योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 815, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
चुके तब राम आदि ने उनकी अर्घ्य पाद्य से पूजा की और चरणों पर सिर रखकर प्रणाम किया। जब रामजी गये थे, तब वशिष्ठजी के पास कोई न था; पर एक घड़ी में अनेक सहस्र प्राणी आ गये। वशिष्ठजी राम आदि को साथ लेकर राजा दशरथ के भवन में आये। तब राजा दशरथ उनके स्वागत और अगवानी को आगे आये। उन्होंने वशिष्ठजी का आदर व पूजन किया। दूसरे लोगों ने भी बहुत पूजन किया। निदान नभचर और भूचर जितने श्रोता थे, वे सब आये और नमस्कार करके निस्पन्द और एकाग्र होकर बैठे। जैसे वायु के न चलने पर कमलों की पंक्ति अचल होती है वैसे ही निश्चल होकर वे सब बैठे। भाटजन जो स्तुति करने वाले थे वे भी एक ओर बैठे। सूर्य की किरणें झरोखों के मार्ग से आईं—मानों किरणें भी वशिष्ठजी के वचन सुनने को आई हैं। तब वशिष्ठजी की ओर रामजी ने वैसे ही देखा, जैसे स्वामिकार्त्तिक शंकर की ओर, कच बृहस्पति की ओर और प्रह्लाद शुक्र की ओर देखें। जैसे भ्रमर भ्रमता भ्रमता आकाशमार्ग से कमल पर आ बैठता है वैसे ही रामजी की दृष्टि औरों को देखते-देखते वशिष्ठजी पर आकर टिक गई।
तब वशिष्ठजी ने रामजी की ओर देखा और बोले, हे रघुनन्दन! मैंने जो तुमको उपदेश किया है, वह तुमको कुछ स्मरण है? वे वचन परमार्थबोध के कारण, आनन्दरूप और महा गम्भीर हैं। अब और भी बोध देनेवाले और अज्ञानरूपी शत्रु के नाशक वचनों को सुनो। निरन्तर आत्मसिद्धान्त शास्त्र मैं तुमसे कहता हूँ। हे रामजी! जीव वैराग्य और तत्त्व के विचार से संसारसमुद्र को तरता है। सम्यक्तत्त्व के बोध से जब दुर्बोध निवृत्त हो जाता है, तब वासना का आवेश नष्ट हो जाता है और परमानन्द पद प्राप्त होता है। वह पद देशकाल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है। वही एकमात्र ब्रह्म जगतरूप होकर स्थित है और भ्रम से द्वैत की भाँति प्रतीत होता है। वह सब भावों से अविच्छिन्न सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म है, इस प्रकार महत् स्वरूप जानकर शान्ति पाओ। हे राम! केवल ब्रह्मतत्त्व अपने आप में स्थित है। न