योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
१० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
पद में स्थित हुए। तब हमको यह वृत्ति स्फुरित हुई कि किसी प्रकार एकान्त में जाकर ध्यान में स्थित हों। देवी ने आज्ञा दी कि अब तुम जाओ। तब देवी की आज्ञा से हम पिता के पास आये। पिता ने हमको गले से लगाया और मस्तक चूमा।
फिर हमने अलम्बुषा देवी की पूजा की। तब पिता ने हमसे कहा, हे पुत्रो! तुम संसाररूपी जाल में तो नहीं फँसे और यदि फँसे हो तो मैं भगवती की प्रार्थना करता हूँ वह भृत्यों पर दयालु है—जैसे तुम चाहोगे वैसे ही तुमको प्राप्त करेगी। तब हमने कहा, हे पिता! हम तो ज्ञात-ज्ञेय हुए हैं; जो कुछ जानने योग्य था, वह जान लिया है और जो पाने योग्य था, वह हमने ब्रह्माणी देवी के प्रसाद से पा लिया है। अब हमको एकान्त स्थान की इच्छा है जहाँ एकान्त हो, वहाँ जा बैठें। तब पिता चन्द्र ने कहा, हे पुत्रो! सुमेरु पर्वत निर्दोष, महापावन, निर्भय और क्षोभरहित सुन्दर स्थान है। वह सब रत्नों की खानि है, सब देवताओं का आश्रयरूप है और सूर्य-चन्द्रमा उसके दीपक हैं, जो चारों ओर फिरते हैं। ब्रह्माण्डरूपी मण्डप का वह खम्भा है और सुवर्ण का है। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र हैं और कण्ठ में तारों की माला है। दशों दिशा उसके वस्त्र हैं। रत्नमणियो के भूषण हैं और वृक्ष और बेल रोमा-वली हैं। उसकी त्रिलोकी में पूजा होती है। वह षोडश सहस्र योजन पाताल में है, जहाँ नाग और दैत्य उसकी पूजा करते हैं। चौरासी सहस्र योजन ऊपर है, जहाँ गन्धर्व, देवता, किन्नर, राक्षस, मनुष्य उसकी पूजा करते हैं। ऐसा पर्वत जम्बूद्वीप के एक स्थान में स्थित है और उसके आश्रय में चतुर्दश प्रकार के भूतजाति रहते हैं। वह बड़ा ऊँचा पर्वत है।
पद्मराग नाम उसका एक शिखर सूर्य जैसा उदय है। शिखर पर एक बड़ा कल्पवृक्ष है, जो मानों जगतरूपी शिखर का प्रतिबिम्ब है। उस कल्पवृक्ष की दक्षिणदिशा की ओर जो डाल है, उसमें महारत्न के गुच्छे, सुवर्ण के पत्ते और चन्द्रमा के बिम्ब जैसे फूल हैं। सघन और रमणीय गुच्छे लगे हैं। वहाँ एक आलय बना हुआ है। वहाँ मैं भी
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४१
पहले रह आया हूँ। जब देवीजी समाधि में स्थित हुई थीं, तब मैं वहाँ आलय बनाकर रहा था। चिन्तामणि की उसमें शलाका लगी हैं और वह महारत्नों से बना है। वहाँ जाकर तुम निवास करो। वहाँ और कौओं के बच्चे भी रहते हैं, जिनका हृदय आत्मज्ञान से शान्त है और बाहर से भी वे शान्त हैं। तुमको वहाँ भोग भी हैं और मोक्ष भी है। हे वशिष्ठजी! जब इस प्रकार पिता ने हमसे कहा, तब हम सबने पिता के चरण छुए और पिता ने हमारा मस्तक चूमा। निदान हम विन्ध्याचल पर्वत से उड़े और आकाशमार्ग से मेघ, नक्षत्र-चक्र और लोकान्तर होकर ब्रह्मलोक में पहुँच देवीजी को प्रणाम किया। उन्होंने भली प्रकार हमारे ऊपर कृपादृष्टि की। दया और स्नेहसहित गले लगाया और मस्तक चूमा। हम भी माथा टेककर सुमेरु को चले और सूर्य और चन्द्रमा के लोक और तारागण, लोकपाल और देवताओं के लोक मेघ और पवन के स्थान लाँघकर सुमेरुपर्वत के कल्पवृक्ष पर पहुँचे। हे मुनीश्वर! जिस प्रकार हम उपजे और जिससे ज्ञान प्राप्त हुए हैं और जिस प्रकार यहाँ आकर रहे हैं, वह सब समाचार हमने तुम्हारे आगे सम्पूर्ण कहा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने अस्ताचललाभो नाम षोडशस्सर्गः ॥ १६ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! यह चिरकाल की वार्ता तुमसे कही है। वह सृष्टि इस सृष्टि से बहुत पहले की है, परन्तु मैंने तुमको वर्तमान की नाईं अभ्यास के बल मे सुनाया है। हे मुनीश्वर! मेरा कोई पुण्य था, जो फला है, जिससे तुम्हारा निर्विघ्न दर्शन हुआ और यह आलय, शाखा और वृक्ष आज पवित्र हुए। अब जो कुछ संशय हो तो पूछो, मैं कहूँ। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर उसने मेरा भली प्रकार अर्ध्यपाद्य से आदर सहित पूजन किया। तब मैंने उससे कहा, हे पक्षियों के ईश्वर! तुम्हारे वे भाई कहाँ हैं, जो तुम्हारे समान तत्त्ववेत्ता थे? वे तो देख नहीं पड़ते, अकेले तुम्हीं दीखते हो।
