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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 783

७६२ | योगवाशिष्ठ ।

वह पदार्थों में नहीं डूबता। जो अज्ञानी है वह सिद्धता के निमित्त इन पदार्थों को साधता है और जो ज्ञानवान् है वह इन पदार्थों के वास्ते यत्न नहीं करता। यत्न करने से ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी हो इन्द्रादिकों के ऐश्वर्य को पाता है। और वह ज्ञान की शक्ति नहीं, द्रव्य आदि की शक्ति है सो अविद्यारूप है। अज्ञानी इनकी ओर धावते हैं ज्ञानवान् नहीं धावते, क्योंकि वे सबसे अतीत हैं। जिसने सब इच्छा का त्याग किया है और आत्मपद में संतोष पाया है वह इनकी इच्छा नहीं करते। इनकी इच्छा भोगों अथवा बड़ाई के निमित्त होती है अथवा मान और जीने और सिद्धि के निमित्त होती है। अज्ञानी को भोगों की सिद्धता की और मान की इच्छा नहीं होती, क्योंकि ये सब अनात्म धर्म हैं और वह नित्यतृप्त, परमशान्तरूप, वीतराग, निर्वासनिक पुरुष है और आकाश की नाईं सदा अपने आपमें स्थित हैं। जैसे सुख स्वाभाविक आता है तैसे ही दुःख भी स्वाभाविक आता है शरीर के सुख दुःख की अवस्था में वह चलायमान नहीं होता, नित्यतृप्त और असंग होता है और जीवन मरण की वृत्ति उसको नहीं फुरती सबमें सम रहता है। जैसे समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं और समुद्र अपनी मर्यादा में स्थित रहता है तैसे ही ज्ञानवान् को क्षोभ नहीं प्राप्त होता। हे रामजी ! जो कुछ ज्ञानवान् को प्राप्त होता है उसे वह आत्मा में अर्चन करता है, उसको करने में कुछ अर्थ नहीं और न करने में कुछ प्रत्यवाय है। उसको किसी का आश्रय नहीं, सदा अपने स्वरूप में स्थित है और यह मन्त्रसिद्धि कालकर्म से होता है। एक योगक्रिया ऐसी है कि उसके साधने से उड़ने की शक्ति हो आती है, एक मन्त्रों से शक्ति होती और एक गुटका मुख में रखने से उड़ने इत्यादिक की शक्ति होती है, शक्ति की नीति प्रथम ही हो रहती है। उससे अन्यथा नहीं होती। हे रामजी ! जैसी शक्ति जिस साधन से नियत हुई है उसको सदाशिव भी अन्यथा नहीं कर सकते, क्योंकि वह स्वाभाविक स्वतः सिद्ध है-जैसे चन्द्रमा में शीतलता और अग्नि में उष्णता है इत्यादिक आदि नीति है उसको कोई दूर नहीं कर सकता और सर्वज्ञ जो विष्णु भगवान् हैं वे भी अन्यथा नहीं कर