योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 819, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
हुआ है सो कुछ हुआ नहीं । न शीघ्र प्रवर्तन है न चिरकाल का प्रवर्त्ता है । न कोई न्यून है और न अधिक है । सर्वदा एक अखण्डसत्ता परमात्मात्त्व है । जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है । वही सत्ता वज्रभूत और वही पूर्ण होकर स्थित है । द्वैतकल्पना कुछ नहीं । ऐसे जो पुरुष अपने स्वरूप में स्थित है, वह जीवन्मुक्त है । ऐसा जो ज्ञानवान् है वह मन, इन्द्रिय और शरीर की चेष्टा भी करता है, पर उसको कर्तव्य का लेप नहीं लगता ।
हे राम ! ज्ञानवान् को न कुछ त्यागने योग्य रहता है और न ग्रहण करने योग्य । यह सब पदार्थों से निर्लिप्त रहता है । जब तक इसको ग्रहण और त्याग की बुद्धि होती है तब तक यह संसार के सुख-दुःख का भागी होता है । जिसके लिए हेय ( त्यागने योग्य ) और उपादेश ( ग्रहण करने योग्य ) कुछ नहीं रहता, वह सुख-दुख का भागी नहीं होता । हे राम ! जो कुछ जगत् है, वह एक अद्वैत आत्मतत्त्व है, अन्य कुछ नहीं । जैसे घट मठ की उपाधि से आकाश नाना प्रकार का और समुद्र तरङ्गों से अनेक रूप भासित होता है पर नानात्वभाव को नहीं प्राप्त होता, वैसे ही आत्मा में नाना प्रकार का जगत् भासता है और नानात्व को नहीं प्राप्त होता । तुम ऐसे स्वरूप को जानकर उसमें स्थित हो, बाहर से अपने वर्णाश्रम का व्यवहार करो, पर हृदय से पत्थर की नाईं हर्ष-शोक से रहित स्थित हो । संवित्मात्र आत्मा को जो अपना रूप देखता है वही सम्यक्दर्शी है, उसका अज्ञान और मोह नष्ट हो जाता है । जैसे नदी का वेग मूलसहित तट के वृक्ष को काटता है वैसे ही आत्म-ज्ञान मोहसहित अज्ञान को काटता है । मित्रता, वैर, हर्ष, शोक, राग, द्वेष आदिक जो विकार हैं वे चित्त में रहते हैं, उसका तो चित्त नष्ट हो जाता है ।
हे राम ! ज्ञानी सोता भी देख पड़ता है, पर कदाचित् नहीं सोता । जिसका अनात्मा में अहंभाव निवृत्त हुआ है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह पुरुष चाहे इस लोक को मार डाले तो भी उसने किसी को नहीं मारा और न उसे कर्मबन्धन होता है । हे राम ! जो वस्तु न