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! यहाँ मुझको बहुत युगों की परम्परा
४२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
व्यतीत हुई है । जैसे सूर्य को कई दिन-रात्रि व्यतीत हो जाते हैं, वैसे ही मुझको युग व्यतीत हुए हैं । कुछ काल में मेरे भाई भी रहे थे, पर समय पाकर उन्होंने शरीर त्याग दिये और तृण की नाईं तनु त्यागकर शिव आत्मपद को प्राप्त हुए । हे मुनीश्वर ! बड़ी आयुवाला हो अथवा सिद्ध महन्त हो, बली हो, अथवा ऐश्वर्यवान् हो, काल सबको ग्रस लेता है । तब फिर मैंने पूछा, हे साधो ! जब प्रलयकाल आता है, तब सूर्य, चन्द्रमा, वायु, मेघ, ये सब अपनी-अपनी मर्यादा त्याग देते हैं और बड़ा क्षोभ होता है । पर उस समय तुमको खेद किस कारण नहीं होता ? सूर्य की तपन से अस्ताचल, उदयाचल आदि पर्वत भस्म हो जाते हैं, पर उस क्षोभ में तुम खेदयुक्त क्यों नहीं होते ?
भुशुण्डिजो बोले, हे मुनीश्वर ! कई जीव जगत् में आधार से रहते हैं और कई निराधार रहते हैं । जिनके सेना आदि ऐश्वर्य के पदार्थ होते हैं, वे आधारसहित हैं और जो इन पदार्थों से रहित हैं, वे निराधार हैं । पर दोनों को हम तुच्छ देखते हैं, सत् कोई नहीं । बड़े-बड़े ऐश्वर्यवान् और बली भी हैं, परन्तु सत्य कोई नहीं । उनमें पक्षी की जाति महातुच्छ है । उनका उजाड़ वन में निवास है और वहीं उनका दाना-पानी है । ये निरालम्ब या बेसहारे हैं और उनकी जीविका दैव ने ऐसे ही बनाई है । हे भगवन् ! मैं तो सदा सुखी हूँ और अपने आप में स्थित, आत्मसन्तोष से तृप्त हूँ । कदापि इस जगत् के क्षोभ से खेद को नहीं प्राप्त होता और स्वभावमात्र में सन्तुष्ट और कष्टचेष्टा से मुक्त हूँ । हे ब्राह्मण ! अब मैं केवल काल को व्यतीत करता हूँ और जगत् के इष्ट-अनिष्ट मुझको विचलित नहीं कर सकते । न मरने की मुझको इच्छा है और न जीने की; क्योंकि जीना और मरना शरीर की अवस्था है, आत्मा की नहीं । मुझे जीने का राग नहीं और मरने में द्वेष नहीं-जैसी अवस्था प्राप्त हो, उसी में सन्तुष्ट हूँ । हे मुनीश्वर ! ऐसे-ऐसे देखे हैं कि वे फिर भस्म हो गये हैं; उनकी अवस्था देखकर मेरे मन की चपलता जाती रही है । मैं इस कल्पवृक्ष पर बैठा हूँ, जिसमें रत्नों की वेलि लगी हैं । इस पर बैठकर मैं प्राण-अपान की गति को
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
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देखता हूँ। इनकी कला की जो सूक्ष्म गति है, उसका मैं ज्ञाता हूँ, और दिन-रात्रि का मुझको कुछ ज्ञान नहीं। सत्बुद्धि से मैं काल को जानता हूँ और सार-असार को भी भली प्रकार जानता हूँ। हे मुनीश्वर ! जो कुछ विस्तार भासित होता है, वह सब झूठ है, सत् कुछ नहीं। इसी कारण मुझे किसी दृश्य पदार्थ की इच्छा नहीं। मैं परम उपशमपद में स्थित हूँ और सब जगत् भी मेरे लिए शान्तरूप है। जो कोई इस जगज्जाल का आश्रय करता है, वह सुखी नहीं होता यह सब जगत् चञ्चल है और स्थिर कदापि नहीं होता। इसकी अवस्था में मैं पत्थर सा अचल हूँ; न किसी का मुझे राग फुरता है और न द्वेष है। न मैं किसी की इच्छा करता हूँ। सब जगत् मुझको तुच्छ भासित होता है। यह सब भूतरूपी नदियाँ कालरूपी समुद्र में जा पड़ती हैं। पर हम किनारे खड़े हैं, इससे कदापि नहीं डूबते, और जितने जीव हैं वे डूब जाते हैं। पर कई एक तुम जैसे उससे निकले हुए हैं। तुम्हारी कृपा से हम भी निर्विकारपद को प्राप्त हुए हैं।
