योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 845, कुल 1734 में से
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कहाता है। उसका मानस पुत्र श्रेष्ठ आचारी मैं वशिष्ठ हूँ। नक्षत्र और ताराचक्र में मेरा निवास है और युग युग प्रति मैं वहाँ रहता हूँ। एक समय मैं नक्षत्रचक्र से उड़ा और इन्द्र की सभा में गया तो देखा कि वहाँ ऋषीश्वर, मुनीश्वर बैठे थे। इतने में नारद आदिक चिरंजीवियों का जो प्रसंग चला तो शातातप नाम के एक बुद्धिमान् ऋषीश्वर ने कहा कि हे साधो ! सबमें चिरंजीवी एक है। सुमेरु पर्वत के कोण में पद्मपराग नाम की कन्दरा के शिखर पर एक कल्पवृक्ष है। वह महा-सुन्दर और अपनी शोभा से पूर्ण है। उस वृक्ष की दक्षिण दिशा की डाल पर बहुत पक्षी रहते हैं। उन पक्षियों में एक महाश्रीमान् कौआ रहता है जिसका नाम भुशुण्डि है। वह वीतराग और बुद्धिमान् है। उसका आलय उस कल्पवृक्ष के टास पर बना हुआ है। जैसे ब्रह्मा नाभिकमल में रहते हैं, वैसे ही वह उस आलय में रहता है। जैसे वह जिया है वैसे न कोई जिया है और न जियेगा। उसकी बड़ी आयु है। वह महाबुद्धिमान्, विश्रान्तिमान्, शान्तरूप और काल का ज्ञाता है। हे साधो ! बहुत जीना भी उसी का फल है और पुण्यवान् भी वही है। उसको आत्मपद में विश्रान्ति हुई है और संसार की आस्था जाती रही है।
इस प्रकार जब उन देवताओं के देव ने कहा, तब सारी सभा में ऋषीश्वरों ने दूसरी बार पूछा कि उसका वृत्तान्त फिर कहो। तब उसने फिर वर्णन किया तो सब आश्चर्य को प्राप्त हुए। जब यह कथा-वार्त्ता हो चुकी, तब सब सभा उठ खड़ी हुई और सब अपने-अपने आश्रम को गये. पर मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसे पक्षी को किसी प्रकार देखना चाहिए। ऐसा विचार कर मैं सुमेरु पर्वत की कन्दरा की ओर चला और एक क्षण में वहाँ जा पहुँचा, तो क्या देखा कि महाप्रकाशरूप वह कन्दरा का शिखर रत्नमणियो से पूर्ण है और उसका गेरू की नाईं रङ्ग है। जैसे अग्नि की ज्वाला होती है, वैसे ही उसका प्रकाश था, जैसे प्रलयकाल में अग्नि की ज्वाला जलती हो, बीच में नीलमणि धूप के समान था। ऐसा प्रकाश था, जैसे संध्या के लाल बादल इकट्ठे