योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 818, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right;">७</span>
आदि अन्त से रहित हुए। निदान सब तुम ही हो। अपने स्वरूप को स्मरण करो, तब शान्ति पाओगे। तुम सब भावों में स्थित हो और सबको उदय करनेवाले शान्तरूप, चैतन्य ब्रह्मरूप हो। हे रामजी ! ऐसी जो चैतन्यरूपी शिला है उसके उदय में वासनारूपी फुरना कहाँ हो ? वह तो महाघनरूप है। हे राम ! जो तुम हो वही ब्रह्म है, उसमें और तुम में कुछ भेद नहीं। वही ब्रह्म सत् और असतरूप होकर भासता है। उसके भीतर सब पदार्थ हैं, उसमें नानात्व और 'अहं' 'त्वं', 'अज्ञ', 'तज्ञ' की कुछ कलना नहीं। ऐसा जो सत्यरूप चिद्धन ब्रह्ममय आत्मा है, उसको नमस्कार है। हे राम ! तुम्हारी जय हो। तुम आदि और अन्त से रहित विशाल हो, शिला की तरह ठोस चिद्धनस्वरूप और आकाश की भाँति निर्मल हो। जैसे समुद्र में तरंगें हैं, वैसे ही तुम में जो जगत् है सो लीलामात्र है। तुम अपने घनस्वरूप में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्रामदृढ़ीकरणं नाम द्वितीयसर्गः ॥ २ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप राम ! जिस चैतन्यरूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग उठते और लीन हो जाते हैं उस अनन्त आत्मभाव की भावना से मुक्त और भाव-अभाव से रहित तुम हो। ऐसा जो चिदात्म तुम्हारा स्वरूप है वही सब जगतरूप है; तब वासनादिक आवरण कहाँ हैं ? जीव और वासना सब आत्मा का किञ्चन है दूसरी वस्तु कुछ नहीं, तब और कथा और प्रसंग कैसे हो ? हे राम ! महासरल गम्भीर और प्रकाशरूप जो चैतन्य समुद्र है वह तुम्हारा रूप है और रामरूपी एक तरङ्ग उठ आया है। सो समुद्र तुम हो। ऐसा जो आत्मतत्त्व है वह जगतरूपी होकर व्यापारयुक्त भासित होता है। जैसे अग्नि से उष्णता, फूल से सुगन्ध, कज्जल से कालापन, बर्फ से सफेदी, गुड़ से मधुरता और सूर्य से प्रकाश भिन्न नहीं, वैसे ही ब्रह्म से अनुभव भिन्न नहीं। वह नित्य रूप है। अनुभव से अहं भिन्न नहीं, अहं जीव से भिन्न नहीं, जीव से मन भिन्न नहीं, मन से इन्द्रियाँ भिन्न नहीं, इन्द्रियों से देह भिन्न नहीं और देह से जगत् भिन्न नहीं। इस प्रकार महाचक्र जो प्रवृत्त