तूरी, मन्दार आदि वृक्षों के फूलों की सुगन्ध की इच्छा नहीं करते। जैसे मछली मरुस्थल की इच्छा नहीं करती तैसे ही ज्ञानवान् सुगन्ध की इच्छा नहीं करते और रूप की इच्छा भी नहीं करते। सुन्दर स्त्रियाँ बाग, तालाब, नदियाँ इत्यादिक जो रूपवान् पदार्थ हैं तिनकी इच्छा ज्ञानवान् नहीं करते। जैसे चन्द्रमा बादलों की इच्छा नहीं करते तैसे ही ज्ञानवान् रूप की इच्छा नहीं करते। और की क्या बात है, इन्द्र, यम, विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, समुद्र, कैलास, मन्दराचल, रत्न, मणि और कञ्चन ये जो बड़े-बड़े पदार्थ हैं उनकी भी वे इच्छा नहीं करते। जैसे राजा नीच पदार्थों की इच्छा नहीं करता तैसे ही ज्ञानवान् पदार्थों की इच्छा नहीं करते। समुद्र और सिंह के गर्जने और बिजली के कड़कने का जो भयानक शब्द है उसको भी सुनकर वह भयवान् नहीं होते-जैसे शूरमा धनुष का शब्द सुनकर भयवान् नहीं होता। ज्ञानवान् मतवाले हाथी, वैताल, पिशाच और इन्द्र के वज्र के शब्द सुनते और देखते हुए भी कम्पायमान नहीं होते और सत्स्वरूप की स्थिति से कभी चलायमान नहीं होते। शरीर को जो आरे से काटिये, खड्ग से कणकण करिये और बाणों से वेधिये तो भी कम्पायमान नहीं होते। उसको रागद्वेष भी किसी में नहीं होता, यदि शरीर पर एक ओर जलता अङ्गारा रखिये और एक ओर फूलों की माला रखिये तो भी वह हर्ष-शोकवान् नहीं होता। एक ओर असिधारावत् तीक्ष्णस्थान ही और एक ओर पुष्पशय्या हो तो उसको दोनों तुल्य हैं। एक ओर शीतल स्थान हो और एक ओर गरम शिला हो तो दोनों उसको तुल्य हैं। एक ओर मारनेवाला विष हो और दूसरी ओर जियानेवाला अमृत हो तो उसको दोनों तुल्य हैं। हे रामजी ! चाहे सम्पदा प्राप्त हो, चाहे आपदा हो, चाहे मृत्यु हो, चाहे उत्साह हो इनमें व्यवहार करता भी वह दृष्टि आता है परन्तु हृदय से हर्ष और
उपशम प्रकरण। ८१३
शोक नहीं। उसका मन ज्ञानसंयुक्त है और सदा सम रहता है। हे रामजी! लोहे के कुल्हाड़े से उसका मांस तोड़िये, नरक में डालिये और ऊपर शस्त्रों की वर्षा हो तो भी ज्ञानवान् भय न पावेगा और न उद्वेगवान् और न व्याकुल होगा, न दीन होगा। ज्ञानवान् इनमें सदा समदृष्टि होकर पहाड़ की नाई धैर्यवान् स्थित रहता है। हे रामजी! ज्ञानवान् रागद्वेष से रहित है और देह अभिमान से मुक्त हुआ है। उसका शरीर अग्नि में पड़े, वा खाई में गिरे अथवा स्वर्ग में हो उसको दोनों तुल्य हैं और वह हर्ष शोक से रहित है। हे रामजी! जिसके स्वरूप में दृष्टि स्थित हुई है वह चलायमान नहीं होता—जैसे मेरु स्थित है—उसको पवित्र पदार्थ हो अथवा अपवित्र पदार्थ हो, पथ्य हो व कुपथ्य हो, विष हो अथवा अमृत हो, मीठा, खट्टा, सलोना, कड़ुवा, दूध, दही, छास, रस, रक्त, मांस, मद्य, अस्थि, तृण आदिक जो भक्ष्य, भोज्य, लेह्य चोष्य भोजन हैं वह सम हैं। न इष्ट में वह रागवान् होता है और न अनिष्ट में द्वेषवान् है। यदि एक पुरुष प्राणों के निकालने को सम्मुख आवे और दूसरा प्राणों की रक्षा निमित्त आवे तो दोनों को वह आत्मस्वरूप, शान्तमन और मधुररूप देखता है और रागद्वेष से रहित है। रमणीय अरमणीय पदार्थों को वह