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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 849, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 849

३८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

देव सदाशिवजी हैं, जिन्होंने अर्द्धाङ्गिनी भगवती को शरीर में धारण किया है और जो महासुन्दर मूर्ति और त्रिनेत्र हैं। उनकी बड़ी-बड़ी जटा हैं और मस्तक पर चन्द्रमा है, जिससे अमृत टपकता है। जटा के चहुँ ओर गङ्गा फिरती है, जैसे फूलों की माला कण्ठ में होती है। काल-कूट के पीने से नीलकण्ठ के विषविभूषण हो गया है। कण्ठ में मुण्ड-माला है और सारे शरीर में भस्म लगी हुई है। दिशा उनके वस्त्र हैं; श्मशान में गृह है। वह महाशान्तरूप विचरते हैं। उनके साथ जो सेना है, उसके महाभयानक आकार हैं। किसी के तो रुद्र की नाईं तीन नेत्र हैं; किसी का तोते की नाईं मुख है; किसी का ऊँट का मुख है; कोई गर्दभमुख है; किसी का बैल का मुख है। कोई जीवों के हृदय में प्रवेश करके रक्तमांस के भोजन करने वाले हैं; कोई पहाड़ में रहते हैं; कितने ही वन, कन्दरा और श्मशान में रहते हैं। उनके साथ देवियाँ भी ऐसी हैं, जिनकी महाभयानक चेष्टा और आचार हैं।

उन देवियों में जो मुख्य देवियाँ हैं उनका जिस जिस दिशा में निवास है, वह सुनो। जया, विजया, जित और अपराजित वामदिशा की ओर तुम्बुरु रुद्र के आश्रित हैं। सिद्धा, सुखदा, रक्तका, और उतला, भैरव रुद्र के आश्रित हैं, सब देवियों के मध्य ये अष्टनायिका और शतसहस्र देवियाँ हैं—रुद्राणी, वैष्णवी, ब्राह्मणी, वाराही, वायवी, कौमारी, वासवी, गौरी इत्यादिक। इनके साथ मिली हुई आकाश में उत्तम देव, किन्नर, गन्धर्व, पुरुष, सुरसंभव स्त्रियाँ इनके साथ हुई हैं। भूचर पृथ्वी में कोटियों हैं और नाना प्रकार के रूप, नाम रखकर पृथ्वी में जीवों को भोजन करती हैं। उनके वाहन, ऊँट, गर्दभ, काक, वानर, तोते इत्यादिक हैं। उन देवियों में कई पशुधर्मिणी हैं, जो क्षुद्रकर्म में रत हैं और कई विदितवेद जीवन्मुक्तपद में स्थित हैं। उनके मध्य नायिका अलम्बुषा देवी हैं। जैसे विष्णु का वाहन गरुड़ है, वैसे ही उस देवी का वाहन काक है। यह देवी अष्टसिद्धि के ऐश्वर्य से युक्त है।

उन देवियों ने एक समय जगत् के पूज्य तुम्बुरु और भैरव की पूजा कर विचार किया कि सदाशिव हमसे प्रेम से नहीं बोलते और हमको

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