योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 827, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
है और उसमें अनेक तरंगे उठती हैं। उसके रस से तृष्णारूपी मञ्जरी पुष्ट होती है और काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होते हैं। देहाभिमानरूपी रात्रि के निवृत्त होने पर विवेकरूपी सूर्य का उदय होता है । तब अज्ञानरूपी चन्द्रमा का प्रकाश निवृत्त हो जाता है । हे राम ! अज्ञान से जीव भ्रमते हैं और उनकी चेष्टा उल्टी हो जाती है । जो तुच्छ और नीच दुःखरूप पदार्थ है, उसको देखकर वे उनको सुखदायक और रमणीय जानते हैं और स्त्री को देख प्रसन्न होते हैं ।
कवीश्वर कहते हैं कि उसके कपोल कमल से, नेत्र भँवरे से, होठ हँसते हुए और भुजा बेलि की नाईं हैं। कञ्चन के कलश से स्तन हैं। उदर और वक्षःस्थल बहुत सुन्दर हैं। जंघाएँ केले के खंभे सी हैं। कवि जिम स्त्री की स्तुति करते हैं, वह रक्तमांस की पुतली है। कपोल भी रक्तमांस है। होठ भी रक्तमांस हैं। भुजा विष के वृक्ष की शाखा-सी हैं। स्तन भी रक्तमांस हैं और संपूर्ण शरीर भी रक्तमांस अस्थि से पूर्ण एक मूर्ति है । उसको जो रमणीय जानते हैं वे मूर्ख मोह से मोहित हुए हैं और अपने नाश की इच्छा करते हैं। जैसे सर्पिणी से जो कोई हित करेगा वह नष्ट होगा, वैसे ही इस स्त्री से प्रेम करने से नाश होगा । जैसे कदलीवन का महाबली हाथी काम से नीच गति पाता और संकट में पड़ता है और अंकुश सहकर अपमान को प्राप्त होता है। वह एक स्त्री की चाह से ही ऐसी गति को प्राप्त होता है । वैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करके अनेक दुःख पाता है। जैसे दीपक को रमणीय जानकर पतङ्ग उस पर गिरता और नष्ट होता है, वैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करता है और उसके संग से नाश को प्राप्त होता है । लक्ष्मी का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करता है वह भी सुखी न होगा । जैसे पहाड़ दूर से देखने पर सुन्दर लगता है, वैसे ही यह भी देखने में सुन्दर लगती है । पर स्त्री का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करे तो सुख न मिलेगा, अन्त में दुःख ही प्राप्त होगा । लक्ष्मी का भी यही हाल है । जब लक्ष्मी प्राप्त होती है, तब मनुष्य अनर्थ और