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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 851, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 851

१० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

पद में स्थित हुए। तब हमको यह वृत्ति स्फुरित हुई कि किसी प्रकार एकान्त में जाकर ध्यान में स्थित हों। देवी ने आज्ञा दी कि अब तुम जाओ। तब देवी की आज्ञा से हम पिता के पास आये। पिता ने हमको गले से लगाया और मस्तक चूमा।

फिर हमने अलम्बुषा देवी की पूजा की। तब पिता ने हमसे कहा, हे पुत्रो! तुम संसाररूपी जाल में तो नहीं फँसे और यदि फँसे हो तो मैं भगवती की प्रार्थना करता हूँ वह भृत्यों पर दयालु है—जैसे तुम चाहोगे वैसे ही तुमको प्राप्त करेगी। तब हमने कहा, हे पिता! हम तो ज्ञात-ज्ञेय हुए हैं; जो कुछ जानने योग्य था, वह जान लिया है और जो पाने योग्य था, वह हमने ब्रह्माणी देवी के प्रसाद से पा लिया है। अब हमको एकान्त स्थान की इच्छा है जहाँ एकान्त हो, वहाँ जा बैठें। तब पिता चन्द्र ने कहा, हे पुत्रो! सुमेरु पर्वत निर्दोष, महापावन, निर्भय और क्षोभरहित सुन्दर स्थान है। वह सब रत्नों की खानि है, सब देवताओं का आश्रयरूप है और सूर्य-चन्द्रमा उसके दीपक हैं, जो चारों ओर फिरते हैं। ब्रह्माण्डरूपी मण्डप का वह खम्भा है और सुवर्ण का है। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र हैं और कण्ठ में तारों की माला है। दशों दिशा उसके वस्त्र हैं। रत्नमणियो के भूषण हैं और वृक्ष और बेल रोमा-वली हैं। उसकी त्रिलोकी में पूजा होती है। वह षोडश सहस्र योजन पाताल में है, जहाँ नाग और दैत्य उसकी पूजा करते हैं। चौरासी सहस्र योजन ऊपर है, जहाँ गन्धर्व, देवता, किन्नर, राक्षस, मनुष्य उसकी पूजा करते हैं। ऐसा पर्वत जम्बूद्वीप के एक स्थान में स्थित है और उसके आश्रय में चतुर्दश प्रकार के भूतजाति रहते हैं। वह बड़ा ऊँचा पर्वत है।

पद्मराग नाम उसका एक शिखर सूर्य जैसा उदय है। शिखर पर एक बड़ा कल्पवृक्ष है, जो मानों जगतरूपी शिखर का प्रतिबिम्ब है। उस कल्पवृक्ष की दक्षिणदिशा की ओर जो डाल है, उसमें महारत्न के गुच्छे, सुवर्ण के पत्ते और चन्द्रमा के बिम्ब जैसे फूल हैं। सघन और रमणीय गुच्छे लगे हैं। वहाँ एक आलय बना हुआ है। वहाँ मैं भी

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