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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 782, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 782

उपशम प्रकरण । ७६१

तत्त्व में स्थित होता है और रागद्वेष आदि विकार उसके मिट जाते हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहव्यविश्रान्तिसमाप्ति-
र्नाम चतुरशीतितमसर्गः ॥ ८४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वीतहव की नाईं विदितवेद होकर तुम भी रागद्वेष से रहित स्थित हो । जैसे तीस सहस्र वर्ष वीतहव्य वीतशोक और जीवन्मुक्त होकर विचरा है तैसे ही तुम भी विचरो । और भी बोध-वान् राजा और मुनीश्वर हुए हैं, जैसे वे उस पद में प्राप्त हुए राज्यादिक व्यवहार में रहे हैं तैसे ही तुम भी जीवन्मुक्त होकर रहो । हे रामजी ! सुख दुःख कर्म आत्मा को स्पर्श नहीं करते, आत्मा सर्वज्ञ है, तुम किस निमित्त शोक करते हो ? बहुत विदितवेद पृथ्वी में विचरते हैं परन्तु शोक को कदाचित नहीं प्राप्त होते—जैसे तुम अब शोक नहीं करते हो । हे रामजी ! तुम अब स्वस्थ उदार शम और सर्वज्ञ हो, अब तुमको फिर जन्म न होगा । जीवन्मुक्त पुरुष जो अपने स्वरूप में स्थित है वह हर्ष-शोक को प्राप्त नहीं होता । जैसे सिंह वानर और शृगाल आदिक के वश नहीं होता है तैसे ही जीवन्मुक्त विकारों से रहित होता है । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! इस प्रसंग में मुझको संदेह हुआ है उसको जैसे शरत्काल में मेघ नष्ट हो जाता है तैसे ही नाश करो । हे तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ ! जीवन्मुक्त के शरीर में शक्ति क्यों नहीं दृष्टि आती कि आकाश में उड़ता फिरे और सूक्ष्म रूप से और शरीर में प्रवेश कर जावे इत्यादिक ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आकाशगमनादिक जो सिद्धि हैं सो तपादिक कर्मों की शक्ति हैं । जो कुछ जगत् विचित्र दिखाई देना और फिर गुप्त हो जाना इत्यादिक हैं वे वस्तु द्रव्य, क्रिया के स्वभाव हैं, आत्मज्ञान के नहीं । हे रामजी ! कोई द्रव्य, क्रिया और काल को यथा-क्रम साधता है उसको ही शक्ति प्राप्त होती है और ज्ञानी साधे अथवा अज्ञानी साधे उसको शक्ति प्राप्त होती है परन्तु वह शक्ति आत्मज्ञान का फल नहीं । आत्मज्ञानी को आत्मज्ञान की ही सिद्धता होती है, वह आत्मा से ही तृप्त होता है और सिद्धि जो अविद्यारूप हैं उनकी ओर नहीं धावता । जो कुछ जगत् है वह उसने अविद्यारूप जाना है इससे