योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३७
भगवन् ! आपने बड़ी कृपा की, जो दर्शन दिया। चिरपर्यन्त दर्शन रूपी अमृत से हम वृक्षसहित पूर्ण हो रहे हैं। हे भगवन् ! मेरे पुण्य इकट्ठे होकर प्रसन्नता के निमित्त आपको प्रेरित कर ले आये हैं। हे मुनीश्वर ! देवता जो पूजने योग्य हैं, उनके भी आप पूज्य हो। कृपा करके कहो कि आप किस निमित्त आये हैं और आपका क्या मनोरथ है? आपके चरणों के दर्शन करके मैंने तो सब कुछ जाना है। स्वर्ग की सभा में जब चिरजीवियों का प्रसंग चला था, तब मैं भी शरण में आया था, इससे आप मुझको पवित्र करने आये हैं। अब प्रभु के वचनरूपी अमृत के स्वाद की मुझको इच्छा है, इस निमित्त मैं प्रभु के मुख से कुछ सुना चाहता हूँ।
हे राम ! जब इस प्रकार चिरंजीवी भुशुण्डि नाम पक्षी ने मुझसे कहा, तब मैंने कहा, हे पक्षियों के महाराज ! जो कुछ तुमने कहा सो सच है। मैं अभ्यागत तुम्हारे आश्रम पर इस निमित्त आया हूँ कि चिरजीवियों की कथा चली थी और उसमें तुम्हारा वर्णन हुआ था। तुम मुझको शान्त-चित्त देख पड़ते हो, और मंगलमूर्ति हो। तुम संसाररूपी जाल से निकले हुए दीखते हो। इससे मेरे इस संशय को दूर करो कि कब तुमने जन्म लिया था, ज्ञात-ज्ञेय कैसे हुए, तुम्हारी आयु कितनी है, तुमको कौन-कौन देखा हुआ वृत्तान्त स्मरण है और तुमने किस कारण यहाँ निवास किया है।
भुशुण्डि बोले, हे मुनीश्वर ! जो कुछ तुमने पूछा, वह सब कहता हूँ, शनैः शनैः तुम श्रवण करो। तुम तो स्वयम् साक्षात् प्रभु, त्रिलोकी के पूज्य और त्रिकालदर्शी हो; परन्तु जो कुछ तुमने आज्ञा की है, वह मानने योग्य है। तुम जैसे महात्मा पुरुषों के दर्शन से अपने में जो कुछ ताप होता है, वह भी निवृत्त हो जाता है—जैसे मेघ के आने पर सूर्य की गर्मी मिट जाती है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डिसमागमनं नाम पञ्चदशस्सर्गः ॥ १५ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! इस जगत् में सब देवताओं के बड़े