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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 841, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 841

३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

निरन्तर स्वच्छ आत्मा, प्रकाशरूप, मन के उत्थान से रहित, मौनरूप में ही हूँ और परम अमृत, निरन्तर सब भूतों में सत्तारूप से मैं ही स्थित हूँ । सदा निर्लेप, साक्षी, सुषुप्ति की नाईं और द्वेतकला से रहित अक्षोभरूप अनुभव में ही हूँ। शान्तरूप जगत् में मैं ही फैल रहा हूँ और सब वासना से रहित अक्षोभरूपी अनुभव में ही हूँ।

जिससे सब स्वादों का अनुभव होता है, वह चैतन्य ब्रह्म आत्मा मैं ही हूँ। जिसका चित्त स्त्री में आसक्त है, जिसको चन्द्रमा की कान्ति से अधिक मुदिता है और जिससे स्त्री का स्पर्श और मुदिता का अनुभव होता है, ऐसा चैतन्य ब्रह्म में ही हूँ। सुख-दुःख की कल्पना से रहित मनहीन सत्ता और अनुभवरूप जो आत्मा है, वह चैतन्यरूप आत्मा ब्रह्म में ही हूँ। मधुर और नीम आदिक में स्वादरूप में ही हूँ। खेद और आनन्द, लाभ और हानि मुझको तुल्य है। मैं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और साक्षी तुरीयरूप आदि, अन्त से रहित चैतन्य ब्रह्म निरामय हूँ। जैसे एक खेत की ईखों में एक ही सा रस होता है, वैसे ही अनेक मूर्तियों में एक ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। वह सत्य, शुद्ध, सम शान्तरूप और सर्वज्ञ है। जो प्रकाशक और सूर्य की भाँति है, वह प्रकाशरूप ब्रह्म में ही हूँ और सब शरीरों में व्याप्त रहा हूँ। जैसे मोती की माला में तागा गुप्त होता है, जिसमें मोती पिरोये हैं, वैसे ही मोतीरूप शरीर में तन्तु-रूप गुप्त में ही हूँ। जगतरूपी दूध में ब्रह्मरूपी घृत में ही व्याप्त रहा हूँ।

हे राम ! जैसे सुवर्ण में जो नाना प्रकार के भूषण बनते हैं, सो सुवर्ण से भिन्न नहीं होते, वैसे ही सब पदार्थ आत्मा में स्थित हैं-आत्मा से भिन्न नहीं । पर्वत, समुद्र और नदियों में सत्तारूप आत्मा ही है। सब संकल्पों का फलदाता और सब पदार्थों का प्रकाशक आत्मा ही है। वही सब पाने योग्य पदार्थों की परम सीमा है। उस आत्मा की उपासना हम करते हैं, जो घट, पट, तट और कम्ब में स्थित है। जाग्रत जो सुषुप्तिरूप स्थित है और जिसमें कोई फुरना नहीं, ऐसे चैतन्यरू-आत्मा की उपासना हम करते हैं। मधुर में जो मधुरता और तीक्ष्ण में तीक्ष्णता और जाग्रत में चलना शक्ति है; उस चैतन-

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