योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 844, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३३
संसार तरने की युक्ति को योग कहते हैं । वह युक्ति दो प्रकार की है— एक सम्यक्ज्ञान और दूसरी प्राणायाम । फिर राम ने पूछा, हे भगवन् ! इन दोनों में सुगम कौन है, जिसमें दुःख भी न हो और फिर क्षोभ भी न हो ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यद्यपि दोनों अर्थ योग शब्द के हैं, तथापि योग प्राणवायु के रोकने का ही नाम है । योग और ज्ञान, दोनों संसार से तरने के उपाय हैं । इन दोनों का फल एक ही सदाशिव ने कहा है । हे राम ! किसी को योग करना कठिन होता है और ज्ञान का निश्चय सुगम होता है, और किसी को ज्ञान का निश्चय कठिन होता है और योग करना सुगम है । यदि मुझसे पूछो तो दोनों में ज्ञान सुगम है; क्योंकि इसमें यत्न और कष्ट थोड़ा है । जानने योग्य पदार्थ के जाने से फिर सपने में भी भ्रम नहीं होता; क्योंकि वह साक्षीभूत होकर देखता है । जो बुद्धिमान योगेश्वर हैं, उनको भी कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वे स्वाभाविक ही चले जाते हैं और गुरु की युक्ति समझकर उनका चित्त शान्त हो जाता है । हे राम ! दोनों की सिद्धि अभ्यासरूप यत्न से होती है । अभ्यास के बिना कुछ नहीं प्राप्त होता । वह ज्ञान तो मैंने तुमसे कहा है । जो हृदय में विराजमान ज्ञेय है, उसका जानना ही ज्ञान है । वह प्राण अपान के रथ पर आरूढ़ है और हृदयरूपी गुहा में स्थित है । हे राम ! उस योग का भी क्रम सुनो । वह भी परम सिद्धि के निमित्त है । प्राणवायु जो नासिका और मुख के मार्ग में आती जाती है, उसको रोकने का क्रम कहता हूँ । उससे चित्त का उपशम हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानज्ञेयविचारो नाम द्वादशसर्गः ॥ १२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्रह्मरूपी आकाश के किसी अणु में यह जगतरूपी स्पन्दन आभास फुरा है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में मृगतृष्णा का जल फुरा आता है । वह जगत् के कारणभाव को प्राप्त हुआ है, जो ब्रह्म के नाभिकमल से उत्पन्न हुआ है । वही पितामह