योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 832, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * २१
कल्पनामात्र है, वैसे ही विद्या अविद्या की भावनामात्र है। इसको त्याग कर शेष आत्मसत्ता ही रहती है।
अविद्या और विद्या आपस में प्रतियोगी हैं—जैसे तम और प्रकाश। इससे इन दोनों को त्यागकर आत्मसत्ता में स्थित हो। विद्या और अविद्या कल्पनामात्र हैं। विद्या के अभाव का नाम अविद्या है और अविद्या के अभाव का नाम विद्या है। यह प्रतियोगी कल्पना मिथ्या है। जब विद्या उपजती है, तब अविद्या को नष्ट करती है और फिर आप भी लीन हो जाती है—जैसे काष्ठ से उपजी अग्नि काष्ठ को जलाकर आप भी शान्त हो जाती है। उससे जो शेष रहता है, वह अनिर्वचनीय पद सर्वव्यापी है। जैसे वटबीज में पत्र, शाखा, फूल, फल और पत्ते होते हैं, वैसे ही सबमें एक अनुस्यूत सत्ता व्याप्त है। वही ब्रह्मतत्त्व सर्वशक्तिमान् है। उसी में सब शक्तियों का स्पन्दन है। वह आकाश में भी शून्य है। जैसे सूर्यकान्तमणि में अग्नि होती है और दूध में घृत है, वैसे ही सब जगत् में ब्रह्म व्याप्त हो रहा है। जैसे दधि के मथे बिना घृत नहीं निकलता, वैसे ही विचार बिना आत्मा नहीं भासता। जैसे अग्नि से चिनगारी और सूर्य से किरणें निकलती हैं, वैसे ही यह जगत् आत्मा का किञ्चनरूप है। जैसे घट का नाश होने पर भी घटाकाश अविनाशी है, वैसे ही जगत् के अभाव में भी आत्मा अविनाशी है।
हे राम ! जैसे चुम्बक पत्थर की सत्ता से जड़ लोहा चेष्टा करता है परन्तु चुम्बक सदा अकर्ता ही रहता है, वैसे ही आत्मा की सत्ता से जगत् देहादिक चेष्टा करते हैं और चेतन होते हैं, परन्तु आत्मा सदा अकर्ता है। इस जगत् का बीज चैतन्य आत्मसत्ता है और उसमें संवित्, संवेदन आदि शब्द भी कल्पनामात्र हैं। जैसे जल को कहते हैं कि बहुत सुन्दर और चञ्चल है और जल ही जल है, वैसे ही संवेदन आदि सब चैतन्यरूप हैं। जहाँ न किञ्चन है, न अकिञ्चन है, वही तुम्हारा स्वरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यानिराकरणं नामाष्टमसर्गः ॥ ८ ॥