योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ १७
पाप करने लगता है और दुःख का पात्र होता है। और जब वह जाती है तब दुःख दे जाती है और वह उससे जलता रहता है। हे राम! जगत् में सुख की इच्छा करना व्यर्थ है। जीव जब पहले जन्म लेता है, तब भी दुःख सहता है। फिर जन्म लेकर जब मूर्ख और नीच बाल अवस्था को प्राप्त होता है तब कुछ विचार नहीं होता। उसमें दुःख पाता है। और कुछ शक्ति नहीं होती, उससे भी दुःख पाता है। जब यौवन अवस्थारूपी रात्रि आती है तब उसमें काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी निशाचर विचरते हैं और तृष्णारूपी पिशाचिनी घेरती है; क्योंकि उस अवस्था में विवेकरूपी चन्द्रमा नहीं उदय होता। इससे अन्धकार में वे सब क्रीड़ा करते हैं।
हे राम! यौवन अवस्थारूपी वर्षाकाल में बुद्धि आदि नदियाँ मलिनभाव को प्राप्त होती हैं। कामरूपी मेघ गर्जता है और तृष्णारूपी मोरनी उसको देख प्रसन्न होकर नृत्य करती है। फिर यौवन अवस्थारूपी चूहे को बुढ़ापारूपी बिल्ली खा लेती है और शरीर महाजर्जरीभूत हो निर्बल हो जाता है। तृष्णा बढ़ती जाती है और हृदय जलता है। निदान फिर मृत्युरूपी सिंह जरारूपी हरिणी को भक्षण कर लेता है। इस प्रकार मनुष्य उपजता और मरता है और आशारूपी रस्सी से बँधा हुआ घड़ी के लटकन की तरह भटकता है-शान्ति कदापि नहीं पाता। हे राम! यह ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है। उसमें जीवरूपी पत्ते लगे हैं। वे कर्मरूपी वायु से हिलते हैं। उसमें अज्ञानरूपी जड़ता है। चित्तरूपी ऊँचा वृक्ष है, उस पर लोभादिक उलूक बैठते हैं। जगतरूपी सरोवर में शरीररूपी कमल है; उस पर जीवरूपी भँवरे आ बैठते हैं और कालरूपी हाथी आकर उनको चट कर जाता है।
हे राम! जनतारूपी जीर्ण पक्षी आशारूपी फंदे से बँधे हुए वासना-रूपी पिंजड़े में पड़े हैं। वे रागद्वेषरूपी अग्नि में जल-भुनकर काल-रूपी पुरुष के मुख में पड़े प्रवेश करते हैं। जनरूपी पक्षी उड़ते फिरते हैं। किसी दिन जब कालरूपी व्याध जाल फैलावेगा तब उनको फँसा लेगा। हे राम! संसाररूपी तालाब में जीवरूपी मछलियाँ हैं, और