योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 842, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३१
आत्मा की हम उपासना करते हैं। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत में जो समतत्त्व है, उसकी हम उपासना करते हैं। त्रिलोकी के देहरूपी मोतियों में जो तन्तु की नाईं अनुस्यूत है और फैलने और सिकुड़ने का कारण है, उस चैतन्यरूप आत्मा की हम उपासना करते हैं। जो षोडश कलासंयुक्त और षोडश कला से रहित और अकिंचन तथा किंचनरूप है, उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं। चैतन्यरूप अमृत जो क्षीरसमुद्र से निकला है और चन्द्रमा के मण्डल में रहता है, ऐसा जो स्वतः सिद्ध अमृत है, जिसको पाकर कदापि मृत्यु नहीं होती, उस चैतन्य अमृत की हम उपासना करते हैं। जो अखण्ड प्रकाश है और सब भूतों को सुन्दर करता है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं, जिससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रगटते हैं, और जो आप इससे रहित है, उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं। सब में हूँ और सब में नहीं, और भी कोई नहीं, इस प्रकार विदित वेद अपने अद्वैतरूप में विगतज्वर होकर स्थित होते हैं। यही निश्चय ज्ञानवानों का है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तनिश्चयोपदेशो नाम दशमसर्गः ॥ १० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो निष्पाप पुरुष है, उसको यही निश्चय रहता है कि सत्यरूप आत्मतत्त्व है। यह पूर्ण बोधवान् का निश्चय है। उसको न किसी में राग होता है और न किसी में द्वेष। उसको जीना और मरना सुख-दुःख नहीं देते। वह एक समान रहता है। वह विष्णु-नारायण का अङ्ग है, अर्थात् अभिन्न और सदा अचल है। जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता, वैसे ही वह दुःख से चलायमान नहीं होता। ऐसे जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे वन में विचरते हैं और नगर द्वीप आदिक नाना प्रकार के स्थानों में भी फिरते हैं; परन्तु दुःख नहीं पाते। कोई स्वर्ग में फूलों के वन और बगीचों में फिरते हैं, कोई पर्वत की कन्दराओं में रहते हैं, कोई राज्य करते हैं और शत्रुओं को मारकर शासन करते हैं। कितने ही श्रुति-स्मृति के अनुसार कर्म करते