योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 807, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८१६ योगवाशिष्ठ ।
तैसे ही जीवन्मुक्त अपने स्वभाव को नहीं त्यागते । हे रामजी ! आपदा प्राप्त हो अथवा चक्रवर्ती राज्य मिले, सर्प का शरीर प्राप्त हो अथवा इन्द्र का शरीर प्राप्त हो, इन सबमें वह सम और आत्मभाव से स्थित होता है और हर्ष शोक को नहीं प्राप्त होता । वह सब आरम्भों को त्यागकर नानात्वभाव से रहित स्थित होता है । विचार करके जिसने आत्मतत्त्व पाया है वह जैसे स्थित हो तैसे ही तुम भी स्थित हो । इसी दृष्टि को पाकर आत्मतत्त्व को देखो तब विगतज्वर होगे और आत्मपद को पाकर फिर जन्म-मरण के बन्धन में न आवोगे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे आर्षे देवदूतोक्तमहारामायणे मोक्षोपायनाम एकोननवतितमसर्गः ॥ ८६ ॥
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे पञ्चमं समाप्तम् ॥
श्रीमती स्मिता पटवर्धन द्वारा
क्लासिक आफ़सेट प्रिंटिंग, जे.एन. रोड, से मुद्रित