योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 822, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ११
द्वेष आदिक धूल और कुहरा था सो सब निवृत्त हो गया है और ज्ञान-रूपी वर्षा से वह शान्त हो गया है। अब मैं आत्मानन्द को प्राप्त हुआ हूँ, जो आदि अन्त से रहित और अमृत है; बल्कि अमृत का स्वाद भी उसके आगे तुच्छ लगता है। ऐसे आनन्द से मैं अपने स्वभाव में प्राप्त हुआ हूँ। मैं राम अर्थात् सबमें रमनेवाला हूँ; मेरा मुझको नमस्कार है।
अब मैं सब सन्देह से रहित हूँ और सब संशय और विकार मेरे नष्ट हो गये हैं। जैसे प्रातःकाल होने से निशाचर और बैताल आदिक छिप जाते हैं, वैसे ही राग-द्वेषादिक विकारों का अभाव हुआ है और निर्मल विस्तीर्ण हिम की नाईं हृदयकमल में मैं स्थित हूँ। जैसे भँवरा फिरता फिरता कमल में आकर टिकता है, वैसे ही मैं आत्मरूपी सार में स्थित हूँ। अविद्यारूपी कलङ्क आत्मा को कहाँ था ? मैं तो निश्चय से निर्मल हूँ। जैसे सूर्य के उदय होने पर तम का अभाव हो जाता है वैसे ही मेरा संशय और अविद्या नष्ट हुई है। अब मुझे सर्वत्र आत्मा भासता है और कलना कोई नहीं है। भावित आकार अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ। मैं पूर्व प्रकृति को देखकर हँसता हूँ कि क्या जानता था और क्या करता था। मैं तो नित्य शुद्ध, ज्यों का त्यों, आदि-अन्त से रहित हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे वचनरूपी अमृत के समुद्र में मैंने स्नान किया है और उससे अजर अमर आनन्दपद को पाकर सूर्य से भी ऊँचे पद को प्राप्त हुआ हूँ। मैं वीतशोक होकर परम शुद्धता, समता, शीतलता और अद्वैत अनुभव को पा गया हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे राघवविश्रान्तिवर्णनं नाम पञ्चमसर्गः ॥ ५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहो ! फिर भी मेरे परम श्रेष्ठ वचन सुनो; यह तुम्हारे हित की कामना से मैं कहता हूँ। अब तुम आत्मपद को प्राप्त हुए हो; परन्तु बोध की वृद्धि के निमित्त फिर सुनो। इसके सुनने से अल्पबुद्धि भी आनन्दपद को प्राप्त होता है। हे राम ! जिसको अनात्म में आत्माभिमान है और आत्मज्ञान नहीं हुआ, उसको इन्द्रियरूपी शत्रु दुःख देते हैं; जैसे निर्बल पुरुष को चोर दुःख देते हैं। पर जो