सम देखता है क्योंकि उसने संसार की आस्था त्याग दी है। बोधस्वरूप में वह निश्चल है, चित्त नीरागपद को प्राप्त हुआ है और सब जगत् उसको आत्मस्वरूप भासता है और शब्द, स्पर्श, रूप, रस गन्ध पञ्चविषयों के भोग अपना अवसर नहीं पाते। जैसे दर्पण देखने से प्रतिबिम्ब भासता है, दर्पण की सुरत रहती तैसे ही वह विषयों में आत्मा देखता है, विषयों की सुरत नहीं रहती। अज्ञानी को इन्द्रियाँ ग्रास लेती हैं—जैसे तृणों को मृग ग्रास लेता है। जिसने आत्मपद में विश्रान्ति पाई है उसको इन्द्रियाँ ग्रास नहीं सकतीं। हे रामजी! अज्ञानरूपी समुद्र में जो पड़ा है और वासनारूपी लहरों से मिलकर उछलता और गिरता है, उसको आशारूपी तेंदुआ ग्रास कर बैठा है और हाय हाय करता है, शान्ति नहीं पाता। जो विचार करके आत्मपद को प्राप्त हुआ है वह विश्रान्ति को पा चलायमान
८१४ योगवाशिष्ठ ।
नहीं होता । जैसे सुमेरु पर्वत जल के समूह से चलायमान नहीं होता तैसे ही वह संकल्प विकल्प में चलायमान नहीं होता । जिसकी आत्मपद में विश्रान्ति हुई है वह उत्कृष्टता को प्राप्त हुआ है । हे रामजी ! उसको यह जगत् ज्ञानमात्र भासता है और वह उसे संवित्मात्र जानकर विचार करता है, न किसी का ग्रहण है और न त्याग करता है । इससे भ्रान्ति को त्यागकर संवित्मात्र ही तेरा स्वरूप है, किसका त्याग करता है और किसका ग्रहण करता है ? जो आदि में भी न हो, अन्त में भी न रहे और मध्य में भासे उसे भ्रममात्र जानिये । इस प्रकार जानकर, भाव अभाव की बुद्धि को त्यागकर और निस्संवेदन रूप होकर संसारसमुद्र से तर जाओ और मन, बुद्धि और इन्द्रियों से कर्म करो चाहे न करो, निसङ्ग होगे तब तुमको लेप न होगा । हे रामजी ! जिसका मन अभिमान से रहित हुआ है वह कर्म करता भी लेपायमान नहीं होता । जैसे मन और ठौर गया होता है तो विद्यमान शब्द अथवा रूप पदार्थों को प्रस्तुत होते भी नहीं जानता, तैसे ही जिसका मन आत्म-पद में स्थित हुआ है उसको सुख दुःख कर्म नहीं लगता जो पुरुष अभिमान से रहित है वह कर्मों में सुख दुःख भोगता दृष्टि आता है परन्तु वह उसको स्पर्श नहीं करते । देखो, यह बालक भी जानते हैं कि मन और ठौर जाता है तो सुनता भी नहीं सुनता, तैसे ही वह पुरुष करता भी नहीं करता । हे रामजी ! जिसका मन असंग हुआ है वह देखता है परन्तु नहीं देखता, सुनता है परन्तु नहीं सुनता, स्पर्श करता है परन्तु नहीं करता, सूंघता और रस लेता है परन्तु नहीं लेता इत्यादिक जो कुछ चेष्टा है सो कर्त्ता भी वह अकर्त्ता है और उसका चित्त आत्मपद में लीन हुआ है । जैसे कोई पुरुष देशान्तर को जाता है तो वह उस देश में व्यवहार कर्म करता है परन्तु उसका चित्त गृह में रहता है तैसे ही ज्ञान-वान् का चित्त आत्मपद में रहता है । यह बात मूर्ख भी जानता है । जैसा वेग मन में तीव्र होता है उसकी सिद्धि होती है और वही भासता है और नहीं भासता । हे रामजी ! सब अनर्थों का कारण संग है, संसार के संग से ही जन्म-मरण के बन्धन को प्राप्त होता है, इससे सब
उपशम प्रकरण । =१५
