योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 843, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ योगवाशिष्ठ
है । कोई भोग भोगते हैं; कोई विरक्त होकर स्थित हैं । कोई दान, यज्ञादिक कर्म करते हैं । कोई स्त्रियों के साथ लीला करते, कहीं गीत सुनते और कहीं नन्दनवन में गन्धर्व गायन करते हैं । कोई गृह में स्थित हैं । कोई तीर्थ और यज्ञ करते हैं । कोई नौवत, नगाड़े और तुरही इत्यादि बाजे सुनते और नाना प्रकार के स्थानों में रहते हैं, परन्तु आसक्त नहीं होते । जैसे सुमेरु पर्वत तालाब में नहीं डूबता, वैसे ही ज्ञानवान् किसी पदार्थ में लिप्त नहीं होते । वे इष्ट को पाकर हर्षित नहीं होते और अनिष्ट को पाकर दुःखी नहीं होते । वे आपदा और सम्पदा में तुल्य रहते हैं और प्रकृत आचार (कर्म) करते हैं, परन्तु उनका हृदय सब आरम्भों से रहित है ।
हे राघव ! इसी दृष्टि का आश्रय करके तुम भी विचरो । यह दृष्टि सब पापों का नाश करती है । अहंकार से रहित होकर जो इच्छा हो सो करो । जब यथार्थदर्शी हुए, तब निर्बन्ध हुए, फिर जो कुछ प्रवाह में प्राप्त होगा, उसमें सुमेरु की नाईं तुम अटल रहोगे । हे राम ! यह सब जगत् चिन्मात्र है । न कुछ सत्य है, न असत्य है । वही इस प्रकार होकर भासता है । इस दृष्टि को आश्रय करके अन्य तुच्छ दृष्टि को त्यागो । हे राम ! असंसक्तबुद्धि होकर, सब भाव-अभाव में स्थित होकर, रागद्वेष से चलायमान न हो । अब सावधान हो ।
राम बोले, हे भगवन्! बड़े हर्ष की बात है । कि मैंने आपके प्रसाद से जानने योग्य पद जाना और प्रबुद्ध हुआ हूँ । जैसे सूर्य की किरणों से कमल प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही मैं प्रफुल्लित हुआ हूँ और जैसे शरत्काल में कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही आपके वचनों से मेरा संदेह और मान-मोह-मद-मत्सर सब नष्ट हो गये हैं । मैं अब सब क्षोभ से रहित शान्त को प्राप्त हुआ हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तनिश्चयवर्णनं नामैकादशस्सर्गः ॥ ११ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! सम्यक्ज्ञान के पश्चात् जीवन्मुक्त पद में किस प्रकार विश्राम पाते हैं, सो कहो । वशिष्ठजी बोले, हे राम !