योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
हे राम ! हृदयरूपी वृक्ष में जो अविद्यारूपी विषबेलि फैल रही है उसको ज्ञानरूपी खङ्ग से काटो और जो कुछ अपना प्रकृत आचार है, उसको करो, तब तुमको दुःख कोई न होगा। जैसे जनक राजा ज्ञेय को ज्ञात होकर व्यवहार को करते थे, वैसे ही आत्मज्ञान का दृढ़ अभ्यास कर तुम भी बिचरो। हे राम ! जैसा निश्चय पवन, विष्णु, सदाशिव, ब्रह्मा, बृहस्पति, चन्द्रमा, अग्नि, नारद, पुलह, पुलस्त्य, अङ्गिरा, भृगु, शुकदेव और ज्ञात-ज्ञेय ब्राह्मणों का है, वही तुमको भी प्राप्त हो।
राम ने पूछा, हे ब्राह्मण ! जिस निश्चय से बुद्धिमान् विशोक हुए हैं, वह मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे सम्पूर्ण ज्ञानवानों का निश्चय है और जैसे वे व्यवहार में सम रहे हैं, वह सुनो। विस्तार-रूप जो कुछ जगज्जाल तुमको भासित होता है, वह निर्मल ब्रह्मसत्ता अपनी महिमा में स्थित है। जैसे समुद्र में तरङ्ग स्थित होते हैं और नाना प्रकार के उत्पन्न होते हैं, वे एक जलरूप हैं, जल से भिन्न नहीं, वैसे ही जो ग्रहण करनेवाला है वह भी ब्रह्म है और जिसको भोजन करता है, वह भी ब्रह्म है। मित्र भी ब्रह्म है, शत्रु भी ब्रह्म है। ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। ज्ञानवान् को सदा यह निश्चय रहता है। ब्रह्म को ब्रह्म स्पर्श करता है, तब किसको स्पर्श किया ? हे रामजी ! जिनको सदा यही निश्चय रहता है, उनको रागद्वेष कुछ दुःख नहीं दे सकते। ब्रह्म ही ब्रह्म में फुरता है, भावरूप भी ब्रह्म है, अभावरूप भी ब्रह्म है, कुछ भिन्न नहीं, तब फिर रागद्वेष की कल्पना कैसे हो ? ब्रह्म ही ब्रह्म का चिन्तन करता है, ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है, ब्रह्म ही अहं अस्मि है, ब्रह्म ही सग है, ब्रह्म ही आत्मा है और घट भी ब्रह्म है, पट भी ब्रह्म है, ब्रह्म ही से सारा जगत् विस्तार को प्राप्त हुआ है।
हे राम ! जब सर्वत्र ब्रह्म ही है, तब राग-विराग की कल्पना कैसे हो ? मृत्यु भी ब्रह्म है, शरीर भी ब्रह्म है; मरता भी ब्रह्म है और मारता भी ब्रह्म है। जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प भासित होता है, वैसे ही आत्मा में सुख-दुःख मिथ्या है। भोग भी ब्रह्म है, भोगनेवाला भी ब्रह्म है और