हे मुनीश्वर ! मैं निर्विकार और सब जगत् के क्षोभ से रहित हूँ और आत्मपद को पाकर उपशमरूप हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे दर्शन से मैं अब पूर्ण आनन्द को प्राप्त हुआ। सन्त की संगति चन्द्रमा की चाँदनी सी शीतल और अमृत की नाईं आनन्द को देनेवाली है। ऐसा कौन है, जो सन्त के संग से आनन्द को न प्राप्त हो ? अर्थात् सब आनन्द को प्राप्त होते हैं। हे मुनीश्वर ! सन्त का संग चन्द्रमा के अमृत से भी अधिक है; क्योंकि वह शीतल गौण है, हृदय की तपन नहीं मिटाता और सन्त का संग अन्तःकरण की तपन मिटाता है। वह अमृत क्षीरसमुद्र मंथन के क्षोभ से निकला है और सन्त का संग सहज में सुख से प्राप्त होता है और आत्मानन्द को प्राप्त कराता है-इससे यह परम उत्तम है। मैं तो इससे उत्तम और कोई वस्तु नहीं मानता। सन्त का संग सबसे उत्तम है। सन्त भी वे ही हैं, जिनकी आरंभ में रमणीय सब इच्छाएँ निवृत्त हुई हैं, अर्थात् अविचार से जो दृश्य पदार्थ सुन्दर जान पड़ते हैं और नाशवान् हैं, वे उनको तुच्छ
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प्रतीत होते हैं। वे सदा आत्मानन्द से तृप्त रहते हैं। वे अद्वैतनिष्ठ हैं; उनकी द्वैतकल्पना नहीं रही, वे सदा आत्मानन्द में स्थित हैं। ऐसे पुरुष सन्त कहाते हैं।
उन सन्तों की संगति ऐसी है, जैसे चिन्तामणि होती है; जिसके पाने से सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वर ! त्रिलोकीरूपी कमल के भँवरे और सब ज्ञानवानों से उत्तम तुम्हीं देख पड़े हो। तुम्हारे वचन स्निग्ध, कोमल और आत्मरस से पूर्ण, हृदयगम्य और उचित है। तुम्हारा हृदय महागम्भीर, उदार, धैर्यवान् और सदा आत्मानन्द से तृप्त है; इसलिए तुम सबसे उत्तम मुझको दीखते हो। तुम्हारे दर्शन से मेरे सब दुःख नष्ट हैं और आज मेरा जन्म सफल हुआ है। तुम जैसे सन्तों का संग आत्मपद को प्राप्त कराता है। उससे दुःख और भय नष्ट होते हैं और मनुष्य निर्भय हो जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सन्तमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तदशस्सर्गः ॥ १७ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! तुमने जो पूछा था कि सूर्य, वायु और जल को क्षोभ होता है तो तुमको क्षोभ क्यों नहीं होता, उसका उत्तर सुनो। जब जगत् को क्षोभ होता है, तब भी मेरा यह कल्पवृक्ष स्थिर रहता है, क्षोभ को नहीं प्राप्त होता। हे मुनीश्वर ! यह मेरा वृक्ष सब प्राणियों के लिए अगम्य है। प्राणी नष्ट होते हैं तब भी मैं सुखी रहता हूँ। जब हिरण्याक्ष द्वीपों सहित पृथ्वी को समेटकर पाताल ले गया था, तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। जब देवता और दैत्यों का युद्ध हुआ, तब और सब पर्वत चलायमान हुए, पर मेरा वृक्ष स्थिर रहा। जब क्षीरसमुद्र के मथने के निमित्त विष्णुजी सुमेरु को भुजा से उखाड़ने लगे, तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ, तब वह मन्दराचल को ले गये और उससे क्षीरसमुद्र को मथने लगे। प्रलयकाल के पवन और मेघ को क्षोभ हुआ तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। फिर एक दैत्य आकार सुमेरु को उखाड़ने लगा और उसने कुछ उखाड़ा भी, परन्तु मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। हे
* निर्वाण प्रकरण * [४५]
