योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 846, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३५
हुए हो; जैसे योगीश्वरों के ब्रह्मरन्ध्र से अग्नि निकलकर इकट्ठी हुई हो या जैसे बड़वानल समुद्र से निकलकर मेघ को ग्रहण करने के निमित्त स्थित हुई हो। निदान उसकी महासुन्दर रचना थी। वह फल और रत्नमणि संयुक्त प्रकाशमान था। ऊपर गङ्गा का प्रवाह चला जाता था, जो यज्ञोपवीतरूप था। गन्धर्व गीत गाते थे, देवियों के रहने के स्थान बने थे और हर्ष उपजाने को महासुन्दर लीला के स्थान विधाता ने वहाँ रचे थे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने सुमेरुशिखर-लीलावर्णनं नाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम! ऐसे शिखर पर मैंने कल्पवृक्ष देखा। वह महासुन्दर फलों से पूर्ण था और रत्न और मणियों के गुच्छे और स्वर्ण की बेलें लगी हुई थीं। तारों से दूने फूल देख पड़ते थे। मेघ की बूँदों से दूने पत्ते नजर आते थे और सूर्य की किरणों से दुगने त्रिवर्ग भासते थे, जिनका बिजली की नाईं चमत्कार था। मैंने देखा, पत्तों पर देवता, किन्नर, विद्याधर और देवियाँ बैठी हैं और अप्सराएँ नृत्य और गान करती हैं-जैसे भँवरे गुञ्जार करते फिरते हों। हे राम! रत्नों के गुच्छे और कलियाँ और मणि के फूल-फल-पत्ते बहुत घने देख पड़ते थे। सब स्थान फूल-फल-गुच्छों से पूर्ण थे और छहों ऋतुओं के फूल-फल वहाँ पाये जाते थे। उस वृक्ष की एक शाखा पर पक्षी बैठे कहीं फूल-फलादिक खाते थे, कहीं ब्रह्माजी के हंस बैठे थे, कहीं अग्नि के वाहन तोते, कहीं अश्विनीकुमार और भगवती के शिखावाले मोर, कहीं बगले, कहीं कबूतर और कहीं गरुड़ बैठे ऐसे शब्द करते थे, मानों ब्रह्मा कमल से उपजकर ॐकार का उच्चारण करते हों। कई ऐसे पक्षी देखे कि उनकी दो-दो चोंचें थीं।
फिर मैं आगे देखने को गया तो जहाँ उस वृक्ष की शाखा थी, वहाँ अनेक कौए बैठे देखे। जैसे महाप्रलय में मेघ लोकालोक पर्वत पर आ बैठते हैं, वैसे ही वहाँ अनेक कौए अचल बैठे थे, सो सोम, सूर्य, इन्द्र, वरुण और कुबेर के यज्ञ की रक्षा करनेवाले और पुण्यवान् स्त्रियों को