योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 836, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २५
निष्किञ्चन है, सत्य है, ब्रह्म निरन्तर है। वह तत्त्ववस्तु ग्रहण करने योग्य है। हे राम! ऐसे विचार करने से अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे ऊख का रस जब जिह्वा से लगता है, तब अवश्य स्वाद आता है, वैसे ही आत्मविचार से अविद्या अवश्य नष्ट हो जाती है। यदि वास्तव में कहिये तो अविद्या भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं, एक अखंड ब्रह्मतत्त्व है। जिससे घट, पट, रथ आदिक पदार्थ भिन्न भिन्न भासते हैं, उसको अविद्या जानो और जिससे सबमें एक ब्रह्मभावना होती है उसको विद्या जानो। इस विद्या से अविद्या नष्ट हो जायगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्याचिकित्सावर्णनं नाम नवमस्सर्गः॥ ९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! बोध के निमित्त मैं तुमसे बारम्बार सत्य का सार कहता हूँ। वह यही है कि भावना के अभ्यास बिना आत्मा का साक्षात्कार न होगा। यह जो अज्ञान अविद्या है, वह अनन्त जन्म से दृढ़ हुआ भीतर बाहर दिखाई देता है। आत्मा सब इन्द्रियों से अगोचर है। जब मन सहित षट् इन्द्रियों का अभाव हो, तब केवल शान्ति प्राप्त होती है। हे राम! जो कुछ वृत्ति बहिर्मुख फुरती है, वह अविद्या है; क्योंकि वह वृत्ति प्रपंच को आत्मतत्त्व से भिन्न जानकर फुरती है और जो अन्तर्मुख आत्मा की ओर फुरती है, वह विद्या है। वही अविद्या का नाश करेगी। अविद्या के दो रूप हैं—एक प्रधान रूप और दूसरा निकृष्ट रूप। उस अविद्या से विद्या उपजकर अविद्या का नाश करती है और फिर आप भी नष्ट हो जाती है, जैसे बाँस से अग्नि उपजती और बाँस को जलाकर आप भी शान्त हो आती है, वैसे ही जो अन्तर्मुख है, वह प्रधान रूप विद्या है और जो बहिर्मुख है, वह निकृष्ट रूप अविद्या है। इससे अविद्याभाव का नाश करे।
हे राम! अभ्यास के बिना कुछ सिद्ध नहीं होता। जो कुछ किसी को प्राप्त होता है वह अभ्यासरूपी वृक्ष का ही फल है। चिरकाल अविद्या का दृढ़ अभ्यास होने से अविद्या दृढ़ हुई है। जब आत्मज्ञान के निमित्त यत्न करके दृढ़ अभ्यास करोगे, तब अविद्या नष्ट हो जायगी।