योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २६
वह अमृतमय नहीं होता, वैसे ही जिसने जाना है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह ब्रह्म ही होता है और जिसने नहीं जाना, उसको नानात्व-कल्पना-रूप जन्म-मरण भासित होता है और ब्रह्म अभास सा प्रतीति होता है ।
हे राम ! जिसको ब्रह्मभावना का अभ्यास है, वह अभ्यास के बल से शीघ्र ही ब्रह्म हो जाता है । ब्रह्मरूपी बड़े दर्पण में जैसी कोई भावना करता है, वैसा ही रूप देख पड़ता है । मन भावनामात्र है । दुर्वासना से स्वरूप का आवरण हुआ है । जब वासना नष्ट होती है, तब निष्कलङ्क आत्मतत्त्व ही भासित होता है । जैसे शुद्ध वस्त्र पर केसर का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है, वैसे ही वासना से रहित चित्त में ब्रह्म का निश्चय होता है । हे राम ! आत्मा सब प्रकार की कलना से रहित है और तीनों काल में नित्य, शुद्ध, सम और शान्तरूप है । जिसको ज्ञान होता है, वह जानता है कि मैं ब्रह्म हूँ और सर्वदा सबमें सब प्रकार सब घट-पटादिक जो जगज्जाल है, उसमें मैं ही ब्रह्म आकाशवत् व्याप रहा हूँ । न कोई मुझको दुःख है, न कर्म है, न किसी का त्याग करता हूँ और न वाञ्छा करता हूँ और सर्वकलना से रहित निरामय हूँ । मैं ही रक्त, पीत, श्वेत और श्याम हूँ और रक्त, मांस, अस्थि का शरीर भी मैं ही हूँ । घट-पटादिक जगत् भी मैं ही हूँ और तृण, बेलि, फूल, गुच्छे, टाल, बन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, ग्रहण, त्याग, संकोच, भूत आदि शक्ति सब मैं ही हूँ । मैं ही विस्तार को प्राप्त हुआ हूँ, वृक्ष बेलि, फल, गुच्छे जिसके आश्रय से फुरते हैं, वह चिदात्मा मैं ही हूँ और सबमें रसरूप मैं ही हूँ । जिसमें यह सब है और जिससे यह सब है; जो सर्वरूप है और जिसके लिए सब है, ऐसा चिदात्मा ब्रह्म मैं ही हूँ । जिसके चैतन्य, आत्मा, ब्रह्म, सत्य, अमृत, ज्ञानरूप इत्यादिक नाम हैं, ऐसा सर्वशक्तिमान्, चिन्मात्र, चैत्य से रहित प्रकाशमात्र, निर्मल, सब भूतों का प्रकाशक और मन, बुद्धि, इन्द्रियों का स्वामी मैं हूँ । जो कुछ भेद कलना है, सो मन आदि ही की थी और अब इनकी कलना को त्यागकर मैं अपने प्रकाश में स्थित हूँ । शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध आदिक जो सब जगत् का कारण हैं, उन सबका चैतन्य आत्मरूप ब्रह्म, निरामय, अविनाशी,
३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
निरन्तर स्वच्छ आत्मा, प्रकाशरूप, मन के उत्थान से रहित, मौनरूप में ही हूँ और परम अमृत, निरन्तर सब भूतों में सत्तारूप से मैं ही स्थित हूँ । सदा निर्लेप, साक्षी, सुषुप्ति की नाईं और द्वेतकला से रहित अक्षोभरूप अनुभव में ही हूँ। शान्तरूप जगत् में मैं ही फैल रहा हूँ और सब वासना से रहित अक्षोभरूपी अनुभव में ही हूँ।
जिससे सब स्वादों का अनुभव होता है, वह चैतन्य ब्रह्म आत्मा मैं ही हूँ। जिसका चित्त स्त्री में आसक्त है, जिसको चन्द्रमा की कान्ति से अधिक मुदिता है और जिससे स्त्री का स्पर्श और मुदिता का अनुभव होता है, ऐसा चैतन्य ब्रह्म में ही हूँ। सुख-दुःख की कल्पना से रहित मनहीन सत्ता और अनुभवरूप जो आत्मा है, वह चैतन्यरूप आत्मा ब्रह्म में ही हूँ। मधुर और नीम आदिक में स्वादरूप में ही हूँ। खेद और आनन्द, लाभ और हानि मुझको तुल्य है। मैं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और साक्षी तुरीयरूप आदि, अन्त से रहित चैतन्य ब्रह्म निरामय हूँ। जैसे एक खेत की ईखों में एक ही सा रस होता है, वैसे ही अनेक मूर्तियों में एक ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। वह सत्य, शुद्ध, सम शान्तरूप और सर्वज्ञ है। जो प्रकाशक और सूर्य की भाँति है, वह प्रकाशरूप ब्रह्म में ही हूँ और सब शरीरों में व्याप्त रहा हूँ। जैसे मोती की माला में तागा गुप्त होता है, जिसमें मोती पिरोये हैं, वैसे ही मोतीरूप शरीर में तन्तु-रूप गुप्त में ही हूँ। जगतरूपी दूध में ब्रह्मरूपी घृत में ही व्याप्त रहा हूँ।
हे राम ! जैसे सुवर्ण में जो नाना प्रकार के भूषण बनते हैं, सो सुवर्ण से भिन्न नहीं होते, वैसे ही सब पदार्थ आत्मा में स्थित हैं-आत्मा से भिन्न नहीं । पर्वत, समुद्र और नदियों में सत्तारूप आत्मा ही है। सब संकल्पों का फलदाता और सब पदार्थों का प्रकाशक आत्मा ही है। वही सब पाने योग्य पदार्थों की परम सीमा है। उस आत्मा की उपासना हम करते हैं, जो घट, पट, तट और कम्ब में स्थित है। जाग्रत जो सुषुप्तिरूप स्थित है और जिसमें कोई फुरना नहीं, ऐसे चैतन्यरू-आत्मा की उपासना हम करते हैं। मधुर में जो मधुरता और तीक्ष्ण में तीक्ष्णता और जाग्रत में चलना शक्ति है; उस चैतन-
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३१
