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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 823, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 823

१२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

आत्मपद में स्थित हुआ है, उसको इन्द्रियाँ दुःख नहीं देतीं । जैसे दृढ़ राजा के शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, वैसे ही ज्ञानवान् के इन्द्रियगण मित्र होते हैं। जिन पुरुषों की देह में स्थिति-बुद्धि है और इन्द्रियों के विषय का सेवन करते हैं उनको बड़े दुःख प्राप्त होते हैं । हे राम ! आत्मा और शरीर का सम्बन्ध कुछ नहीं है । जैसे तम और प्रकाश परस्पर विलक्षण स्वभाव हैं, वैसे ही आत्मा और देह का परस्पर विलक्षण स्वभाव है ।

आत्मा सब विकारों से रहित, नित्यमुक्त, उदय-अस्त से रहित और सबसे निर्लिप्त है और सदा ज्यों का त्यों प्रकाशरूप भगवान् आत्मा सद्रूप है । उसका सम्बन्ध किससे हो ? देह जड़ और असत्य, अज्ञान-रूप, तुच्छ, विनाशी और अकृतज्ञ है । उसका उससे संयोग किस भाँति हो ? आत्मा चैतन्य, ज्ञान, सत् और प्रकाशरूप है । उसका देह के साथ कैसे संयोग हो ? अज्ञान से देह और आत्मा का संयोग भासता है । सम्यक्ज्ञान से संयोग का अभाव जान पड़ता है । हे राम ! ये मैंने निपुण वचन कहे हैं; बारम्बार इनका अभ्यास करने से संसारकृत मोह का अभाव हो जायगा । जब संसार का कारण मोह निवृत्त हुआ, तब फिर उसका सद्भाव न होगा । जब तक जीव अज्ञानरूपी निद्रा से दृढ़ होकर नहीं जागता, तब तक आवरण रहता है । जैसे निद्रा से जागने पर फिर निद्रा घेर लेती है, पर जब दृढ़ होके जागे तब फिर नहीं घेरती, वैसे ही दृढ़ अभ्यास से अज्ञान निवृत्त होने पर फिर आवरण न करेगा । इससे मोह और दुःख की निवृत्ति के अर्थ दृढ़ अभ्यास करो ।

हे राम ! आत्मा देह के गुण को अङ्गीकार नहीं करता । यदि देह के गुण अङ्गीकार करे तो आत्मा भी जड़ हो जाय । पर यह तो सदा ज्ञानरूप है और जो देह आत्मा का गुण परमार्थ से अङ्गीकार करे तो देह भी चेतन हो जाय । पर वह तो जडरूप है । उसको अपना ज्ञान कुछ नहीं । जब यथार्थ ज्ञान होता है, तब शरीर तुच्छ और जड़ भासित होता है । हे राम ! देह और आत्मा का कुछ सम्बन्ध नहीं । समवायसम्बन्ध भी नहीं । फिर इससे मिलकर वृथा दुःख को ग्रहण करने