योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । =१५
अनथा और संसार का कारण संग है। सब इच्छाओं का कारण संग है और सब आपदाओं का कारण संग है, संग के त्याग से मोक्षरूप और अजन्मा होता है। इससे संग को त्यागकर और जीवन्मुक्त होकर विचरो। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आप सर्वसंशयरूपी कुहिरे के नाशकर्त्ता शरत्काल के पवन हैं संग किसको कहते हैं, यह संक्षेप से मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! भाव-अभाव जो पदार्थ हैं वह हर्ष और शोक के देनेवाले हैं। जिस मलिन वासना से यह प्राप्त होते हैं वही वासना संग कहलाता है। हे रामजी ! देह में जो अहंबुद्धि होती है और संसार की जो सत्य प्रतीति है तो उस संसार के इष्ट अनिष्ठ को रागद्वेष सहित ग्रहण करता है, ऐसी मलीन वासना संग कहाती है और जीवन्मुक्त की वासना हर्ष शोक से रहित शुद्ध होती है—सो निस्संग कहाता है। उसकी वासनाएँ जन्म मरण का कारण नहीं होती। हे रामजी ! जिस पुरुष को देह में अभिमान नहीं होता और जिसकी स्वरूप में स्थिति है वह शरीर के इष्ट अनिष्ठ में रागद्वेष नहीं करता, क्योंकि उसका शुद्ध वासना है और जो कर्त्ता है सो बन्धन का कारण नहीं होता। जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही ज्ञानवान् की वासना जन्म-मरण का कारण नहीं होती और जिसकी वृत्ति जगत् के पदार्थों में स्थित है और रागद्वेष से ग्रहण त्याग करता है ऐसी मलीन वासना जन्मों का कारण है इस वासना को त्यागकर जब तुम स्थित होगे तब तुम करते हुए भी निर्लेप रहोगे और हर्ष शोकादि विकारों से जब तुम रहित होगे तब वीतराग और भय और क्रोध से असंग होगे । हे रामजी ! जिसका मन असंग हुआ है वह जीवन्मुक्त हुआ है। इससे तुम भी वीतराग होकर आत्मतत्त्व में स्थित हो । जीवन्मुक्त पुरुष इन्द्रियों के ग्राम को निग्रह करके स्थित होता है और मान, मद, वैर को त्यागकर सन्ताप से रहित स्थित होता है। वह सब आत्मा जानकर कर्म करता है परन्तु व्यवहार बुद्धि से रहित असंग होकर कर्म करता है । वह कर्त्ता भी अकर्त्ता है उसको आपदा अथवा सम्पदा प्राप्त हो अपने स्वभाव को नहीं त्यागता, जैसे क्षीरसमुद्र ने मन्दराचल पर्वत को पाकर शुक्लता को नहीं त्यागा,