आत्मा की हम उपासना करते हैं। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत में जो समतत्त्व है, उसकी हम उपासना करते हैं। त्रिलोकी के देहरूपी मोतियों में जो तन्तु की नाईं अनुस्यूत है और फैलने और सिकुड़ने का कारण है, उस चैतन्यरूप आत्मा की हम उपासना करते हैं। जो षोडश कलासंयुक्त और षोडश कला से रहित और अकिंचन तथा किंचनरूप है, उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं। चैतन्यरूप अमृत जो क्षीरसमुद्र से निकला है और चन्द्रमा के मण्डल में रहता है, ऐसा जो स्वतः सिद्ध अमृत है, जिसको पाकर कदापि मृत्यु नहीं होती, उस चैतन्य अमृत की हम उपासना करते हैं। जो अखण्ड प्रकाश है और सब भूतों को सुन्दर करता है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं, जिससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रगटते हैं, और जो आप इससे रहित है, उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं। सब में हूँ और सब में नहीं, और भी कोई नहीं, इस प्रकार विदित वेद अपने अद्वैतरूप में विगतज्वर होकर स्थित होते हैं। यही निश्चय ज्ञानवानों का है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तनिश्चयोपदेशो नाम दशमसर्गः ॥ १० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो निष्पाप पुरुष है, उसको यही निश्चय रहता है कि सत्यरूप आत्मतत्त्व है। यह पूर्ण बोधवान् का निश्चय है। उसको न किसी में राग होता है और न किसी में द्वेष। उसको जीना और मरना सुख-दुःख नहीं देते। वह एक समान रहता है। वह विष्णु-नारायण का अङ्ग है, अर्थात् अभिन्न और सदा अचल है। जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता, वैसे ही वह दुःख से चलायमान नहीं होता। ऐसे जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे वन में विचरते हैं और नगर द्वीप आदिक नाना प्रकार के स्थानों में भी फिरते हैं; परन्तु दुःख नहीं पाते। कोई स्वर्ग में फूलों के वन और बगीचों में फिरते हैं, कोई पर्वत की कन्दराओं में रहते हैं, कोई राज्य करते हैं और शत्रुओं को मारकर शासन करते हैं। कितने ही श्रुति-स्मृति के अनुसार कर्म करते
३२ योगवाशिष्ठ
है । कोई भोग भोगते हैं; कोई विरक्त होकर स्थित हैं । कोई दान, यज्ञादिक कर्म करते हैं । कोई स्त्रियों के साथ लीला करते, कहीं गीत सुनते और कहीं नन्दनवन में गन्धर्व गायन करते हैं । कोई गृह में स्थित हैं । कोई तीर्थ और यज्ञ करते हैं । कोई नौवत, नगाड़े और तुरही इत्यादि बाजे सुनते और नाना प्रकार के स्थानों में रहते हैं, परन्तु आसक्त नहीं होते । जैसे सुमेरु पर्वत तालाब में नहीं डूबता, वैसे ही ज्ञानवान् किसी पदार्थ में लिप्त नहीं होते । वे इष्ट को पाकर हर्षित नहीं होते और अनिष्ट को पाकर दुःखी नहीं होते । वे आपदा और सम्पदा में तुल्य रहते हैं और प्रकृत आचार (कर्म) करते हैं, परन्तु उनका हृदय सब आरम्भों से रहित है ।
हे राघव ! इसी दृष्टि का आश्रय करके तुम भी विचरो । यह दृष्टि सब पापों का नाश करती है । अहंकार से रहित होकर जो इच्छा हो सो करो । जब यथार्थदर्शी हुए, तब निर्बन्ध हुए, फिर जो कुछ प्रवाह में प्राप्त होगा, उसमें सुमेरु की नाईं तुम अटल रहोगे । हे राम ! यह सब जगत् चिन्मात्र है । न कुछ सत्य है, न असत्य है । वही इस प्रकार होकर भासता है । इस दृष्टि को आश्रय करके अन्य तुच्छ दृष्टि को त्यागो । हे राम ! असंसक्तबुद्धि होकर, सब भाव-अभाव में स्थित होकर, रागद्वेष से चलायमान न हो । अब सावधान हो ।
राम बोले, हे भगवन्! बड़े हर्ष की बात है । कि मैंने आपके प्रसाद से जानने योग्य पद जाना और प्रबुद्ध हुआ हूँ । जैसे सूर्य की किरणों से कमल प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही मैं प्रफुल्लित हुआ हूँ और जैसे शरत्काल में कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही आपके वचनों से मेरा संदेह और मान-मोह-मद-मत्सर सब नष्ट हो गये हैं । मैं अब सब क्षोभ से रहित शान्त को प्राप्त हुआ हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तनिश्चयवर्णनं नामैकादशस्सर्गः ॥ ११ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! सम्यक्ज्ञान के पश्चात् जीवन्मुक्त पद में किस प्रकार विश्राम पाते हैं, सो कहो । वशिष्ठजी बोले, हे राम !
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३३
संसार तरने की युक्ति को योग कहते हैं । वह युक्ति दो प्रकार की है— एक सम्यक्ज्ञान और दूसरी प्राणायाम । फिर राम ने पूछा, हे भगवन् ! इन दोनों में सुगम कौन है, जिसमें दुःख भी न हो और फिर क्षोभ भी न हो ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यद्यपि दोनों अर्थ योग शब्द के हैं, तथापि योग प्राणवायु के रोकने का ही नाम है । योग और ज्ञान, दोनों संसार से तरने के उपाय हैं । इन दोनों का फल एक ही सदाशिव ने कहा है । हे राम ! किसी को योग करना कठिन होता है और ज्ञान का निश्चय सुगम होता है, और किसी को ज्ञान का निश्चय कठिन होता है और योग करना सुगम है । यदि मुझसे पूछो तो दोनों में ज्ञान सुगम है; क्योंकि इसमें यत्न और कष्ट थोड़ा है । जानने योग्य पदार्थ के जाने से फिर सपने में भी भ्रम नहीं होता; क्योंकि वह साक्षीभूत होकर देखता है । जो बुद्धिमान योगेश्वर हैं, उनको भी कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वे स्वाभाविक ही चले जाते हैं और गुरु की युक्ति समझकर उनका चित्त शान्त हो जाता है । हे राम ! दोनों की सिद्धि अभ्यासरूप यत्न से होती है । अभ्यास के बिना कुछ नहीं प्राप्त होता । वह ज्ञान तो मैंने तुमसे कहा है । जो हृदय में विराजमान ज्ञेय है, उसका जानना ही ज्ञान है । वह प्राण अपान के रथ पर आरूढ़ है और हृदयरूपी गुहा में स्थित है । हे राम ! उस योग का भी क्रम सुनो । वह भी परम सिद्धि के निमित्त है । प्राणवायु जो नासिका और मुख के मार्ग में आती जाती है, उसको रोकने का क्रम कहता हूँ । उससे चित्त का उपशम हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानज्ञेयविचारो नाम द्वादशसर्गः ॥ १२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्रह्मरूपी आकाश के किसी अणु में यह जगतरूपी स्पन्दन आभास फुरा है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में मृगतृष्णा का जल फुरा आता है । वह जगत् के कारणभाव को प्राप्त हुआ है, जो ब्रह्म के नाभिकमल से उत्पन्न हुआ है । वही पितामह