अनथा और संसार का कारण संग है। सब इच्छाओं का कारण संग है और सब आपदाओं का कारण संग है, संग के त्याग से मोक्षरूप और अजन्मा होता है। इससे संग को त्यागकर और जीवन्मुक्त होकर विचरो। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आप सर्वसंशयरूपी कुहिरे के नाशकर्त्ता शरत्काल के पवन हैं संग किसको कहते हैं, यह संक्षेप से मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! भाव-अभाव जो पदार्थ हैं वह हर्ष और शोक के देनेवाले हैं। जिस मलिन वासना से यह प्राप्त होते हैं वही वासना संग कहलाता है। हे रामजी ! देह में जो अहंबुद्धि होती है और संसार की जो सत्य प्रतीति है तो उस संसार के इष्ट अनिष्ठ को रागद्वेष सहित ग्रहण करता है, ऐसी मलीन वासना संग कहाती है और जीवन्मुक्त की वासना हर्ष शोक से रहित शुद्ध होती है—सो निस्संग कहाता है। उसकी वासनाएँ जन्म मरण का कारण नहीं होती। हे रामजी ! जिस पुरुष को देह में अभिमान नहीं होता और जिसकी स्वरूप में स्थिति है वह शरीर के इष्ट अनिष्ठ में रागद्वेष नहीं करता, क्योंकि उसका शुद्ध वासना है और जो कर्त्ता है सो बन्धन का कारण नहीं होता। जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही ज्ञानवान् की वासना जन्म-मरण का कारण नहीं होती और जिसकी वृत्ति जगत् के पदार्थों में स्थित है और रागद्वेष से ग्रहण त्याग करता है ऐसी मलीन वासना जन्मों का कारण है इस वासना को त्यागकर जब तुम स्थित होगे तब तुम करते हुए भी निर्लेप रहोगे और हर्ष शोकादि विकारों से जब तुम रहित होगे तब वीतराग और भय और क्रोध से असंग होगे । हे रामजी ! जिसका मन असंग हुआ है वह जीवन्मुक्त हुआ है। इससे तुम भी वीतराग होकर आत्मतत्त्व में स्थित हो । जीवन्मुक्त पुरुष इन्द्रियों के ग्राम को निग्रह करके स्थित होता है और मान, मद, वैर को त्यागकर सन्ताप से रहित स्थित होता है। वह सब आत्मा जानकर कर्म करता है परन्तु व्यवहार बुद्धि से रहित असंग होकर कर्म करता है । वह कर्त्ता भी अकर्त्ता है उसको आपदा अथवा सम्पदा प्राप्त हो अपने स्वभाव को नहीं त्यागता, जैसे क्षीरसमुद्र ने मन्दराचल पर्वत को पाकर शुक्लता को नहीं त्यागा,
८१६ योगवाशिष्ठ ।
तैसे ही जीवन्मुक्त अपने स्वभाव को नहीं त्यागते । हे रामजी ! आपदा प्राप्त हो अथवा चक्रवर्ती राज्य मिले, सर्प का शरीर प्राप्त हो अथवा इन्द्र का शरीर प्राप्त हो, इन सबमें वह सम और आत्मभाव से स्थित होता है और हर्ष शोक को नहीं प्राप्त होता । वह सब आरम्भों को त्यागकर नानात्वभाव से रहित स्थित होता है । विचार करके जिसने आत्मतत्त्व पाया है वह जैसे स्थित हो तैसे ही तुम भी स्थित हो । इसी दृष्टि को पाकर आत्मतत्त्व को देखो तब विगतज्वर होगे और आत्मपद को पाकर फिर जन्म-मरण के बन्धन में न आवोगे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे आर्षे देवदूतोक्तमहारामायणे मोक्षोपायनाम एकोननवतितमसर्गः ॥ ८६ ॥
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे पञ्चमं समाप्तम् ॥
श्रीमती स्मिता पटवर्धन द्वारा
क्लासिक आफ़सेट प्रिंटिंग, जे.एन. रोड, से मुद्रित
योगवाशिष्ठ की अनुक्रमणिका ।
द्वितीय भाग ।
| सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| निर्वाणप्रकरण पूर्वार्द्ध | २७ | रुद्रवशिष्ठसमागम | ७३ | प्रतिपादन | १४७ | |||
| १ | दिवसरात्रिव्यापार | १ | २८ | ईश्वरोपाख्याने जगत्परमात्मरूप | ७५ | ५४ | जीवन्निर्णय | १५० |
| २ | विश्रामदृढीकरण | ३ | २९ | वशिष्ठेश्वरसंवादे चैतन्योन्मुखत्वविचार | ७८ | ५५ | श्रीकृष्णसंवादे अर्जुनविश्रान्ति | १५२ |
| ३ | ब्रह्मैक्यप्रतिपादन | ७ | ३० | ईश्वरोपाख्याने मनःप्राणोक्तप्रतिपादन | ८५ | ५६ | श्रीकृष्णअर्जुनसंवादे भविष्यद्गीता | १५६ |
| ४ | चित्तभावाभाव | ६ | ३१ | तथा देहपातविचार | ८६ | ५७ | प्रत्यक् आत्मबोध | १५७ |
| ५ | राघवविश्रान्ति | १० | ३२ | तथा दैवप्रतिपादन | ६२ | ५८ | विभूतियोगोपदेश | १६१ |
| ६ | अज्ञानमाहात्म्य | ११ | ३३ | तथा परमेश्वरोपदेश | ६६ | ५९ | जाग्रत्स्वप्नविचार | १६२ |
| ७ | अविद्यालता | १२ | ३४ | ईश्वरोपाख्यानदेवनिर्णय | ६५ | ६० | ब्रह्मैकताप्रतिपादन | १६३ |
| ८ | अविद्यानिराकरण | २० | ३५ | महेश्वरवर्णन | १०० | ६१ | वैताल प्रश्नोक्ति | १६६ |
| ९ | अविद्याचिकित्सा | २२ | ३६ | ईश्वरोपाख्याने नीतिनृत्य | १०१ | ६२ | राजावैतालसंवादे वैतालप्रश्नापद्प्राप्ति | १७६ |
| १० | जीवन्मुक्तिनिश्चयोपदेश | २५ | ३७ | ईश्वरपा० अन्तःबाह्यपू० | १०२ | ६३ | भगीरथोपदेश | १८० |
| ११ | जीवन्मुक्तिनिश्चय | ३१ | ३८ | देवअर्चनाविधान | १०४ | ६४ | निर्वाणवर्णन | १८३ |
| १२ | ज्ञानज्ञेयविचार | ३२ | ३९ | ईश्वरोपाख्याने देवपूजाविचार | १०८ | ६५ | भगीरथोपाख्यानसमाप्ति | १८५ |
| १३ | भुशुण्डोपाख्यान | ३३ | ४० | जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादन | १०६ | ६६ | शिखिध्वजचूडालोपाख्यान | १८६ |
| १४ | भुशुण्डिदर्शन | ३५ | ४१ | परमार्थविचार | ११३ | ६७ | चूडालाप्रबोध | १९८ |
| १५ | भुशुण्डिसमागम | ३६ | ४२ | विश्रान्ति आगमन | ११६ | ६८ | अग्निसोमविचारयोग | १६० |
| १६ | भुशुण्डोपाख्यान | ३७ | ४३ | चित्तसत्तासूचन | ११८ | ६९ | चिन्तामणिवृत्तान्त | २०२ |
| १७ | सन्तमाहात्म्य | ४१ | ४४ | बिलोपाख्यान | १२० | ७० | हस्तिआख्यान | २१६ |
| १८ | भुशुण्डोपाख्याने जीवितवृत्तान्त | ४४ | ४५ | शिलाकोशोपदेश | १२२ | ७१ | हस्तिवृत्तान्त | २१७ |
| १९ | चिरअतीत | ४७ | ४६ | सत्ताउपदेश | १२४ | ७२ | शिखिध्वजसर्वत्याग | २२१ |
| २० | भुशुण्डोपाख्याने संकल्पनिराकरण | ४९ | ४७ | ब्रह्मैकताप्रतिपादन | १२६ | ७३ | चित्तत्याग | २२३ |
| २१ | भुशुण्डिप्राणापानसमाधि | ५० | ४८ | स्मृतिविचारयोग | १२८ | ७४ | राजविश्रान्ति | २२७ |
| २२ | भुशुण्डिचिरञ्जीविहेतु | ५५ | ४९ | संवेदन विचार | १३१ | ७५ | शिखिध्वजविश्रान्ति | २३३ |
| २३ | भुशुण्डोपाख्यानसमाप्ति | ५७ | ५० | यथार्थोपदेश | १३४ | ७६ | शिखिध्वजबोध | २३४ |
| २४ | परमार्थयोगोपदेश | ५६ | ५१ | नारायणअवतार | १४० | ७७ | शिखिध्वजप्रथमबोध | २३८ |
| २५ | देहसत्ताविचार | ६४ | ५२ | अर्जुनोपदेश | १४२ | ७८ | शिखिध्वजबोध | २३६ |
| २६ | वशिष्ठाश्रम | ७१ | ५३ | अर्जुनोपदेश सर्वब्रह्म- | ७९ | तथा | २४१ |
२ योगवासिष्ठ
| सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ८० | परमार्थउपदेश | २४३ | तृतीय भूमिका-लक्षण विचार | ३४० | १३९ | भुशुण्डिविद्याधरो-पाख्यानसमाप्ति | ४०६ | |
| ८१ | शिखरध्वजबोध | २४६ | ११३ | तृतीय भूमिका-विचार | ३४३ | १४० | अहंकारअस्तयोगो-पदेश | ४११ |
| ८२ | शिखरध्वजबोधप्राप्ति | २५१ | ११४ | विश्ववासनारूप | ३४६ | १४१ | विराद् आत्मा | ४१२ |
| ८३ | विवाहलीला | २५६ | ११५ | सृष्टिनिर्वाणएकता-प्रतिपादन | ३४६ | १४२ | ज्ञातस्वन्धयोग | ४१८ |
| ८४ | मायाशकागमन | २६१ | ११६ | विश्वआकाश-एकताप्रतिपादन | ३५१ | १४३ | सुखेन योगोपदेश | ४२२ |
| ८५ | मायापिकचर | २६२ | ११७ | विश्वविजय | ३५३ | १४४ | सद्विरक्ति परम-वैराग्यनिरूपण | ४२८ |
| ८६ | चुडालामाहात्म्य | २६४ | ११८ | विश्वभ्रमण | ३५६ | १४५ | सद्विवेकाभ्ययोग | ४३१ |
| ८७ | शिखरध्वजचुडाला-ख्यान | २६७ | ११९ | जगद्भावप्रतिपादन | ३५६ | १४६ | सद्विरक्तविप्रबोध | ४३३ |
| ८८ | बृहस्पतिबोधन | २६६ | १२० | पिण्डनिर्णय | ३६४ | १४७ | सद्विरक्तविनिर्वाण-आदित | ४३६ |
| ८९ | मिथ्यापुरुषआकाश-वृत्तान्तरूप | २७२ | १२१ | बृहस्पतिबलिसंवाद | ३६६ | १४८ | सुखेन योगोपदेश | ४४० |
| ९० | मिथ्यापुरुषोपाख्यान-समाप्ति | २७४ | १२२ | तथा | ३६८ | १४९ | निराशयोगोपदेश | ४४२ |
| ९१ | परमार्थयोगोपदेश | २७६ | १२३ | चित्त अभावप्रति-पादन | ३७० | १५० | भावनाप्रतिपादनो-पदेश | ४४४ |
| ९२ | महाकर्त्तृभ्युपदेश | २७६ | १२४ | पञ्चभूमिका | ३७१ | १५१ | हंससंन्यासयोग | ४४६ |
| ९३ | कलनानिषेध | २८२ | १२५ | षष्ठभूमिकाउपदेश | ३७४ | १५२ | निर्वाणयुतमुक्त्यु-पदेश | ४५१ |
| ९४ | समत्वलक्षणमाहात्म्य | २८४ | १२६ | सप्तभूमिकालक्षण-विचार | ३७७ | १५३ | शान्तिस्थितयोगो-पदेश | ४५५ |
| ९५ | इक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेश | २८६ | १२७ | संसरअभावप्रति-पादन | ३७८ | १५४ | परमार्थयोगोपदेश | ४५८ |
| ९६ | राजाइक्ष्वाकुप्रत्यक्षो-पदेश | २९१ | १२८ | इच्छाचिकित्सो-पदेश | ३८० | १५५ | तथा | ४६२ |
| ९७ | मनुइक्ष्वाकुआख्याने सर्वब्रह्मप्रतिपादन | २९७ | १२९ | कर्मबीजदाहोपदेश | ३८४ | १५६ | इच्छानिषेधयोगो-पदेश | ४६४ |
| ९८ | परमनिर्वाण | ३०१ | १३० | अहंकारनाशविचार | ३८६ | १५७ | जगत् उपदेश | ४६७ |
| ९९ | मोक्षरूप | ३०४ | १३१ | विद्याधरवैराग्य | ३८६ | १५८ | परमनिर्वाणयोगो-पदेश | ४७३ |
| १०० | परमार्थोपदेश | ३०६ | १३२ | संसाररूपवृक्ष | ३८७ | १५९ | वशिष्ठगीतोपदेश | ४७७ |
| १०१ | समाधान | ३१० | १३३ | संसारआडम्बर-उत्पत्ति | ३८८ | १६० | वशिष्ठगीतासारो-पदेश | ४८० |
| १०२ | मनुइक्ष्वाकुसंवाद-समाप्ति | ३१४ | १३४ | चित्तचमत्कार | ३९६ | १६१ | जगत् उपशमयोगो-पदेश | ४८२ |
| १०३ | ज्ञानीलक्षणविचार | ३१५ | १३५ | सर्गउपसर्गोपदेश | ४०० | १६२ | पुननिर्वाणउपदेश | ४८३ |
| १०४ | कर्म्माकर्मविचार | ३१७ | १३६ | यथामृतार्थभाव-रूपयोगोपदेश | ४०२ | १६३ | ब्रह्मैकत्वाप्रतिपादन | ४८७ |
| १०५ | तुरीयपदविचार | ३२२ | १३७ | इन्द्रोपाख्याने त्रस-रेणुजगत् | ४०४ | १६४ | हरिगोपाख्यानवृत्ता-न्तयोगोपदेश | ४९२ |
