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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 838, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 838

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २७

भोक्ता देह भी ब्रह्म है, निदान सर्वत्र ब्रह्म ही है। जैसे समुद्र में जो तरङ्ग उपजते और मिट जाते हैं, वे जल से भिन्न नहीं, वैसे ही शरीर उपजते और मिट जाते हैं। ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है। हे राम! जल के तरङ्ग जो मृत्यु को प्राप्त होते हैं तो क्या हुआ, वे तो जल ही हैं; वैसे ही मृतक ब्रह्म ने जो मृतक देह ब्रह्म को मारा, तब कौन मुआ और किसने मारा? जैसे एक तरङ्ग जल से उपजा और दूसरे तरङ्ग से मिल दोनों इकट्ठे होकर मिट गये सो सब जल ही जल है—वहाँ मैं, तू इत्यादि दूसरा कुछ नहीं—वैसे ही आत्मा में जो जगत् है सो आत्मा ही अपने आपमें स्थित है, तेरा, मेरा भिन्न कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण में भूषण और जल में तरङ्ग अभिन्नरूप हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं।

हे राम! जो पुरुष यथार्थदर्शी है, उसको सदा यही निश्चय रहता है। और जिनको सम्यक्ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, उनको विपर्ययरूप, और का और, भासित होता है पर वास्तव में ब्रह्म सदा एक रूप है; ज्ञान और अज्ञान का भेद है। जैसे रस्सी एक होती है; परन्तु जिसको सम्यक्ज्ञान होता है उसको रस्सी प्रतीति होती है और जिसको सम्यक्ज्ञान नहीं होता, उसको सर्प जान पड़ती है, वैसे ही जो ज्ञानवान् पुरुष है, उसको सब ब्रह्मसत्ता ही भासती है, और जो अज्ञानी है, उसको जगत् नानारूप भासित होता है और दुःखदायक होता है, पर ज्ञानवान् को सुखरूप है। जैसे अन्धे को सब ओर अन्धकार और नेत्रवान् को प्रकाश प्रतीत होता है, वैसे ही सब जगत् आत्मरूप होने पर भी ज्ञानी को आत्मसत्ता सुखरूप भासती है और अज्ञानी को दुःखदायक है। जैसे बालक को अपनी परछाहीं में वेतालबुद्धि होती है और उससे वह भय पाता है, पर बुद्धिमान् निर्भय होता है, वैसे ही अज्ञानी को यह जगत् दुःखदायक और ज्ञानी को सुखरूप है। यदि मेरा निश्चय पूछो तो योँ है कि मैं सर्वमय ब्रह्म, नित्य, शुद्ध, सर्वव्यापी हूँ। न कोई मरता है, न उपजता है। जैसे जल में तरङ्ग न उपजते हैं और न मिटते हैं, सब जल ही जल है, वैसे ही पंचभूत भी आत्मा में हैं और जगत् भी आत्मरूप है। आत्मब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है।