३४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
कहाता है। उसका मानस पुत्र श्रेष्ठ आचारी मैं वशिष्ठ हूँ। नक्षत्र और ताराचक्र में मेरा निवास है और युग युग प्रति मैं वहाँ रहता हूँ। एक समय मैं नक्षत्रचक्र से उड़ा और इन्द्र की सभा में गया तो देखा कि वहाँ ऋषीश्वर, मुनीश्वर बैठे थे। इतने में नारद आदिक चिरंजीवियों का जो प्रसंग चला तो शातातप नाम के एक बुद्धिमान् ऋषीश्वर ने कहा कि हे साधो ! सबमें चिरंजीवी एक है। सुमेरु पर्वत के कोण में पद्मपराग नाम की कन्दरा के शिखर पर एक कल्पवृक्ष है। वह महा-सुन्दर और अपनी शोभा से पूर्ण है। उस वृक्ष की दक्षिण दिशा की डाल पर बहुत पक्षी रहते हैं। उन पक्षियों में एक महाश्रीमान् कौआ रहता है जिसका नाम भुशुण्डि है। वह वीतराग और बुद्धिमान् है। उसका आलय उस कल्पवृक्ष के टास पर बना हुआ है। जैसे ब्रह्मा नाभिकमल में रहते हैं, वैसे ही वह उस आलय में रहता है। जैसे वह जिया है वैसे न कोई जिया है और न जियेगा। उसकी बड़ी आयु है। वह महाबुद्धिमान्, विश्रान्तिमान्, शान्तरूप और काल का ज्ञाता है। हे साधो ! बहुत जीना भी उसी का फल है और पुण्यवान् भी वही है। उसको आत्मपद में विश्रान्ति हुई है और संसार की आस्था जाती रही है।
इस प्रकार जब उन देवताओं के देव ने कहा, तब सारी सभा में ऋषीश्वरों ने दूसरी बार पूछा कि उसका वृत्तान्त फिर कहो। तब उसने फिर वर्णन किया तो सब आश्चर्य को प्राप्त हुए। जब यह कथा-वार्त्ता हो चुकी, तब सब सभा उठ खड़ी हुई और सब अपने-अपने आश्रम को गये. पर मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसे पक्षी को किसी प्रकार देखना चाहिए। ऐसा विचार कर मैं सुमेरु पर्वत की कन्दरा की ओर चला और एक क्षण में वहाँ जा पहुँचा, तो क्या देखा कि महाप्रकाशरूप वह कन्दरा का शिखर रत्नमणियो से पूर्ण है और उसका गेरू की नाईं रङ्ग है। जैसे अग्नि की ज्वाला होती है, वैसे ही उसका प्रकाश था, जैसे प्रलयकाल में अग्नि की ज्वाला जलती हो, बीच में नीलमणि धूप के समान था। ऐसा प्रकाश था, जैसे संध्या के लाल बादल इकट्ठे
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३५
हुए हो; जैसे योगीश्वरों के ब्रह्मरन्ध्र से अग्नि निकलकर इकट्ठी हुई हो या जैसे बड़वानल समुद्र से निकलकर मेघ को ग्रहण करने के निमित्त स्थित हुई हो। निदान उसकी महासुन्दर रचना थी। वह फल और रत्नमणि संयुक्त प्रकाशमान था। ऊपर गङ्गा का प्रवाह चला जाता था, जो यज्ञोपवीतरूप था। गन्धर्व गीत गाते थे, देवियों के रहने के स्थान बने थे और हर्ष उपजाने को महासुन्दर लीला के स्थान विधाता ने वहाँ रचे थे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने सुमेरुशिखर-लीलावर्णनं नाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम! ऐसे शिखर पर मैंने कल्पवृक्ष देखा। वह महासुन्दर फलों से पूर्ण था और रत्न और मणियों के गुच्छे और स्वर्ण की बेलें लगी हुई थीं। तारों से दूने फूल देख पड़ते थे। मेघ की बूँदों से दूने पत्ते नजर आते थे और सूर्य की किरणों से दुगने त्रिवर्ग भासते थे, जिनका बिजली की नाईं चमत्कार था। मैंने देखा, पत्तों पर देवता, किन्नर, विद्याधर और देवियाँ बैठी हैं और अप्सराएँ नृत्य और गान करती हैं-जैसे भँवरे गुञ्जार करते फिरते हों। हे राम! रत्नों के गुच्छे और कलियाँ और मणि के फूल-फल-पत्ते बहुत घने देख पड़ते थे। सब स्थान फूल-फल-गुच्छों से पूर्ण थे और छहों ऋतुओं के फूल-फल वहाँ पाये जाते थे। उस वृक्ष की एक शाखा पर पक्षी बैठे कहीं फूल-फलादिक खाते थे, कहीं ब्रह्माजी के हंस बैठे थे, कहीं अग्नि के वाहन तोते, कहीं अश्विनीकुमार और भगवती के शिखावाले मोर, कहीं बगले, कहीं कबूतर और कहीं गरुड़ बैठे ऐसे शब्द करते थे, मानों ब्रह्मा कमल से उपजकर ॐकार का उच्चारण करते हों। कई ऐसे पक्षी देखे कि उनकी दो-दो चोंचें थीं।
फिर मैं आगे देखने को गया तो जहाँ उस वृक्ष की शाखा थी, वहाँ अनेक कौए बैठे देखे। जैसे महाप्रलय में मेघ लोकालोक पर्वत पर आ बैठते हैं, वैसे ही वहाँ अनेक कौए अचल बैठे थे, सो सोम, सूर्य, इन्द्र, वरुण और कुबेर के यज्ञ की रक्षा करनेवाले और पुण्यवान् स्त्रियों को
३६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
प्रसन्नता देनेवाले भर्ता के संदेश पहुँचानेवाले हैं। उनके मध्य में एक महा श्रीमान् और कान्तिमान् कौआ ऊँची ग्रीवा किये हुए बैठा था। जैसे नीलमणि चमकती है, वैसे ही उसकी ग्रीवा चमकती थी। पूर्ण मन और मानी अर्थात् मान करने योग्य, सुन्दर और प्राणवायु को जीतनेवाला, नित्य अन्तर्मुख और नित ही सुखी वह चिरंजीवी पुरुष वहाँ बैठा था, जिसने जगत् में दीर्घ आयु और जगत् की आगमापायी गति देखते-देखते बहुत कल्पों का स्मरण किया है, इन्द्र की कई परम्परा देखी हैं, और लोकपाल, वरुण, कुबेर, यमादिक के कई जन्म और देवताओं और सिद्धों के अनेक जन्म जिस पुरुष ने देखे हैं, जिसका अन्तःकरण प्रसन्न और गम्भीर है, जिसकी सुन्दर वाणी वक्रता से रहित है, जो निर्मल और निरहंकार सबका सुहृद् मित्र है, जो पिता समान हैं उनको पुत्र की नाईं है और जो पुत्र के समान हैं उनको उपदेश करने के निमित्त पिता और गुरु की नाईं समर्थ है, जो सर्वथा, सब प्रकार, सब समय, सबमें समर्थ और प्रसन्न, महामति, सहृदय, पुण्डरीक, व्यवहार का वेत्ता है। गम्भीर और शान्तरूप महाज्ञान-ज्ञेय उस पुरुष को मैंने देखा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डिदर्शनं नाम चतुर्दशसर्गः ॥ १४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसके अनन्तर मैं आकाशमार्ग से वहाँ आया और महातेजस्वी दीपकवत् प्रकाशमान मेरा शरीर था। जब मैं उतरा, तब जितने पक्षी वहाँ बैठे थे, वे सब जैसे वायु से कमल की पंक्ति और भूकम्प से समुद्र क्षोभ को प्राप्त होता है, वैसे ही क्षोभ को प्राप्त हुए। उनके मध्य में जो भुशुण्डि था, उसने मुझको यद्यपि अकस्मात् देखा तो भी जान गया कि यह वशिष्ठ है। वह खड़ा होकर बोला—हे मुनीश्वर ! स्वस्थ हो ? कुशल तो है ? हे राम ! ऐसे कहकर उसने संकल्प की हाथ की मुद्रा से मेरा अर्ध्यपाद्य कर भावसंयुक्त पूजन किया और नौकरों को दूर करके आप ही वृक्ष के बड़े पत्र ले और उनका आसन रचकर मुझको बैठाकर बोला—अहो आश्चर्य है ! हे
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३७
भगवन् ! आपने बड़ी कृपा की, जो दर्शन दिया। चिरपर्यन्त दर्शन रूपी अमृत से हम वृक्षसहित पूर्ण हो रहे हैं। हे भगवन् ! मेरे पुण्य इकट्ठे होकर प्रसन्नता के निमित्त आपको प्रेरित कर ले आये हैं। हे मुनीश्वर ! देवता जो पूजने योग्य हैं, उनके भी आप पूज्य हो। कृपा करके कहो कि आप किस निमित्त आये हैं और आपका क्या मनोरथ है? आपके चरणों के दर्शन करके मैंने तो सब कुछ जाना है। स्वर्ग की सभा में जब चिरजीवियों का प्रसंग चला था, तब मैं भी शरण में आया था, इससे आप मुझको पवित्र करने आये हैं। अब प्रभु के वचनरूपी अमृत के स्वाद की मुझको इच्छा है, इस निमित्त मैं प्रभु के मुख से कुछ सुना चाहता हूँ।
हे राम ! जब इस प्रकार चिरंजीवी भुशुण्डि नाम पक्षी ने मुझसे कहा, तब मैंने कहा, हे पक्षियों के महाराज ! जो कुछ तुमने कहा सो सच है। मैं अभ्यागत तुम्हारे आश्रम पर इस निमित्त आया हूँ कि चिरजीवियों की कथा चली थी और उसमें तुम्हारा वर्णन हुआ था। तुम मुझको शान्त-चित्त देख पड़ते हो, और मंगलमूर्ति हो। तुम संसाररूपी जाल से निकले हुए दीखते हो। इससे मेरे इस संशय को दूर करो कि कब तुमने जन्म लिया था, ज्ञात-ज्ञेय कैसे हुए, तुम्हारी आयु कितनी है, तुमको कौन-कौन देखा हुआ वृत्तान्त स्मरण है और तुमने किस कारण यहाँ निवास किया है।
भुशुण्डि बोले, हे मुनीश्वर ! जो कुछ तुमने पूछा, वह सब कहता हूँ, शनैः शनैः तुम श्रवण करो। तुम तो स्वयम् साक्षात् प्रभु, त्रिलोकी के पूज्य और त्रिकालदर्शी हो; परन्तु जो कुछ तुमने आज्ञा की है, वह मानने योग्य है। तुम जैसे महात्मा पुरुषों के दर्शन से अपने में जो कुछ ताप होता है, वह भी निवृत्त हो जाता है—जैसे मेघ के आने पर सूर्य की गर्मी मिट जाती है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डिसमागमनं नाम पञ्चदशस्सर्गः ॥ १५ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! इस जगत् में सब देवताओं के बड़े
३८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
देव सदाशिवजी हैं, जिन्होंने अर्द्धाङ्गिनी भगवती को शरीर में धारण किया है और जो महासुन्दर मूर्ति और त्रिनेत्र हैं। उनकी बड़ी-बड़ी जटा हैं और मस्तक पर चन्द्रमा है, जिससे अमृत टपकता है। जटा के चहुँ ओर गङ्गा फिरती है, जैसे फूलों की माला कण्ठ में होती है। काल-कूट के पीने से नीलकण्ठ के विषविभूषण हो गया है। कण्ठ में मुण्ड-माला है और सारे शरीर में भस्म लगी हुई है। दिशा उनके वस्त्र हैं; श्मशान में गृह है। वह महाशान्तरूप विचरते हैं। उनके साथ जो सेना है, उसके महाभयानक आकार हैं। किसी के तो रुद्र की नाईं तीन नेत्र हैं; किसी का तोते की नाईं मुख है; किसी का ऊँट का मुख है; कोई गर्दभमुख है; किसी का बैल का मुख है। कोई जीवों के हृदय में प्रवेश करके रक्तमांस के भोजन करने वाले हैं; कोई पहाड़ में रहते हैं; कितने ही वन, कन्दरा और श्मशान में रहते हैं। उनके साथ देवियाँ भी ऐसी हैं, जिनकी महाभयानक चेष्टा और आचार हैं।
उन देवियों में जो मुख्य देवियाँ हैं उनका जिस जिस दिशा में निवास है, वह सुनो। जया, विजया, जित और अपराजित वामदिशा की ओर तुम्बुरु रुद्र के आश्रित हैं। सिद्धा, सुखदा, रक्तका, और उतला, भैरव रुद्र के आश्रित हैं, सब देवियों के मध्य ये अष्टनायिका और शतसहस्र देवियाँ हैं—रुद्राणी, वैष्णवी, ब्राह्मणी, वाराही, वायवी, कौमारी, वासवी, गौरी इत्यादिक। इनके साथ मिली हुई आकाश में उत्तम देव, किन्नर, गन्धर्व, पुरुष, सुरसंभव स्त्रियाँ इनके साथ हुई हैं। भूचर पृथ्वी में कोटियों हैं और नाना प्रकार के रूप, नाम रखकर पृथ्वी में जीवों को भोजन करती हैं। उनके वाहन, ऊँट, गर्दभ, काक, वानर, तोते इत्यादिक हैं। उन देवियों में कई पशुधर्मिणी हैं, जो क्षुद्रकर्म में रत हैं और कई विदितवेद जीवन्मुक्तपद में स्थित हैं। उनके मध्य नायिका अलम्बुषा देवी हैं। जैसे विष्णु का वाहन गरुड़ है, वैसे ही उस देवी का वाहन काक है। यह देवी अष्टसिद्धि के ऐश्वर्य से युक्त है।
उन देवियों ने एक समय जगत् के पूज्य तुम्बुरु और भैरव की पूजा कर विचार किया कि सदाशिव हमसे प्रेम से नहीं बोलते और हमको
🌸 निर्वाण प्रकरण 🌸 ३६