| १०६ | काष्ठमौनवृत्तान्त | ३२४ | १३८ | सङ्कल्पासङ्कल्प-कताप्रतिपादन | ४०७ | १६५ | मनमुगोपाख्यान-योगोपदेश | ४९५ |
| १०७ | अविद्यानाशरूप | ३२६ | ||||||
| १०८ | जीवत्वअभावप्रति-पादन | ३३० | ||||||
| १०९ | सारप्रयोग | ३३१ | ||||||
| ११० | ब्रह्मैकत्वप्रतिपादन | ३३२ | ||||||
| १११ | निर्वाणनिरूपण | ३३६ | ||||||
| ११२ | प्रथम द्वितीय और |
अनुक्रमणिका ३
| सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| निर्वाणप्रकरण उत्तरार्द्ध | पादन | ५८४ | २२४ | महाशववृत्तान्त | ७०७ | |||
| १६६ | स्वभावसत्तायोगोपदेश | ५०० | १९६ | देवीरुद्रोपाख्यान | ५८७ | २२५ | स्वयंमाहात्म्यवृत्तान्त | ७०८ |
| १६७ | मोक्षोपदेश | ५०२ | १९७ | अन्तरोपाख्यान | ५९० | २२६ | मल्लरणव्याध | ७११ |
| १६८ | विवेकद्रुम | ५०७ | १९८ | पुरुषप्रकृतिविचार | ५९२ | २२७ | हृदयन्तरस्वप्नमहाप्रलय | ७१४ |
| १६९ | सर्वसमताउपदेश | ५१० | १९९ | अनन्तजगत् | ६०२ | २२८ | हृदयन्तरप्रलयाग्निदाह | ७२२ |
| १७० | सप्तप्रकारजीवसृष्टि | ५१४ | २०० | अन्तरोपाख्याने पृथ्वीधातु | ६०५ | २२९ | कर्मनिर्णय | ७२६ |
| १७१ | सर्वशान्तिउपदेश | ५१६ | २०१ | अन्तरोपाख्याने जलरूप | ६०८ | २३० | महाशवोपाख्याने निःसङ्गोपदेश | ७३० |
| १७२ | ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादन | ५२१ | २०२ | अन्तरोपाख्याने चिद्रूप | ६१० | २३१ | कार्यकारणनिर्णय | ७३६ |
| १७३ | निर्वाणनिरूपण | ५२४ | २०३ | ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन | ६१३ | २३२ | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिविचार | ७४० |
| १७४ | द्वैतएकताप्रतिपादन | ५२५ | २०४ | आकाशकुटीसिद्धसमाधियोग | ६१५ | २३३ | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति | ७४१ |
| १७५ | परमशान्तिनिर्वाण | ५२७ | २०५ | अन्तरोपाख्यान | ६२१ | २३४ | सुषुप्ति | ७४४ |
| १७६ | आकाशकुटीविशिष्टसमाधि | ५२८ | २०६ | अन्तरोपाख्यान समाप्ति | ६२६ | २३५ | तथा | ७४६ |
| १७७ | विदितवेद्यअहंकार | ५३१ | २०७ | मुक्तसंज्ञा | ६२६ | २३६ | स्वप्ननिर्णय | ७४७ |
| १७८ | ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन | ५३३ | २०८ | जीवन्मुक्त व्यवहार | ६३४ | २३७ | स्वप्नविचार | ७५२ |
| १७९ | जगज्जालसमूह | ५३५ | २०९ | परमार्थरूप | ६३६ | २३८ | रात्रिसंवाद | ७५५ |
| १८० | जगज्जालनिरूपण | ५३८ | २१० | नास्तिकवादीनिराकरण | ६४० | २३९ | रात्रिप्रबोध | ७६० |
| १८१ | बोधजगदेकताप्रतिपादन | ५४२ | २११ | परमउपदेश | ६४५ | २४० | यथार्थोपदेश | ७६१ |
| १८२ | जगदेकताप्रतिपादन | ५४५ | २१२ | चैतन्य आकाशपरमज्ञान | ६४७ | २४१ | भविष्यत्कथा | ७६३ |
| १८३ | विद्याधरीविशोक | ५४८ | २१३ | सर्वपदार्थभाव | ६५४ | २४२ | सिद्धिनिर्वाण | ७६७ |
| १८४ | विद्याधरीवेग | ५५२ | २१४ | जाग्रत्स्वप्नेकताप्रतिपादन | ६६३ | २४३ | विपश्चित्देशान्तरभ्रम | ७७१ |
| १८५ | विद्याधरी अभ्यास | ५५७ | २१५ | जगन्निर्वाण | ६६७ | २४४ | स्वर्गनरकप्रारब्ध | ७७५ |
