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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 831, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 831

२० * योगवासिष्ठ *

राम ने पूछा, हे ब्रह्मन् ! विष्णु और हर आदिक तो शुद्ध आकार आकाश जाति है, इनको अविद्या तुम कहते हो ! यह सुनकर मुझको संशय उत्पन्न हुआ है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम यह सुनो कि अविद्या और तत्त्व किसको कहते हैं। जो अविद्यमान हो और विद्यमान भासे वह अविद्या है और जो सदा विद्यमान है उसको तत्त्व कहते हैं। हे राम ! शुद्ध संवित् और कल्पना से रहित जो चिन्मात्र आत्मसत्ता है वही तत्त्व है। उसमें जो अहं उल्लेख से संवेदनकल्पना पूर्णरूप से फुरी है वही चिन्मात्र संवित् का आभास है। वही संवेदन फुरकर स्थानभेद से सूक्ष्म, स्थूल और मध्यमभाव को प्राप्त हुआ है और फिर वही दृढ़ स्पन्द से मनन भाव को प्राप्त हुआ है। सात्त्विक, राजस और तामस, तीनों उसी के आकार हैं। वह अविद्या त्रिगुण प्राकृतधर्मिणी हुई है। और तीन गुण जो तुमसे कहे हैं, वे भी एक एक गुण तीन तीन प्रकार के हैं, जिससे अविद्या के गुण नव प्रकार के भेद को प्राप्त हुए हैं। जो कुछ तुमको दृश्य भासता है, वह अविद्या के नव गुणों में है। ऋषीश्वर, मुनीश्वर सिद्ध, नाग, विद्याधर और देवता अविद्या के सात्त्विकभाग हैं और उस सात्त्विक के विभाग में नाग सात्त्विक-तामस हैं, विद्याधर, सिद्ध, देवता और मुनीश्वर, अविद्या के सात्त्विक भाग में सात्त्विक-राजस हैं और हरिहरादिक केवल सात्त्विक हैं।

हे रामजी ! सात्त्विक जो प्रकृतभाग है उसमें जो तत्त्वज्ञ हुए हैं वे मोह को नहीं प्राप्त होते, क्योंकि वे मुक्तिरूप होते हैं। हरिहरादिक शुद्ध सात्त्विक हैं और सदा मुक्तिरूप होकर जगत् में स्थित हैं। वे जब तक जगत् में हैं, तब तक जीवन्मुक्त हैं और जब देहमुक्त हुए, तब परमेश्वर को प्राप्त होते हैं। हे राम ! अविद्या के दो रूप हैं। एक अविद्या विद्यारूप होती है—जैसे बीज फल होता है और फल बीज होता है। जैसे जल में बुलबुला उठता है वैसे ही अविद्या से विद्या उपजती है। और विद्या में अविद्या लीन होती है। जैसे काष्ठ में अग्नि उपजकर काष्ठ को जलाती है, वैसे ही विद्या अविद्या से उपजकर अविद्या का नाश करती है। वास्तव में सब चिदाकाश है। जैसे जल में तरङ्ग

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