तुच्छ जानते हैं, इससे हम इनको कुछ अपना प्रभाव दिखावें, क्योंकि प्रभाव दिखाये बिना कोई किसी को नहीं जानता। ऐसे विचार कर उमा को वश करके वे उड़ा ले गईं और उत्साह करके मद्य, मांसादिक भोजन किया। निदान माया के बल से पार्वती को मारकर चावल की नाईं पकाया और उनके कुछ पकाये हुए अंग सदाशिव को भोजन के लिए दिये। तब सदाशिव ने जाना कि मेरी प्यारी पार्वती को इन्होंने मारा है। यह निश्चय करके वह कुपित हुए। तब उन देवियों ने अपने-अपने अङ्ग से उमा के अङ्ग निकाले। सौरी ने नेत्र, कौमारी ने नासा और इसी प्रकार सबने अपने-अपने अङ्ग निकालकर वैसी ही पार्वती की मूर्ति ला दी और नये सिरे से विवाह कर दिया। तब सदाशिव प्रसन्न हुए। सब जगह उत्साह और आनन्द हुआ और सब देवियाँ अपने-अपने स्थानों को गईं। चन्द्र नाम का काक, जो अलम्बुषा देवी का वाहन था, उसने ब्रह्माणी की हंसिनी के साथ क्रीड़ा की और इसीप्रकार सबने क्रीड़ा की जिससे सबको गर्भ रह गया ।
निदान वह हंसिनी ब्रह्माणी के पास गई। ब्रह्माणी ने कहा कि अब तुममें मुझे उठाने की शक्ति नहीं है। तुम गर्भवती हो—जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ जाओ, फिर आना। हे मुनीश्वर ! ऐसे कहकर ब्रह्माणी निर्विकल्प समाधि में स्थित हुई और नाभिसरोवर, जो ब्रह्माणी का उत्पत्तिस्थान है, वहाँ जा स्थित हुई और उस तालाब के कमलपत्र पर उन्होंने निवास किया। जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब उन हंसिनियों ने तीन तीन अण्डे दिये। जैसे बेल से अंकुर उत्पन्न होता है, वैसे ही उनसे इक्कीस अण्डे क्रम से उत्पन्न हुए। कुछ काल उपरान्त जब उनको फोड़ा तो उन अण्डों से हमारे अङ्ग उत्पन्न हुए और क्रमशः जब हम बड़े हो उड़ने योग्य हुए, तब माता हमको ब्रह्माणी के पास ले गई। उनके आगे हमने मस्तक टेका। तब ब्रह्माणी ने, जो कि उसी समय समाधि से उठी थीं, हमको देखकर कृपा करके हमारे सिर पर हाथ रखा। उनके हाथ रखने से हमारी अविद्या नष्ट हो गई और हमारा मन तृप्त और शान्तरूप हो गया और हम जीवन्मुक्त
१० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
पद में स्थित हुए। तब हमको यह वृत्ति स्फुरित हुई कि किसी प्रकार एकान्त में जाकर ध्यान में स्थित हों। देवी ने आज्ञा दी कि अब तुम जाओ। तब देवी की आज्ञा से हम पिता के पास आये। पिता ने हमको गले से लगाया और मस्तक चूमा।
फिर हमने अलम्बुषा देवी की पूजा की। तब पिता ने हमसे कहा, हे पुत्रो! तुम संसाररूपी जाल में तो नहीं फँसे और यदि फँसे हो तो मैं भगवती की प्रार्थना करता हूँ वह भृत्यों पर दयालु है—जैसे तुम चाहोगे वैसे ही तुमको प्राप्त करेगी। तब हमने कहा, हे पिता! हम तो ज्ञात-ज्ञेय हुए हैं; जो कुछ जानने योग्य था, वह जान लिया है और जो पाने योग्य था, वह हमने ब्रह्माणी देवी के प्रसाद से पा लिया है। अब हमको एकान्त स्थान की इच्छा है जहाँ एकान्त हो, वहाँ जा बैठें। तब पिता चन्द्र ने कहा, हे पुत्रो! सुमेरु पर्वत निर्दोष, महापावन, निर्भय और क्षोभरहित सुन्दर स्थान है। वह सब रत्नों की खानि है, सब देवताओं का आश्रयरूप है और सूर्य-चन्द्रमा उसके दीपक हैं, जो चारों ओर फिरते हैं। ब्रह्माण्डरूपी मण्डप का वह खम्भा है और सुवर्ण का है। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र हैं और कण्ठ में तारों की माला है। दशों दिशा उसके वस्त्र हैं। रत्नमणियो के भूषण हैं और वृक्ष और बेल रोमा-वली हैं। उसकी त्रिलोकी में पूजा होती है। वह षोडश सहस्र योजन पाताल में है, जहाँ नाग और दैत्य उसकी पूजा करते हैं। चौरासी सहस्र योजन ऊपर है, जहाँ गन्धर्व, देवता, किन्नर, राक्षस, मनुष्य उसकी पूजा करते हैं। ऐसा पर्वत जम्बूद्वीप के एक स्थान में स्थित है और उसके आश्रय में चतुर्दश प्रकार के भूतजाति रहते हैं। वह बड़ा ऊँचा पर्वत है।
पद्मराग नाम उसका एक शिखर सूर्य जैसा उदय है। शिखर पर एक बड़ा कल्पवृक्ष है, जो मानों जगतरूपी शिखर का प्रतिबिम्ब है। उस कल्पवृक्ष की दक्षिणदिशा की ओर जो डाल है, उसमें महारत्न के गुच्छे, सुवर्ण के पत्ते और चन्द्रमा के बिम्ब जैसे फूल हैं। सघन और रमणीय गुच्छे लगे हैं। वहाँ एक आलय बना हुआ है। वहाँ मैं भी
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४१
पहले रह आया हूँ। जब देवीजी समाधि में स्थित हुई थीं, तब मैं वहाँ आलय बनाकर रहा था। चिन्तामणि की उसमें शलाका लगी हैं और वह महारत्नों से बना है। वहाँ जाकर तुम निवास करो। वहाँ और कौओं के बच्चे भी रहते हैं, जिनका हृदय आत्मज्ञान से शान्त है और बाहर से भी वे शान्त हैं। तुमको वहाँ भोग भी हैं और मोक्ष भी है। हे वशिष्ठजी! जब इस प्रकार पिता ने हमसे कहा, तब हम सबने पिता के चरण छुए और पिता ने हमारा मस्तक चूमा। निदान हम विन्ध्याचल पर्वत से उड़े और आकाशमार्ग से मेघ, नक्षत्र-चक्र और लोकान्तर होकर ब्रह्मलोक में पहुँच देवीजी को प्रणाम किया। उन्होंने भली प्रकार हमारे ऊपर कृपादृष्टि की। दया और स्नेहसहित गले लगाया और मस्तक चूमा। हम भी माथा टेककर सुमेरु को चले और सूर्य और चन्द्रमा के लोक और तारागण, लोकपाल और देवताओं के लोक मेघ और पवन के स्थान लाँघकर सुमेरुपर्वत के कल्पवृक्ष पर पहुँचे। हे मुनीश्वर! जिस प्रकार हम उपजे और जिससे ज्ञान प्राप्त हुए हैं और जिस प्रकार यहाँ आकर रहे हैं, वह सब समाचार हमने तुम्हारे आगे सम्पूर्ण कहा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने अस्ताचललाभो नाम षोडशस्सर्गः ॥ १६ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! यह चिरकाल की वार्ता तुमसे कही है। वह सृष्टि इस सृष्टि से बहुत पहले की है, परन्तु मैंने तुमको वर्तमान की नाईं अभ्यास के बल मे सुनाया है। हे मुनीश्वर! मेरा कोई पुण्य था, जो फला है, जिससे तुम्हारा निर्विघ्न दर्शन हुआ और यह आलय, शाखा और वृक्ष आज पवित्र हुए। अब जो कुछ संशय हो तो पूछो, मैं कहूँ। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर उसने मेरा भली प्रकार अर्ध्यपाद्य से आदर सहित पूजन किया। तब मैंने उससे कहा, हे पक्षियों के ईश्वर! तुम्हारे वे भाई कहाँ हैं, जो तुम्हारे समान तत्त्ववेत्ता थे? वे तो देख नहीं पड़ते, अकेले तुम्हीं दीखते हो।
