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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 820, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 820

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६

हो और न भासित हो उसको मायामात्र जानिये। ज्ञान से वह नष्ट हो जायगी। जैसे तेल के बिना दीपक शान्त हो जाता है वैसे ही ज्ञान से वासना का क्षय हो जाता है और चित्त अचित्त हो जाता है। जिसके लिए सुख-दुःख का ग्रहण-त्याग नहीं, वह जीवनमुक्त आत्मस्थित है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकप्रतिपादनं नाम तृतीयसर्गः ॥ ३ ॥

वशिष्टजी बोले, हे राम ! मन, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रिय आदिक जो दृश्य पदार्थ हैं, वे सब वही अचिन्त्य चिन्मात्र है और जीव भी इससे अभिन्न है। जैसे सुवर्ण और भूषण में कुछ भेद नहीं, वैसे ही चिन्मात्र और जीवादिक अभिन्न हैं। जब तक चित्त अज्ञान में होता है तब तक जगत् (जन्म-मरण) का कारण होता है; पर जब ज्ञान अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब चित्तादिक का अभाव हो जाता है। अध्यात्म-विद्या जो वेदान्तशास्त्र है उसके अभ्यास से अज्ञान नष्ट हो जाता है। जैसे अग्नि के तेज से शीत का अभाव हो जाता है वैसे ही अध्यात्म-विद्या के विचार और अभ्यास से अज्ञान नष्ट हो जाता है। जब तक अज्ञान का कारण तृष्णा उपशम को नहीं प्राप्त होती तभी तक अज्ञान है। जब तृष्णा नष्ट हो तब जानिये कि अज्ञान का अभाव हुआ। हे राम ! तृष्णारूपी विशूचिका रोग नष्ट करने का मन्त्र अध्यात्मशास्त्र ही है। उसके अभ्यास से तृष्णा क्षीण हो जाती है। जैसे शरत्काल में कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्म अभ्यास से चित्त शान्त हो जाता है; और जैसे शरत्काल में मेघ नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही विचार से मूर्खता नष्ट हो जाती है। जब चित्त अचित्तता को प्राप्त होता है तब वासना-भ्रम क्षीण हो जाता है। जैसे तागे से मोती पिरोये होते हैं और तागे के टूटने से मोती भिन्न भिन्न हो जाते हैं, वैसे ही अज्ञान के नष्ट होने पर मन आदिक सब नष्ट हो जाते हैं। जो पुरुष अध्यात्मशास्त्र के अर्थ को नहीं धारण करते और न प्रीति ही करते हैं वे पापी कीटादिक नीचयोनि को प्राप्त होंगे।

हे कमलनयन ! तुममें जो कुछ मूर्खता और चञ्चलता थी, वह