योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 850, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें🌸 निर्वाण प्रकरण 🌸 ३६
तुच्छ जानते हैं, इससे हम इनको कुछ अपना प्रभाव दिखावें, क्योंकि प्रभाव दिखाये बिना कोई किसी को नहीं जानता। ऐसे विचार कर उमा को वश करके वे उड़ा ले गईं और उत्साह करके मद्य, मांसादिक भोजन किया। निदान माया के बल से पार्वती को मारकर चावल की नाईं पकाया और उनके कुछ पकाये हुए अंग सदाशिव को भोजन के लिए दिये। तब सदाशिव ने जाना कि मेरी प्यारी पार्वती को इन्होंने मारा है। यह निश्चय करके वह कुपित हुए। तब उन देवियों ने अपने-अपने अङ्ग से उमा के अङ्ग निकाले। सौरी ने नेत्र, कौमारी ने नासा और इसी प्रकार सबने अपने-अपने अङ्ग निकालकर वैसी ही पार्वती की मूर्ति ला दी और नये सिरे से विवाह कर दिया। तब सदाशिव प्रसन्न हुए। सब जगह उत्साह और आनन्द हुआ और सब देवियाँ अपने-अपने स्थानों को गईं। चन्द्र नाम का काक, जो अलम्बुषा देवी का वाहन था, उसने ब्रह्माणी की हंसिनी के साथ क्रीड़ा की और इसीप्रकार सबने क्रीड़ा की जिससे सबको गर्भ रह गया ।
निदान वह हंसिनी ब्रह्माणी के पास गई। ब्रह्माणी ने कहा कि अब तुममें मुझे उठाने की शक्ति नहीं है। तुम गर्भवती हो—जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ जाओ, फिर आना। हे मुनीश्वर ! ऐसे कहकर ब्रह्माणी निर्विकल्प समाधि में स्थित हुई और नाभिसरोवर, जो ब्रह्माणी का उत्पत्तिस्थान है, वहाँ जा स्थित हुई और उस तालाब के कमलपत्र पर उन्होंने निवास किया। जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब उन हंसिनियों ने तीन तीन अण्डे दिये। जैसे बेल से अंकुर उत्पन्न होता है, वैसे ही उनसे इक्कीस अण्डे क्रम से उत्पन्न हुए। कुछ काल उपरान्त जब उनको फोड़ा तो उन अण्डों से हमारे अङ्ग उत्पन्न हुए और क्रमशः जब हम बड़े हो उड़ने योग्य हुए, तब माता हमको ब्रह्माणी के पास ले गई। उनके आगे हमने मस्तक टेका। तब ब्रह्माणी ने, जो कि उसी समय समाधि से उठी थीं, हमको देखकर कृपा करके हमारे सिर पर हाथ रखा। उनके हाथ रखने से हमारी अविद्या नष्ट हो गई और हमारा मन तृप्त और शान्तरूप हो गया और हम जीवन्मुक्त