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! यहाँ मुझको बहुत युगों की परम्परा
४२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
व्यतीत हुई है । जैसे सूर्य को कई दिन-रात्रि व्यतीत हो जाते हैं, वैसे ही मुझको युग व्यतीत हुए हैं । कुछ काल में मेरे भाई भी रहे थे, पर समय पाकर उन्होंने शरीर त्याग दिये और तृण की नाईं तनु त्यागकर शिव आत्मपद को प्राप्त हुए । हे मुनीश्वर ! बड़ी आयुवाला हो अथवा सिद्ध महन्त हो, बली हो, अथवा ऐश्वर्यवान् हो, काल सबको ग्रस लेता है । तब फिर मैंने पूछा, हे साधो ! जब प्रलयकाल आता है, तब सूर्य, चन्द्रमा, वायु, मेघ, ये सब अपनी-अपनी मर्यादा त्याग देते हैं और बड़ा क्षोभ होता है । पर उस समय तुमको खेद किस कारण नहीं होता ? सूर्य की तपन से अस्ताचल, उदयाचल आदि पर्वत भस्म हो जाते हैं, पर उस क्षोभ में तुम खेदयुक्त क्यों नहीं होते ?
भुशुण्डिजो बोले, हे मुनीश्वर ! कई जीव जगत् में आधार से रहते हैं और कई निराधार रहते हैं । जिनके सेना आदि ऐश्वर्य के पदार्थ होते हैं, वे आधारसहित हैं और जो इन पदार्थों से रहित हैं, वे निराधार हैं । पर दोनों को हम तुच्छ देखते हैं, सत् कोई नहीं । बड़े-बड़े ऐश्वर्यवान् और बली भी हैं, परन्तु सत्य कोई नहीं । उनमें पक्षी की जाति महातुच्छ है । उनका उजाड़ वन में निवास है और वहीं उनका दाना-पानी है । ये निरालम्ब या बेसहारे हैं और उनकी जीविका दैव ने ऐसे ही बनाई है । हे भगवन् ! मैं तो सदा सुखी हूँ और अपने आप में स्थित, आत्मसन्तोष से तृप्त हूँ । कदापि इस जगत् के क्षोभ से खेद को नहीं प्राप्त होता और स्वभावमात्र में सन्तुष्ट और कष्टचेष्टा से मुक्त हूँ । हे ब्राह्मण ! अब मैं केवल काल को व्यतीत करता हूँ और जगत् के इष्ट-अनिष्ट मुझको विचलित नहीं कर सकते । न मरने की मुझको इच्छा है और न जीने की; क्योंकि जीना और मरना शरीर की अवस्था है, आत्मा की नहीं । मुझे जीने का राग नहीं और मरने में द्वेष नहीं-जैसी अवस्था प्राप्त हो, उसी में सन्तुष्ट हूँ । हे मुनीश्वर ! ऐसे-ऐसे देखे हैं कि वे फिर भस्म हो गये हैं; उनकी अवस्था देखकर मेरे मन की चपलता जाती रही है । मैं इस कल्पवृक्ष पर बैठा हूँ, जिसमें रत्नों की वेलि लगी हैं । इस पर बैठकर मैं प्राण-अपान की गति को
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
४३
देखता हूँ। इनकी कला की जो सूक्ष्म गति है, उसका मैं ज्ञाता हूँ, और दिन-रात्रि का मुझको कुछ ज्ञान नहीं। सत्बुद्धि से मैं काल को जानता हूँ और सार-असार को भी भली प्रकार जानता हूँ। हे मुनीश्वर ! जो कुछ विस्तार भासित होता है, वह सब झूठ है, सत् कुछ नहीं। इसी कारण मुझे किसी दृश्य पदार्थ की इच्छा नहीं। मैं परम उपशमपद में स्थित हूँ और सब जगत् भी मेरे लिए शान्तरूप है। जो कोई इस जगज्जाल का आश्रय करता है, वह सुखी नहीं होता यह सब जगत् चञ्चल है और स्थिर कदापि नहीं होता। इसकी अवस्था में मैं पत्थर सा अचल हूँ; न किसी का मुझे राग फुरता है और न द्वेष है। न मैं किसी की इच्छा करता हूँ। सब जगत् मुझको तुच्छ भासित होता है। यह सब भूतरूपी नदियाँ कालरूपी समुद्र में जा पड़ती हैं। पर हम किनारे खड़े हैं, इससे कदापि नहीं डूबते, और जितने जीव हैं वे डूब जाते हैं। पर कई एक तुम जैसे उससे निकले हुए हैं। तुम्हारी कृपा से हम भी निर्विकारपद को प्राप्त हुए हैं।
हे मुनीश्वर ! मैं निर्विकार और सब जगत् के क्षोभ से रहित हूँ और आत्मपद को पाकर उपशमरूप हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे दर्शन से मैं अब पूर्ण आनन्द को प्राप्त हुआ। सन्त की संगति चन्द्रमा की चाँदनी सी शीतल और अमृत की नाईं आनन्द को देनेवाली है। ऐसा कौन है, जो सन्त के संग से आनन्द को न प्राप्त हो ? अर्थात् सब आनन्द को प्राप्त होते हैं। हे मुनीश्वर ! सन्त का संग चन्द्रमा के अमृत से भी अधिक है; क्योंकि वह शीतल गौण है, हृदय की तपन नहीं मिटाता और सन्त का संग अन्तःकरण की तपन मिटाता है। वह अमृत क्षीरसमुद्र मंथन के क्षोभ से निकला है और सन्त का संग सहज में सुख से प्राप्त होता है और आत्मानन्द को प्राप्त कराता है-इससे यह परम उत्तम है। मैं तो इससे उत्तम और कोई वस्तु नहीं मानता। सन्त का संग सबसे उत्तम है। सन्त भी वे ही हैं, जिनकी आरंभ में रमणीय सब इच्छाएँ निवृत्त हुई हैं, अर्थात् अविचार से जो दृश्य पदार्थ सुन्दर जान पड़ते हैं और नाशवान् हैं, वे उनको तुच्छ
४४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
प्रतीत होते हैं। वे सदा आत्मानन्द से तृप्त रहते हैं। वे अद्वैतनिष्ठ हैं; उनकी द्वैतकल्पना नहीं रही, वे सदा आत्मानन्द में स्थित हैं। ऐसे पुरुष सन्त कहाते हैं।
