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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 839, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 839

२८ ❊ योगवाशिष्ठ

शरीर का नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता । मृतकरूप भी ब्रह्म है, शरीर भी ब्रह्म है । ब्रह्म ही अनेकरूप होकर भासता है । ब्रह्म भिन्न शरीर आदिक कुछ सिद्ध नहीं होते । जैसे तरङ्ग, फेन और बुलबुले जलरूप हैं, वैसे ही देह, कलना, इन्द्रियाँ, इच्छा, देवतादिक सब ब्रह्मरूप हैं। जैसे भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं होता—सुवर्ण ही भूषणरूप होता है—वैसे ही ब्रह्म से अलग जगत् नहीं होता, ब्रह्म ही जगत्रूप है । जो मूढ़ हैं उनको द्वैतकलना भासित होती है ।

हे राम ! मन, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा और इन्द्रियाँ, सब ब्रह्म ही के नाम हैं। और सुख-दुःख कुछ नहीं । अहं आदि जो शब्द हैं, उनमें भिन्न भिन्न भावना करना व्यर्थ है, अपना अनुभव ही अन्य की नाईं प्रतीत होता है—जैसे पहाड़ में शब्द करने से प्रतिध्वनि जो सुन पड़ती है, वह अपना ही शब्द है उसमें और की कल्पना मिथ्या है। जैसे स्वप्न में कोई अपना सिर कटा देखता है, वह व्यर्थ होने पर भी उस समय सत्य जान पड़ता है । जिसको असम्यक्ज्ञान होता है, उसको ऐसे ही भ्रम होता है । हे राम ! ब्रह्म सर्वशक्तिमान् है, उसमें जैसी भावना होती है, वही भासित होता है । जिसको सम्यक्ज्ञान होता है, वह उसे निरहंकार, सुप्रकाश और सर्वशक्तिमान् देखता है । कर्त्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण, यह जो षट्कारक बुद्धि है सो सब सर्वत्र ब्रह्म ही है । ब्रह्म ही अर्पण, ब्रह्म ही हवि, ब्रह्म ही अग्नि, ब्रह्म ही होत्र, ब्रह्म ही होमनेवाला और ब्रह्म ही फलदाता है । ऐसा जाननेवाले का नाम ज्ञानी है और ऐसा न जानना अज्ञान है । जाननेवाले का नाम ब्रह्मवेत्ता है । हे राम ! यदि चिरकाल का बान्धव हो और उसको देखिये तो जानिये कि बान्धव है और जो देखने में न आये और उसका अभ्यास दूर हो गया हो तो बान्धव भी अबान्धव की नाईं हो जाता है, वैसे ही अपने ब्रह्मस्वरूप को जानो । जब भावना होती है, तब ऐसा ही भासित होता है कि मैं ब्रह्म हूँ, और द्वैत कल्पना लीन हो जाती है—सर्वत्र ब्रह्म ही भासता है । जैसे जिसने अमृत पान किया है, वह अमृतमय हो जाता है और जिसने नहीं पान किया,