योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण प्रकरण
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शरीर में स्थित है तो मुक्त अवस्था उनके निकट है, यह सिद्ध हुआ । वशिष्ठजी बोले हे राम! मुक्ति कैसे निकट होती है ? मुक्ति तब होती है, जब बुद्धिपूर्वक वस्तु को विचारे और यथाभूत अर्थ देख पड़े । जब सत्ता समान का बोध हो तब केवल आत्मपद प्राप्त होता है । हे राम ! जब ज्यों का त्यों पदार्थ जानकर वासना को त्याग करे, तब सत्ता समान पद प्राप्त होता है ।
प्रथम अध्यात्मशास्त्र को विचारे और उसमें जो सार है उसकी बारम्बार भावना करे, तब उससे जो प्राप्त हो वही सत्ता समान परब्रह्म कहलाता है । स्थावर के भीतर वासना है; परन्तु बाहर नहीं दिखती; क्योंकि उनकी सुषुप्ति वासना है । जैसे बीज में अंकुर होता है और फिर उगता है, वैसे ही उनके जन्म होंगे और वासना जगेगी । उनके भीतर जगत् की सत्ता है, पर बाहर नजर नहीं आती । वे सुषुप्ति के समान जड़धर्मा हैं । वे अनन्त जन्मों में दुःख पावेंगे । हे राम ! स्थावर जो अब जड़धर्मी सुषुप्तिपद में स्थित हैं, वे बारम्बार जन्म पावेंगे । जैसे बीज में पत्र, टाल, फूल और फल अवस्थित होते हैं और मृत्तिका में घट बनने की शक्ति है, वैसे ही स्थावर में वासना स्थित है । जिसमें वासनारूपी बीज है, वह सुषुप्तिरूप कहलाता है और वह सिद्धता, जो मुक्ति है, उसे नहीं प्राप्त होती । जहाँ निर्जीव वासना है, व तुरीय पद है और वह सिद्धता को प्राप्त करती है ।
हे राम ! जब चित्तशक्ति दृढ़ वासना से मिली होती है, तब स्थावर होती है और वह फिर जगती है । जैसे कोई कर्म करता हुआ सो जाता है तो सुषुप्ति से उठकर फिर वही कर्म करने लगता है, क्योंकि कर्मरूपी वासना उसके भीतर रहती है, वैसे ही स्थावर वासना से फिर जन्म पावेंगे । जब वह वासना हृदय से दग्ध हो, तब जन्म का कारण नहीं होती । आत्मसत्ता समानभाव से घट पट आदि सब पदार्थों में स्थित है । जैसे वर्षाकाल का एक ही मेघ नानारूप होकर स्थित होता है, वैसे एक ही आत्मसत्ता सब पदार्थों में स्थित है । सबमें आत्मा ही व्याप रहा है । ऐसी दृष्टि से जो रहित है, उसको विपर्यय उल्टी दृष्टि