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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 840, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 840

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २६

वह अमृतमय नहीं होता, वैसे ही जिसने जाना है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह ब्रह्म ही होता है और जिसने नहीं जाना, उसको नानात्व-कल्पना-रूप जन्म-मरण भासित होता है और ब्रह्म अभास सा प्रतीति होता है ।

हे राम ! जिसको ब्रह्मभावना का अभ्यास है, वह अभ्यास के बल से शीघ्र ही ब्रह्म हो जाता है । ब्रह्मरूपी बड़े दर्पण में जैसी कोई भावना करता है, वैसा ही रूप देख पड़ता है । मन भावनामात्र है । दुर्वासना से स्वरूप का आवरण हुआ है । जब वासना नष्ट होती है, तब निष्कलङ्क आत्मतत्त्व ही भासित होता है । जैसे शुद्ध वस्त्र पर केसर का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है, वैसे ही वासना से रहित चित्त में ब्रह्म का निश्चय होता है । हे राम ! आत्मा सब प्रकार की कलना से रहित है और तीनों काल में नित्य, शुद्ध, सम और शान्तरूप है । जिसको ज्ञान होता है, वह जानता है कि मैं ब्रह्म हूँ और सर्वदा सबमें सब प्रकार सब घट-पटादिक जो जगज्जाल है, उसमें मैं ही ब्रह्म आकाशवत् व्याप रहा हूँ । न कोई मुझको दुःख है, न कर्म है, न किसी का त्याग करता हूँ और न वाञ्छा करता हूँ और सर्वकलना से रहित निरामय हूँ । मैं ही रक्त, पीत, श्वेत और श्याम हूँ और रक्त, मांस, अस्थि का शरीर भी मैं ही हूँ । घट-पटादिक जगत् भी मैं ही हूँ और तृण, बेलि, फूल, गुच्छे, टाल, बन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, ग्रहण, त्याग, संकोच, भूत आदि शक्ति सब मैं ही हूँ । मैं ही विस्तार को प्राप्त हुआ हूँ, वृक्ष बेलि, फल, गुच्छे जिसके आश्रय से फुरते हैं, वह चिदात्मा मैं ही हूँ और सबमें रसरूप मैं ही हूँ । जिसमें यह सब है और जिससे यह सब है; जो सर्वरूप है और जिसके लिए सब है, ऐसा चिदात्मा ब्रह्म मैं ही हूँ । जिसके चैतन्य, आत्मा, ब्रह्म, सत्य, अमृत, ज्ञानरूप इत्यादिक नाम हैं, ऐसा सर्वशक्तिमान्, चिन्मात्र, चैत्य से रहित प्रकाशमात्र, निर्मल, सब भूतों का प्रकाशक और मन, बुद्धि, इन्द्रियों का स्वामी मैं हूँ । जो कुछ भेद कलना है, सो मन आदि ही की थी और अब इनकी कलना को त्यागकर मैं अपने प्रकाश में स्थित हूँ । शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध आदिक जो सब जगत् का कारण हैं, उन सबका चैतन्य आत्मरूप ब्रह्म, निरामय, अविनाशी,

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