योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 835, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें२४
<div align="center">❊ योगवाशिष्ठ ❊</div>भ्रमदायक होती है। जब आत्मदृष्टि प्राप्त होती है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे राम ! असम्यकदृष्टि को ही बुद्धिमान् लोग अविद्या कहते हैं। वह अविद्या जगत् का कारण है और उससे सब प्रपंच का पसारा होता है। जब उससे रहित अपना स्वरूप भासित हो, तब अविद्या नष्ट होती है। जैसे बर्फ की कणिका धूप से नष्ट हो जाती है वैसे ही शुद्ध स्वरूप के अभ्यास से अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे स्वप्न में उठकर जीव जब अपना स्वरूप देखता है, तब फिर स्वप्न की ओर नहीं जाता वैसे ही शुद्ध स्वरूप के अभ्यास से सम्पूर्ण भ्रम निवृत्त हो जाते हैं।
हे राम ! जब जीव वस्तु को वस्तु जानता है, तब अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे प्रकाश में अन्धकार नष्ट हो जाता है। पर दीपक को हाथ में लेकर देखिये तो अन्धकार की कोई मूर्ति नजर नहीं आती, और जैसे उष्णता से घृत का पिंड गल जाता है, वैसे ही आत्मा के दर्शन होने पर अविद्या नहीं रहती। वास्तव में अविद्या कोई वस्तु नहीं। वह अविचार से सिद्ध है और विचार करने से लीन हो जाती है। जैसे प्रकाश में तम लीन हो जाता है, वैसे ही विचार से अविद्या लीन हो जाती है। अज्ञान में अविद्या की प्रतीति होती है। जब तक आत्मतत्त्व को नहीं देखता, तब तक अविद्या की प्रतीति होती है और जब आत्मा को देखता है, तब अविद्या का अभाव हो जाता है। प्रथम यह विचार करे कि रक्त, मांस और अस्थि का बना जो शरीर है, उसमें "मैं क्या वस्तु हूँ? सत्य क्या है? और असत्य क्या है?" इस विचार से जिसका अभाव होता है, वह असत्य है और जिसका अभाव नहीं होता, वह सत्य है। फिर अन्वय व्यतिरेक से विचारे। कार्यकल्पित के होने पर भी हो और उसके अभाव में भी जो हो सो अन्वय सत्य है। देहादि के भाव में भी जो आत्मा का अधिष्ठान है और इनके अभाव में भी निरुपाधि सिद्ध है, वह सत्य है और देहादिक व्यतिरेक असत्य है।
ऐसे विचार कर आत्मतत्त्व का अभ्यास करे और असत् देहादिक से वैराग्य करे, तब निश्चय ही अविद्या लीन हो जाती है, क्योंकि वह वास्तव नहीं है, असतरूप है। उसके नष्ट होने पर जो शेष रहे, वह