उन सन्तों की संगति ऐसी है, जैसे चिन्तामणि होती है; जिसके पाने से सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वर ! त्रिलोकीरूपी कमल के भँवरे और सब ज्ञानवानों से उत्तम तुम्हीं देख पड़े हो। तुम्हारे वचन स्निग्ध, कोमल और आत्मरस से पूर्ण, हृदयगम्य और उचित है। तुम्हारा हृदय महागम्भीर, उदार, धैर्यवान् और सदा आत्मानन्द से तृप्त है; इसलिए तुम सबसे उत्तम मुझको दीखते हो। तुम्हारे दर्शन से मेरे सब दुःख नष्ट हैं और आज मेरा जन्म सफल हुआ है। तुम जैसे सन्तों का संग आत्मपद को प्राप्त कराता है। उससे दुःख और भय नष्ट होते हैं और मनुष्य निर्भय हो जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सन्तमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तदशस्सर्गः ॥ १७ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! तुमने जो पूछा था कि सूर्य, वायु और जल को क्षोभ होता है तो तुमको क्षोभ क्यों नहीं होता, उसका उत्तर सुनो। जब जगत् को क्षोभ होता है, तब भी मेरा यह कल्पवृक्ष स्थिर रहता है, क्षोभ को नहीं प्राप्त होता। हे मुनीश्वर ! यह मेरा वृक्ष सब प्राणियों के लिए अगम्य है। प्राणी नष्ट होते हैं तब भी मैं सुखी रहता हूँ। जब हिरण्याक्ष द्वीपों सहित पृथ्वी को समेटकर पाताल ले गया था, तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। जब देवता और दैत्यों का युद्ध हुआ, तब और सब पर्वत चलायमान हुए, पर मेरा वृक्ष स्थिर रहा। जब क्षीरसमुद्र के मथने के निमित्त विष्णुजी सुमेरु को भुजा से उखाड़ने लगे, तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ, तब वह मन्दराचल को ले गये और उससे क्षीरसमुद्र को मथने लगे। प्रलयकाल के पवन और मेघ को क्षोभ हुआ तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। फिर एक दैत्य आकार सुमेरु को उखाड़ने लगा और उसने कुछ उखाड़ा भी, परन्तु मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। हे
* निर्वाण प्रकरण * [४५]
मुनीश्वर ! जब बड़े-बड़े उपद्रव हुए और प्रलयकाल के मेघ पवन और सूर्य तपे, तब भी मेरा वृक्ष स्थिर रहा है ।
इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! फिर मैंने उससे पूछा कि हे साधो ! जब प्रलयकाल के वायु और मेघ क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब तुम विगतज्वर कैसे रहते हो ? भुशुण्डिजी ने कहा, हे साधो ! जब प्रलयकाल के वायु, मेघादिक क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब मैं कृतघ्न की नाईं अपने आलय को त्यागकर सब क्षोभ से रहित आकाश में स्थित होता हूँ और सब अंगों को समेट लेता हूँ । जैसे वासना को रोकने से मन सकुच जाता है, वैसे ही मैं भी अङ्ग को समेट लेता हूँ। हे मुनीश्वर ! जब प्रलयकाल का सूर्य तपता है, तब मैं जल की धारणा से जलरूप हो जाता हूँ। जब वायु चलता है, तब पर्वत की धारणा बाँधकर स्थित हो जाता हूँ । जब बहुत तत्त्वों का क्षोभ होता है, तब सबको त्यागकर ब्रह्माण्ड के पार जो निर्मल परमपद है, वहाँ मैं सुषुप्ति सा अचल गम्भीर हो जाता हूँ । जब ब्रह्मा उपजकर फिर सृष्टि रचते हैं, तब मैं सुमेरु के वृक्ष पर इसी आलय में स्थित होता हूँ । फिर मैंने पूछा, हे पक्षियों के ईश्वर ! जैसे तुम अखण्ड स्थित होते हो, वैसे ही और योगीश्वर क्यों नहीं स्थित होते ? भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! परमात्मा की यह नीति किसी से नाँघी नहीं जाती । उन योगीश्वरों की नीति इसी प्रकार बनाई गई है और मेरी उत्पत्ति इसी प्रकार है । ईश्वर की नीति अतुल है । उसकी तुलना किसी से नहीं की जाती । जहाँ जैसी नीति बनी है वहाँ वैसी ही है; अन्यथा किसी से नहीं होती । मुझको इसी प्रकार है कि कल्प-कल्प में इसी पर्वत के वृक्ष पर मेरा आलय होता है और मैं आकर निवास करता हूँ ।
वशिष्ठजी बोले, हे पक्षियों के नायक ! तुम्हारी अत्यन्त दीर्घ आयु है । तुम ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न योगेश्वर हो । तुमने अनेक आश्चर्य देखे हैं । उनमें जो स्मरण हों, उन्हें कहो । भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! ऐसा याद आता है कि एक बार पृथ्वी पर तृण और वृक्ष ही थे और कुछ न था । फिर एक बार एकादश सहस्र वर्ष पर्यन्त भस्म ही भस्म
४६ ⁂ योगवाशिष्ठ ⁂
देख पड़ती थी । जो वृक्ष और तृण थे, सब जल गये थे, एक बार ऐसी सृष्टि हुई कि उसमें चन्द्र और सूर्य न उपजे और दिन और रात्रि की गति कुछ जानी न जाती थी । पर कुछ सुमेरु के रत्नों का प्रकाश होता था । एक कल्प ऐसा हुआ है कि जिसमें देवताओं और दैत्यों का युद्ध हुआ था । जब दैत्यों की जीत हुई तो उन्होंने सब देवताओं को मनुष्यों की भाँति मार डाला । ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, इन तीनों देवताओं के सिवा और सब सृष्टि उन्होंने जीती और बीस युग पर्यन्त उन्हीं की आज्ञा चली । एक बार ऐसा स्मरण आता है कि दो युग पर्यन्त पृथ्वी पर वृक्ष ही वृक्ष थे, और कुछ सृष्टि न थी । एक बार दो युग पर्यन्त पृथ्वी पर पर्वत ही पर्वत सघन हो रहे थे, और कुछ न था । एक बार ऐसा हुआ कि सब जल ही जल हो गया, और कुछ न देख पड़ता था, केवल सुमेरु पर्वत खंभे की नांई खड़ा था । एक बार अगस्त्य मुनि दक्षिण दिशा से आये । तब विन्ध्याचल पर्वत बढ़ा और उसने सब ब्रह्माण्ड चूर्ण कर दिया ।
