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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 829, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 829

१८ ❇ योगवाशिष्ठ

कालरूपी बगुला उनको भोजन करता है । कालरूपी कुम्हार जन-रूपी मृत्तिका के बर्तन बनता है और वे शीघ्र ही फूट जाते हैं । जीवरूपी नदी कर्मरूपी तरङ्गों को फैलाती है और कालरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ती है । जगतरूपी हाथी के मस्तक में जीवरूपी मोती है । उस हाथी को कालरूपी सिंह भोजन कर जाता है । वह कालरूपी भक्षक ऐसा है कि उसमें ब्रह्मा को भी नहीं छोड़ा । इस तरह सबको खाकर भी वह तृप्त नहीं होता । जैसे घृत की आहुति से अग्नि तृप्त नहीं होता वैसे ही काल जीवों के भोजन से तृप्त नहीं होता । हे राम ! एक निमेष में अनेक जगत् उपजते हैं और निमेष में लीन हो जाते हैं । सबके अभाव में जो शेष रहता है वह रुद्र है । फिर वह भी निवृत्त होता है और सबके पीछे एक परमतत्त्व ब्रह्मसत्ता रहती है । हे राम ! जो कुछ जगत् है वह अज्ञान से भासता है जन्म, मरण, बाल अवस्था, यौवन और वृद्धादिक विकार अज्ञान से भासते हैं और अज्ञान के नष्ट होने पर सब नष्ट हो जाते हैं । जब तक आत्मविचार नहीं उपजता तब तक अज्ञान रहता है और जब आत्मविचार उपजता है तब अज्ञानरूपी रात्रि निवृत्त हो जाती है, केवल ब्रह्मपद भासता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अज्ञानमाहात्म्य- वर्णनन्नाम षष्ठसर्गः ॥ ६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह संसाररूपी यौवन चेतनरूपी पर्वत के शृङ्ग पर स्थित है और अविद्यारूपी बेलि उसमें बढ़कर विकास को प्राप्त हुई है । सुख, दुःख, भाव, अभाव और अज्ञान उसके पत्र, फूल और फल हैं । जहाँ अविद्या सुखरूप होकर स्थित होती है वहाँ ऊँचे सुख का भोग कराती है और सत्य प्रतीत होती है, और जहाँ दुःखरूप होकर स्थित होती है वहाँ दुःखरूप भासती है । वे ही सुख व दुःख इसके फल हैं । दिन फूल हैं और रात्रि भँवरे हैं । जन्म अंकुर है और यह भोगरूपी रस से पूर्ण है । जब विचार का घुन अविद्यारूपी वृक्ष को खाने लगता है, तब नष्ट हो जाती है । जब तक विचाररूपी घुन नहीं लगा तब तक वह दिन-दिन बढ़ती और दृढ होती जाती है ।