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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 824, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 824

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १३

से बढ़के और मूर्खता क्या है ? जब कुछ भी इसका समान लक्षण न हो, तब सम्बन्ध भी हो । पर जिसका कुछ भी समान लक्षण न हो, उसका सम्बन्ध कैसे हो ? आत्मा चैतन्य है, देह जड़ है, आत्मा सतरूप है, देह असतरूप है; आत्मा प्रकाशरूप है, देह तमरूप है; आत्मा निराकार है, देह साकार है; आत्मा सूक्ष्म है और देह स्थूल है । तो फिर आत्मा और देह का सम्बन्ध कैसे हो ? और जब इनका संयोग ही नहीं, तब दुःख किसको हो ? जैसे सूक्ष्म और स्थूल, दिन और रात्रि, ज्ञान और अज्ञान, धूप और छाया, सत् और असत् का सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही आत्मा और देह का संयोग नहीं होता । देह के सुख-दुःख से आत्मा को सुखी या दुःखी मानना मिथ्या भ्रम है । जरा-मरण, सुख-दुःख और भाव-अभाव आत्मा में रञ्चमात्र भी नहीं । यदि देह में अभिमान होता है तो जीव ऊँच-नीच जन्म पाता है । वास्तव में कुछ नहीं । केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और उसमें विकार कोई नहीं । जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में होता है और जल के हिलने से प्रतिबिम्ब भी हिलता है, वैसे ही देह के सुख-दुःख से आत्मा में सुख-दुःखरूप विकार मूर्ख देखते हैं ।

आत्मा सदा निर्लेप है । जब यथाभूत सम्यक् आत्मज्ञान हो तब देह में स्थित होकर भी वह भ्रम को न प्राप्त हो । हे राम ! जब यथाभूत ज्ञान होता है, तब सत् को सत् और असत् को असत् जानता है । जैसे दीपक हाथ में होता है, तब सत्-असत् पदार्थ भासते हैं, वैसे ही ज्ञान से मनुष्य सत् असत् यथार्थ जानता है, और वैसे ही अज्ञान से मोह में भ्रमता है । जैसे वायु से पत्र भ्रमता है, वैसे ही मोहरूपी वायु से अज्ञानी जीव भ्रमता है और कदाचित् स्वस्थ नहीं होता । जैसे यन्त्र की पुतली तागे से चेष्टा करती है, वैसे ही अज्ञानी जीव प्राणरूपी तागे से चेष्टा करते हैं । और जैसे नट अनेक स्वाँग भरता है वैसे ही कर्म से जीव अनेक शरीर रखता है । जैसे काठ की पुतली तृण, काष्ठ, फूल आदि को लेती, छोड़ती और नृत्य करती है, वैसे ही ये प्राणी भी चेष्टा करते हुए शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध को ग्रहण करते हैं । जैसे वे पुतलियाँ जड़ हैं,