योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
प्रसन्नता देनेवाले भर्ता के संदेश पहुँचानेवाले हैं। उनके मध्य में एक महा श्रीमान् और कान्तिमान् कौआ ऊँची ग्रीवा किये हुए बैठा था। जैसे नीलमणि चमकती है, वैसे ही उसकी ग्रीवा चमकती थी। पूर्ण मन और मानी अर्थात् मान करने योग्य, सुन्दर और प्राणवायु को जीतनेवाला, नित्य अन्तर्मुख और नित ही सुखी वह चिरंजीवी पुरुष वहाँ बैठा था, जिसने जगत् में दीर्घ आयु और जगत् की आगमापायी गति देखते-देखते बहुत कल्पों का स्मरण किया है, इन्द्र की कई परम्परा देखी हैं, और लोकपाल, वरुण, कुबेर, यमादिक के कई जन्म और देवताओं और सिद्धों के अनेक जन्म जिस पुरुष ने देखे हैं, जिसका अन्तःकरण प्रसन्न और गम्भीर है, जिसकी सुन्दर वाणी वक्रता से रहित है, जो निर्मल और निरहंकार सबका सुहृद् मित्र है, जो पिता समान हैं उनको पुत्र की नाईं है और जो पुत्र के समान हैं उनको उपदेश करने के निमित्त पिता और गुरु की नाईं समर्थ है, जो सर्वथा, सब प्रकार, सब समय, सबमें समर्थ और प्रसन्न, महामति, सहृदय, पुण्डरीक, व्यवहार का वेत्ता है। गम्भीर और शान्तरूप महाज्ञान-ज्ञेय उस पुरुष को मैंने देखा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डिदर्शनं नाम चतुर्दशसर्गः ॥ १४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसके अनन्तर मैं आकाशमार्ग से वहाँ आया और महातेजस्वी दीपकवत् प्रकाशमान मेरा शरीर था। जब मैं उतरा, तब जितने पक्षी वहाँ बैठे थे, वे सब जैसे वायु से कमल की पंक्ति और भूकम्प से समुद्र क्षोभ को प्राप्त होता है, वैसे ही क्षोभ को प्राप्त हुए। उनके मध्य में जो भुशुण्डि था, उसने मुझको यद्यपि अकस्मात् देखा तो भी जान गया कि यह वशिष्ठ है। वह खड़ा होकर बोला—हे मुनीश्वर ! स्वस्थ हो ? कुशल तो है ? हे राम ! ऐसे कहकर उसने संकल्प की हाथ की मुद्रा से मेरा अर्ध्यपाद्य कर भावसंयुक्त पूजन किया और नौकरों को दूर करके आप ही वृक्ष के बड़े पत्र ले और उनका आसन रचकर मुझको बैठाकर बोला—अहो आश्चर्य है ! हे