योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १८
हे राम ! अविद्यारूपी बेलि का मूल संवित् का फुरना है। उससे यह फैली है। तारागण उसके फूल हैं, चन्द्रमा और सूर्य उसका प्रकाश और दुष्कृत कर्मरूपी नरकस्थान कण्टक हैं। शुभ कर्मरूपी स्वर्ग उसके फूल हैं और सुख-दुःखरूपी फल इसमें लगते हैं । जीव उसके पत्ते हैं जो कालरूपी वायु से हिलते और जीर्ण होकर गिर पड़ते हैं। पृथ्वी उसकी त्वचा है, पर्वत पीड़ है। उसमें मरणरूपी छिद्र, जन्मरूपी अंकुर और मोहरूपी कलियाँ हैं, जिनके महासुन्दर गोरे अंग हैं। उनसे जीव मोहित होते हैं—जैसे स्त्री को देखकर पुरुष मोहित होते हैं। यह सात समुद्रों के जल से सींची जाती है और उससे पुष्ट होती है । उस बेलि में एक विषधर सर्पिणी रहती है । जो कोई उसके निकट जाता है, उसको काटती है और वह मूर्च्छित हो गिर पड़ता है। संसाररूपी मूर्च्छा की देनेवाली तृष्णारूपी सर्पिणी है । वह बेलि अन्यथा नष्ट नहीं होती; जब विचाररूपी घुन उसको लगे तो नष्ट हो जाती है। हे राम ! जो कुछ प्रपञ्च तुमको भासता है सो सब अविद्यारूप है, कहीं अविद्या जलरूप हुई है, कहीं पहाड़, कहीं नाग, कहीं देवता, कहीं दैत्य, कहीं पृथ्वी, कहीं चन्द्रमा, कहीं सूर्य, कहीं तारे, कहीं तम, कहीं प्रकाश, कहीं तेज, कहीं पाप, कहीं पुण्य, कहीं स्थावर, कहीं मूढ़रूप । कहीं अज्ञान से दीन और कहीं ज्ञान से आप ही क्षीण हो जाती है । कहीं तप-दान आदि से क्षीण होती है, कहीं पापादि से बढ़ती है, कहीं सूर्यरूप होकर प्रकाश करती है, कहीं स्थानरूप होती है, कहीं नरक में लीन है, कहीं स्वर्गनिवासी है, कहीं देवता होती है, कहीं क्रिमि होती है, कहीं विष्णु-रूप होकर स्थित हुई है, कहीं ब्रह्मा होकर स्थित है, कहीं रुद्र है, कहीं अग्निरूप है, कहीं पृथ्वीरूप हुई है और कहीं आकाश व कहीं भूत, भविष्यत् और वर्तमान हुई है। हे राम ! जो कुछ देखने में आता है वह सब महिमा इसी की है । ईश्वर से तृणपर्यन्त सब अविद्यारूप है । जो इस दृश्यजाल से अतीत है, उसको आत्मलाभ जानो ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यालता- वर्णनन्नाम सप्तमस्सर्गः ॥ ७ ॥