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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 833, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 833

२२ * योगवाशिष्ठ *

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्थावर-जङ्गम जो कुछ जगत् तुमको भासता है, वह आधिभौतिकता को नहीं प्राप्त हुआ । वह सब चिदाकाशरूप है । उसमें कुछ भाव-अभाव की कल्पना नहीं और जीवादिक भेद भी नहीं । हमको तो भेदकल्पना कुछ नहीं भासती । जैसे रस्सी में सर्प का अभाव है, वैसे ही ब्रह्म में भेदकल्पना का अभाव है । हे राम ! आत्मा के अज्ञान से भेदकल्पना भासती है और आत्मा के जाने से भेदकल्पना मिट जाती है । वही सर्वसंपदा का अन्त है । शुद्ध चैतन्य में चित्त का सम्बन्ध होने का नाम अविद्या है । जो पुरुष चित्त की उपाधि से रहित चिन्मात्र है, वह शरीर का नाश होने पर नष्ट नहीं होता और शरीर के उपजे में नहीं उपजता । शरीर के उपजने और नष्ट होने में वह सदा एकरस ज्यों का त्यों स्थित है । जैसे घट के उपजने और मिटने में घटाकार ज्यों का त्यों रहता है वैसे ही शरीर के भाव-अभाव में आत्मा ज्यों का त्यों है । जैसे बालक दौड़ता है तो उसको सूर्य भी दौड़ता जान पड़ता है और स्थित होने में स्थित लगता है, परन्तु सूर्य ज्यों का त्यों है, वैसे ही चित्त की चञ्चलता से मूर्ख जन आत्मा को व्याकुल देखते हैं, चित्त की अचलता में अचल देखते हैं और चित्त के उपजने में उपजता देखते हैं, परन्तु आत्मा सदा ज्यों का त्यों है । जैसे मकड़ी अपने जाले से आप ही घिरती है और निकल नहीं सकती, वैसे ही जीव अपनी वासना से ही बँधते हैं ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! अत्यन्त मूर्खता के अधिष्ठान जो स्थावर आदिक हैं उनकी वासना कैसी होती है, सो कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो स्थावर जीव हैं, वे अमनसत्ता को नहीं प्राप्त हुए । वे केवल मन अवस्था में भी प्रतिष्ठित नहीं, पर मध्य अवस्था में हैं । उनकी पुर्यष्टका सुषुप्तिरूप है । वह केवल दुःख का कारण है । उनका मन नहीं नष्ट हुआ, वे सुषुप्ति अवस्था में जडरूप स्थित हैं । वे काल पाकर जागेंगे अभी उनकी सत्ता मूकजड़ होकर स्थित है । राम ने पूछा, हे देवताओं में श्रेष्ठ ! यदि उनकी सत्ता अद्वैतरूप होकर स्थावर

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