हे मुनीश्वर ! बहुत कुछ स्मरण है, परन्तु संक्षेप में सुनो । एक समय सृष्टि में मनुष्य, देवतादिक कुछ न दीखते थे । एक बार ऐसी सृष्टि हुई कि ब्राह्मण मद्यपान करते थे, शूद्र बड़े हो बैठे थे और सब जीवों के धर्म उलट-पलट गये थे । एक बार ऐसी सृष्टि स्मरण आती है कि पृथ्वी में कोई पर्वत न देख पड़ता था । एक बार ऐसी सृष्टि उत्पन्न हुई कि सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, लोकपाल आदि कोई न उपजा । एक सृष्टि ऐसी हुई कि सबी उपजे । एक सृष्टि ऐसी हुई कि उसमें स्वामि-कार्तिक नहीं उपजे, दैत्य बढ़ गये और दैत्यों ही का राज्य हो गया । मुझको बहुत स्मरण है, कहाँ तक कहूँ । सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, इन्द्र, उपेन्द्र और लोकपालों के बहुत जन्म मुझको स्मरण हैं । जब हिरण्याक्ष को, जो वेदों को चुरा ले आया था, हरि ने मारा था वह भी स्मरण है और क्षीरसमुद्र मथना भी स्मरण है । ऐसी सृष्टि भी देखी है, जिसमें विष्णुजी का वाहन गरुड़ नहीं हुआ । ब्रह्माजी हंस वाहन के बिना और रुद्र बैल वाहन के बिना हुए हैं ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २७
इसी प्रकार बहुत कुछ देखा है, क्या क्या तुम्हारे आगे वर्णन करूँ । इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने जीवित- वृत्तान्तवर्णनं नामाष्टादशस्सर्गः ॥ १८ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! जब फिर सृष्टि उत्पन्न हुई, तब तुम भरद्वाज, पुलस्त्य, नारद, इन्द्र, मरीचि, उद्दालक, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा, सनत्कुमार, भार्गवेश आदि उपजे । फिर सुमेरु, मन्दराचल, कैलास, हिमालय आदि पर्वत उपजे । अत्रि, वासुदेव, बाल्मीकि इत्यादि तो अल्पकाल के उपजे हैं । हे मुनीश्वर ! तुम ब्रह्मा के पुत्र हो और तुम्हारे आठ जन्म मुझको स्मरण हैं । कभी तुम आकाश से उपजे हो, कभी जल से उपजे, कभी पहाड़ से उपजे, कभी पवन से उपजे और कभी अग्नि से उपजे हो । हे मुनीश्वर ! मन्दराचल पर्वत को क्षीरसमुद्र में डालकर जब देवता और दैत्य मथने लगे और उन्हें क्षोभ हुआ कि मन्दराचल नीचे चला जाता है, तब विष्णुजी ने कच्छपरूप धारणकर पर्वत को रोका और सागर से अमृत निकाला था, यह घटना मुझको द्वादश बार स्मरण आती है । तीन बार हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल में समेट ले गया है और छः बार परशुराम रेणुका माता के पुत्र हुए हैं । यह सृष्टि के बहुत पीछे हुए हैं । जब क्षत्रियों में दैत्य उपजने लगे तो उनके नाश निमित्त विष्णु ने परशुराम का अवतार लिया था ।
हे मुनीश्वर ! एक सृष्टि ऐसी हुई है, जिसमें शास्त्र और पुराणों के अर्थ पहले के विपरीत उलटे लगाये जाने लगे । एक कल्प में शास्त्र के और ही पाठ, और ही युक्ति, और ही अर्थ हुए; क्योंकि युग युग प्रति और ही पुराण होते हैं । किसी को देवता बनाते हैं और किसी को ऋषीश्वर-मुनीश्वर कहते हैं । कथा और इतिहास भी मुझे बहुत स्मरण हैं । बाल्मीकिजी ने द्वादश बार रामायण बनाई और विलय हो गई । व्यासजी ने दो बार महाभारत बनाई और उन्होंने सात बार अवतार लिया है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार आख्यान, कथा, इतिहास और शास्त्र जो जो हुए हैं, वे सब मुझको अच्छी तरह स्मरण हैं । हे साधो ! दैत्यों के मारने के निमित्त विष्णुजी युग युग प्रति
४८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
अवतार लेते हैं। मुझको एकादश बार रामजी स्मरण आते हैं। वसुदेव के गृह में पृथ्वी का भार उतारने के निमित्त कृष्णजी ने सोलह बार अवतार लिया है, सो भी मुझको स्मरण है। तीन बार नरसिंह अवतार धारण कर विष्णु ने हिरण्यकशिपु को मारा है। हे मुनीश्वर ! इसी प्रकार मुझको अनेक सृष्टि स्मरण हैं, परन्तु सभी भ्रममात्र हैं, कोई उपजी नहीं। जब आत्मतत्त्व में देखता हूँ, तब कोई सृष्टि नहीं भासती, सब सत्तामात्र है। जैसे जल में बुलबुले उपजकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही आत्मा में मन के फुरने से अनेक सृष्टि उपजती हैं और लीन हो जाती हैं। उस स्फुरण से मैंने कई सृष्टि देखी हैं। कोई सदृश ही उपजती हैं, कोई अर्धसदृश और कोई विपर्ययरूप हैं। हे मुनीश्वर ! किसी-किसी सृष्टि में एक से ही आकार और कर्म-आचार होते हैं। मन्वन्तर मन्वन्तर प्रति कोई और ही सृष्टि होती है। किसी में ऐसा होता है कि पुत्र पिता हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाता है, बान्धव अबान्धव और अबान्धव बान्धव हो जाते हैं। इस प्रकार भी विपर्यय होते देख पड़े हैं। कभी इसी कल्पवृक्ष पर मेरा घर होता है, कभी मन्दराचल में, कभी हिमालय पर्वत में, और कभी मालव पर्वत में होता है। इसी प्रकार कभी वन, वृक्ष और बेलों पर होता है और कभी इस कल्पवृक्ष के ऊपर होता है। पर अब तो बहुत काल से इसी कल्प-वृक्ष पर रहता हूँ।
जब सृष्टि का नाश हो जाता है, तब भी मेरा यही शरीर रहता है। मैं आसन लगाकर अपने पुर्यष्टक को ब्रह्मसत्ता में स्थित करता हूँ, इसी कारण मुझको फिर यही शरीर प्राप्त होता है। हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् संकल्पमात्र है। जैसा संकल्प फुरता है, वैसा ही आगे भासित होता है। यह जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं, केवल भ्रमरूप है। इस भ्रममय जगत्-प्रपंच में अनेक आश्चर्य देखे जाते हैं; पिता पुत्र हो जाता है, मित्र शत्रु हो जाता है, स्त्री पुरुष हो जाती है और पुरुष स्त्री हो जाता है। कभी कलियुग में सतयुग और कभी सतयुग में कलियुग वर्तने लगता है, कभी द्वापर में त्रेता और त्रेता में द्वापर