योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है ऐसे आकाश से निर्मल पद को वीतहव मुनीश्वर प्राप्त हुआ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहवनिर्वाणयोगोपदेशो नाम त्र्यशीतितमसर्गः ॥ ८३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दुःखरूप संसारसमुद्र के पार हो वीतहव मुनीश्वर उस परमपद को प्राप्त हुआ जिस पद के प्राप्त हुए जीव फिर जन्ममरण को नहीं पाता और जिस पद में स्थित हुआ परमशान्त उपशम आनन्द को प्राप्त होता है—जैसे समुद्र में पड़ी हुई बुन्द समुद्र हो जाती है तैसे ही ब्रह्मसमुद्र में वह ब्रह्म हो गया और शरीर जो था वह विरस होकर गिर पड़ा जैसे शीतकाल में वृक्षों के सूखे पत्र गिर पड़ते हैं। शरीररूपी वृक्ष में हृदयरूपी आलय था और उसमें प्राणरूपी पक्षी रहता था सो चिदाकाश में प्राप्त हुआ जैसे गोफन से पत्थर धावता है तैसे ही जो प्राप्त हुआ और अपने स्वरूप में स्थित हुआ। हे रामजी ! यह मैंने वीतहव की कथा तुमको सुनाई है सो अनन्त विचारकर युक्त है। इस प्रकार विचारकर वीतहव विश्रामवान् हुआ है। तुम भी उसको विचारकर सिद्धता के सार को प्राप्त हो और दृश्य की चिन्तना को त्याग के सावधान हो। हे रामजी ! जो कुछ मैंने तुझसे पूर्व कहा है कि उस पद में प्राप्त हुआ फिर कुछ पाने योग्य नहीं रहता और अब जो कुछ कहता हूँ और जो कुछ पीछे कहूँगा उसको विचारो। मुक्तिज्ञान ही से होती है और ज्ञान ही से सब दुःख नष्ट होते हैं, ज्ञान ही से अज्ञान निवृत्ति होता और ज्ञान ही से परम सिद्धता को प्राप्त होता है। पाने योग्य यही वस्तु है, और कोई दुःखों का नाश नहीं कर सकता। यह निश्चय है कि ज्ञान से सब फाँसी कट जाती है और ज्ञान ही से वीतहव ने मन को चूर्ण किया। हे रामजी ! वीतहव की संवित् जगत् के अतीत हो गई। जो कुछ दुःख है वह मन से होता है और मन के उपशम हुए सब जगत् अनुभवरूप हो जाता है। वीतहव भी मनोमात्र था, मैं भी मनोमात्र हूँ, तू भी मनोमात्र है और पृथ्वी आदि जगत् भी सब मनोमात्र है, मन से भिन्न कुछ नहीं। जहाँ मन होता है वहाँ जगत् होता है, मन ही जगत्रूप है और जगत् ही मनरूप है। जो ज्ञानवान् पुरुष है वह मन की दशा को त्याग के केवल चिदानन्द आत्म-