योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 816, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊
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कुछ चित्त है, न अविद्या है, न मन है, न जीव है। यह सब कलना ब्रह्म में भ्रम से फुरती है। जो स्पन्द फुरना दृश्य और चित्त है सो कलनारूप संभ्रम है। केवल ब्रह्म में कोई पदार्थ नहीं। हे राम ! स्वर्ग, पाताल और भूमि में सदाशिव से तृण पर्यन्त जो कुछ दृश्य है वह सब परब्रह्म है—चिद्रूप से अन्य नहीं। उदासीन और मित्र बांधव से लेकर सब कुछ ब्रह्म ही है। जब तक अज्ञान कलना से जगत् में बुद्धि स्थित है और ब्रह्मभाव में नानात्व है, तभी तक चित्तादि की कलना होती है। जब तक देह में अहंभाव है और अनात्मदृश्य में ममत्व है तभी तक चित्त आदि का भ्रम होता है और जब तक सन्त जन और सत्-शास्त्रों के उपदेश से ऊँचे पद को जीव नहीं पाता और मूर्खता क्षीण नहीं होती तभी तक चित्त आदि का भ्रम होता है।
हे राम ! जब तक देहाभिमान शिथिल नहीं होता, संसार की भावना नहीं मिटती और सम्यक्ज्ञान द्वारा स्थिति नहीं प्राप्त होती, जब तक चित्त आदिक प्रकट हैं, तभी तक जीव अज्ञान से अन्धा होकर विषयों की आशा के आवेश से मूर्च्छित रहता है और मोह मूर्च्छा से नहीं उठ पाता, तभी तक चित्त आदि की कलना होती है। हे राम ! जब तक आशारूपी विष की गन्ध हृदयरूपी वन में होती है तबतक विचाररूपी चकोर नहीं प्राप्त होता और भोगवासना नहीं मिटती। जब भोगों की आशा मिट जाती है और सत्य शीतलता और सन्तोष हृदय में उत्पन्न होती है, तब चित्तरूपी भ्रम निवृत्त हो जाता है। जब जीव का मोह और तृष्णा निवृत्त होकर नित्य अभ्यास हो जाता है, तब चित्त शान्त भूमिका को प्राप्त होता है। हे राम ! जो पुरुष स्वरूप में स्थित होता है वह अपने को देह से भिन्न देखता है। उस सम्यक्दर्शी के चित्त की भूमिका सुनो। जब अनन्त चेतनतत्त्व की भावना होती है और जीव दृश्य को त्यागकर आत्मरूप को जान लेता है, तब वह सब जगत् को अपना अंग ही देखता है अर्थात् सर्वत्र अपना स्वरूप देखता है। ऐसे जो आत्मरूप देखता है, उसको जीवत्वादिक भ्रम कहाँ है ? जब अज्ञान भ्रम निवृत्त होता है तब परम अद्वैत पद उदय होता है। जैसे