| १८६ | प्रत्यक्षप्रमाणजगतन्निशकरण | ५६१ | २१६ | कारणकार्याभाव | ६६६ | २४५ | निर्वाणउपदेश | ७८१ |
| १८७ | शिलास्तरवशिष्ठब्रह्मसंवाद | ५६५ | २१७ | अभावप्रतिपादन | ६७२ | २४६ | अविद्यानाशोपदेश | ७८४ |
| १८८ | अन्यजगतप्रलय | ५७० | २१८ | विपश्चित्समुद्रप्राप्ति | ६७३ | २४७ | इन्द्रिययज्ञ | ७८७ |
| १८९ | निर्वाणनिरूपण | ५७२ | २१९ | जीवन्मुक्तलक्षण | ६७८ | २४८ | ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादन | ७९२ |
| १९० | विराट् आत्मा | ५७४ | २२० | विपश्चिदुपाख्यान | ६८० | २४९ | जाग्रत्स्वप्नप्रतिपादन | ७९४ |
| १९१ | विराट् शरीर | ५७८ | २२१ | विपश्चित्शरीरप्राप्ति | ६८५ | २५० | शिलोपाख्यानसमाप्ति | ७९५ |
| १९२ | जगत्त्रयप्रलय | ५७६ | २२२ | वटधानोपाख्यान | ७०० | २५१ | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिअभाव | ७९८ |
| १९३ | ब्रह्मजलमय | ५८१ | २२३ | विपश्चित्कथा | ७०३ | २५२ | शालभञ्जनकोपदेश | ८०२ |
| १९४ | वासनाक्षयप्रतिपादन | ५८१ | २५३ | जीवन्मुक्तलक्षण | ८०७ | |||
| १९५ | जगन्मिथ्यात्वप्रति- |
४ योगवासिष्ठ
| सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क | सर्गाङ्क | विषय | पृष्ठाङ्क |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २५४ | जीवन्मुक्तिबाह्य-लक्षणव्यवहार | ८१० | २६६ | ब्राह्मणसद्विषयत-राज्यप्राप्ति | ८४६ | २७८ | गुरुशास्त्रउपमा | ८९५ |
| २५५ | द्वैतएकताअभाव | ८१३ | २६७ | कुन्ददन्तोपदेश | ८५३ | २७९ | विश्रामप्रकटी-करण | ८९८ |
| २५६ | स्मृतिअभावजगत्-परमाकाश | ८१६ | २६८ | कुन्ददन्तविश्राम-प्राप्ति | ८५८ | २८० | निर्माणनिरूपण | ९०७ |
| २५७ | ब्रह्मजगदेकताप्रति-पादन | ८२० | २६९ | ब्रह्मप्रतिपादन | ८६० | २८१ | चिदाकाशजगदेकता प्रतिपादन | ९०६ |
| २५८ | ब्रह्मगीतापरम-निर्वाण | ८२२ | २७० | जीवसंस्मरण | ८६८ | २८२ | जगदभाव | ९११ |
| २५९ | परमार्थगीता | ८२५ | २७१ | सब्रह्मरूपप्रति-पादन | ८७२ | २८३ | प्रश्न | ९१४ |
| २६० | ब्रह्माण्डोपाख्यान | ८२६ | २७२ | विद्यावादप्रबोधो-पदेश | ८७४ | २८४ | प्रश्नोत्तर | ९१६ |
| २६१ | ब्रह्मगीता | ८३१ | २७३ | रामविश्रान्ति | ८८५ | २८५ | द्वितीय प्रश्नोत्तर | ९१८ |
| २६२ | इन्द्राख्यान | ८३५ | २७४ | तथा | ८८७ | २८६ | राजप्रश्नोत्तर-समाप्ति | ९२० |
| २६३ | सर्वब्रह्मप्रतिपादन | ८३६ | २७५ | तथा | ८८८ | २८७ | पूर्व रामकथा | ९२३ |
| २६४ | ब्रह्मगीतोपाख्यान | ८४१ | २७६ | तथा | ८९० | २८८ | उत्साह | ९२७ |
| २६५ | ब्राह्मणकथा | ८४६ | २७७ | चिन्तामणिसमाप्ति | ८९३ | २८९ | मोक्षोपाय<br>इति | ९२८ |
श्रीगणेशाय नमः
श्रीयोगवाशिष्ठ
द्वितीय भाग
निर्वाण प्रकरण प्रारम्भ
वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! उपशम प्रकरण के अनन्तर अब तुम निर्वाण प्रकरण सुनो, जिसके जानने से तुमको निर्वाणपद प्राप्त होगा । मुनिनायक ने रामजी से बड़े उत्तम वचन कहे और रामजी ने सब ओर से मन खींचकर मुनीश्वर के वाक्यों में लगाया । राजा लोग भी निस्पन्द हो गये, मानों कागज पर चित्र लिखे हैं—और वशिष्ठजी के वचनों को विचारने लगे । राजकुमार भी विचारते, गर्दन हिलाते और अपने सिर पर हाथ फेरते विस्मय-मग्न हो गये । उन्हें यह जानकर प्रसन्नता के साथ ही आश्चर्य भी हुआ कि जिस जगत् को सत्य जानकर वे तल्लीन हो रहे थे वह है ही नहीं । तब दिन का चतुर्थ भाग रह गया और सूर्य अस्त हुए—मानों वशिष्ठजी के वचन सुनकर सूर्य भी कृतार्थ हुए । उनका ताप घट गया और शीतलता प्राप्त हुई । स्वर्ग से जो सिद्ध और देवता आये थे, उनके गले में मन्दार आदि वृक्षों के फूलों की मालाएँ थीं । उनसे पवन के द्वारा सब स्थान सुगन्धित हो गये । भँवरे फूलों पर गुञ्जार करने लगे । झरोखों के मार्ग से सूर्य की किरणें जो आती थीं, उनसे सूर्यमुखी कमल, जो राजा और देवताओं के सीस पर थे, वैसे ही सूख गये, जैसे मन से जगत् की सत्ता निवृत्त हो जाती है और वृत्ति सकुचती जाती है । सभा में जो बालक और पिञ्जरों में जो पक्षी बैठे थे, उनके भोजन का समय हुआ । बालकों को भोजन कराने के निमित्त माताएँ उठीं । जब चौथे पहर राजद्वार पर नौबत, नगाड़े, भेरी, शहनाई आदि बाजे बजने लगे और
२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
वशिष्ठजी, जो बड़े ऊँचे स्वर से कथा कहते थे, उनका शब्द नगाड़े और बाजों से दब गया, तब—जैसे वर्षाकाल का मेघ गरजता है और मोर बोलकर चुप हो जाते हैं, वैसे ही वशिष्ठजी चुप हो गये । ऐसा शब्द हुआ जो आकाश, पृथ्वी और सब दिशाओं में भर गया । पिञ्जरों में पक्षी पंखों को फैलाकर भड़ भड़ शब्द करने लगे—जैसे भूकम्प में लोग काँपते और शब्द करते हैं । बालक माताओं के शरीर से लपट गये ।
इसके अनन्तर मुनिशार्दूल वशिष्ठजी बोले कि हे निष्पाप, रघु-नाथ ! मैंने तुम्हारे चित्तरूपी पक्षी को फँसाने के निमित्त अपना वाकरूपी जाल फैलाया है, इससे अपने चित्त को वश करके तुम आत्मपद में लगो । हे राम ! यह जो मैंने तुमको उपदेश किया है, उसके सार में, दुर्बुद्धि को त्यागकर, चित्त लगाओ । जैसे हंस जल को त्यागकर दूध पान करता है, वैसे ही आदि से अन्त पर्यन्त सब उपदेश बारम्बार विचारकर सार को अङ्गीकार करो । इस प्रकार संसार-समुद्र से तरकर परमपद को प्राप्त होगे । अन्यथा नहीं । हे राम ! जो इन वचनों को अङ्गीकार करेगा, वह संसारसमुद्र तर जावेगा और जो अङ्गीकार न करेगा वह नीच गति को प्राप्त होगा । जैसे विन्ध्याचल पर्वत की खाईं में हाथी गिरकर कष्ट पाता है वैसे ही वह संसार में कष्ट पावेगा । हे राम ! ये जो मेरे वचन हैं, इनको ग्रहण न करोगे तो वैसे ही नीचे गिरोगे जैसे पथिक हाथ से दीपक त्याग कर रात को गढ़े में गिरता है । जो असंग होकर व्यवहार में विचरोगे तो आत्मसिद्धि को प्राप्त होगे । यह जो मैंने तुमको तत्त्वज्ञान, मन का दमन और वासना का क्षय कहा है, इसके अभ्यास से सिद्धि को प्राप्त होगे । यह शास्त्र का सिद्धान्त है। हे सभासदो ! हे महाराजौ, हे राम, लक्ष्मण और भूपति लोगो, जो कुछ मैंने तुमसे कहा है उसको तुम विचारो; जो कुछ और कहना है उसे मैं प्रातःकाल कहूँगा ।
इतना कह वाल्मीकिजी बोले, हे साधो ! इस प्रकार जब मुनीश्वर ने कहा तब सब सभा उठ खड़ी हुई और वशिष्ठजी के वचनों को सुन-