योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १५
हैं। मतिरूपी तालाब में हर्षरूपी कमल और चित्तरूपी भँवरे सदा रहते हैं और अज्ञानरूपी नदी में दुःखरूपी लहरें और तृष्णारूपी बुलबुले उठते हैं। यह नदी मरणरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ेगी।
हे राम ! जब जन्म होता है, तब जीव महागर्भ अग्नि से जलता हुआ निकलता है और महामूर्ख अवस्था में निकलकर दुखी होता है। वह जब यौवन अवस्था को प्राप्त होता है तब विषयों का सेवन करता है। वे भी दुःख के कारण होते हैं। फिर वृद्धावस्था को प्राप्त होता है। तब शरीर अशक्त होता है और हृदय को तृष्णा जलाती है। इस प्रकार जन्म-मरण अवस्था में जीव भटकते हैं। हे राम ! संसाररूपी कूप में मोहरूपी घटों की माला है और तृष्णा और वासनारूपी रस्सी से बँधे हुए जीव भ्रमते हैं। ज्ञानवान् को संसार कोई दुःख नहीं देता, गोपद की नाईं तुच्छ हो जाता है। पर अज्ञानी को समुद्र की तरह उससे उबरना कठिन होता है। वह अपने भीतर ही भ्रम देखता है और निकल नहीं सकता-थोड़ा भी उसको बहुत हो जाता है। जैसे पक्षी को पिंजड़े में और कोल्हू के बैल को घर ही में मार्ग दुस्तर हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी को तुच्छ संसार बड़ा दुस्तर भासता है। हे राम ! जगत् को रमणीय जानकर जीव उसके जिन पदार्थों की इच्छा करता है, वे सब पञ्चभौतिक पदार्थ हैं। पर वह मोह से उनको सुन्दर जानता है, उनमें प्रीति करता है और उन्हें स्थिर जानता है। वे सब अनर्थ के निमित्त होते हैं।
हे राम ! अज्ञानरूपी चन्द्रमा के उदय से भोगरूपी वृक्ष पुष्ट होते हैं। वे जन्मों की परंपरारूपी रस को पाते हैं, कर्मरूपी जल से सिंचते हैं और पुण्य और पापरूपी मञ्जरी उनमें होती है। अज्ञानरूपी चन्द्रमा का अमृतवासना है और आशारूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होता है। आशारूपी कमलिनी पर अज्ञानरूपी भँवरा बैठकर प्रसन्न होता है, इसलिए सब जगत् अज्ञान के कारण रमणीय भासता है। हे राम ! जिस ज्ञान से यह जगत् स्थित है, उसका प्रवाह सुनो । जब अज्ञानरूपी चन्द्रमा पूर्ण होकर स्थित होता है तब कामनारूपी क्षीरसमुद्र उमड़ता