मुनीश्वर ! जब बड़े-बड़े उपद्रव हुए और प्रलयकाल के मेघ पवन और सूर्य तपे, तब भी मेरा वृक्ष स्थिर रहा है ।
इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! फिर मैंने उससे पूछा कि हे साधो ! जब प्रलयकाल के वायु और मेघ क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब तुम विगतज्वर कैसे रहते हो ? भुशुण्डिजी ने कहा, हे साधो ! जब प्रलयकाल के वायु, मेघादिक क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब मैं कृतघ्न की नाईं अपने आलय को त्यागकर सब क्षोभ से रहित आकाश में स्थित होता हूँ और सब अंगों को समेट लेता हूँ । जैसे वासना को रोकने से मन सकुच जाता है, वैसे ही मैं भी अङ्ग को समेट लेता हूँ। हे मुनीश्वर ! जब प्रलयकाल का सूर्य तपता है, तब मैं जल की धारणा से जलरूप हो जाता हूँ। जब वायु चलता है, तब पर्वत की धारणा बाँधकर स्थित हो जाता हूँ । जब बहुत तत्त्वों का क्षोभ होता है, तब सबको त्यागकर ब्रह्माण्ड के पार जो निर्मल परमपद है, वहाँ मैं सुषुप्ति सा अचल गम्भीर हो जाता हूँ । जब ब्रह्मा उपजकर फिर सृष्टि रचते हैं, तब मैं सुमेरु के वृक्ष पर इसी आलय में स्थित होता हूँ । फिर मैंने पूछा, हे पक्षियों के ईश्वर ! जैसे तुम अखण्ड स्थित होते हो, वैसे ही और योगीश्वर क्यों नहीं स्थित होते ? भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! परमात्मा की यह नीति किसी से नाँघी नहीं जाती । उन योगीश्वरों की नीति इसी प्रकार बनाई गई है और मेरी उत्पत्ति इसी प्रकार है । ईश्वर की नीति अतुल है । उसकी तुलना किसी से नहीं की जाती । जहाँ जैसी नीति बनी है वहाँ वैसी ही है; अन्यथा किसी से नहीं होती । मुझको इसी प्रकार है कि कल्प-कल्प में इसी पर्वत के वृक्ष पर मेरा आलय होता है और मैं आकर निवास करता हूँ ।
वशिष्ठजी बोले, हे पक्षियों के नायक ! तुम्हारी अत्यन्त दीर्घ आयु है । तुम ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न योगेश्वर हो । तुमने अनेक आश्चर्य देखे हैं । उनमें जो स्मरण हों, उन्हें कहो । भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! ऐसा याद आता है कि एक बार पृथ्वी पर तृण और वृक्ष ही थे और कुछ न था । फिर एक बार एकादश सहस्र वर्ष पर्यन्त भस्म ही भस्म
४६ ⁂ योगवाशिष्ठ ⁂
देख पड़ती थी । जो वृक्ष और तृण थे, सब जल गये थे, एक बार ऐसी सृष्टि हुई कि उसमें चन्द्र और सूर्य न उपजे और दिन और रात्रि की गति कुछ जानी न जाती थी । पर कुछ सुमेरु के रत्नों का प्रकाश होता था । एक कल्प ऐसा हुआ है कि जिसमें देवताओं और दैत्यों का युद्ध हुआ था । जब दैत्यों की जीत हुई तो उन्होंने सब देवताओं को मनुष्यों की भाँति मार डाला । ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, इन तीनों देवताओं के सिवा और सब सृष्टि उन्होंने जीती और बीस युग पर्यन्त उन्हीं की आज्ञा चली । एक बार ऐसा स्मरण आता है कि दो युग पर्यन्त पृथ्वी पर वृक्ष ही वृक्ष थे, और कुछ सृष्टि न थी । एक बार दो युग पर्यन्त पृथ्वी पर पर्वत ही पर्वत सघन हो रहे थे, और कुछ न था । एक बार ऐसा हुआ कि सब जल ही जल हो गया, और कुछ न देख पड़ता था, केवल सुमेरु पर्वत खंभे की नांई खड़ा था । एक बार अगस्त्य मुनि दक्षिण दिशा से आये । तब विन्ध्याचल पर्वत बढ़ा और उसने सब ब्रह्माण्ड चूर्ण कर दिया ।
हे मुनीश्वर ! बहुत कुछ स्मरण है, परन्तु संक्षेप में सुनो । एक समय सृष्टि में मनुष्य, देवतादिक कुछ न दीखते थे । एक बार ऐसी सृष्टि हुई कि ब्राह्मण मद्यपान करते थे, शूद्र बड़े हो बैठे थे और सब जीवों के धर्म उलट-पलट गये थे । एक बार ऐसी सृष्टि स्मरण आती है कि पृथ्वी में कोई पर्वत न देख पड़ता था । एक बार ऐसी सृष्टि उत्पन्न हुई कि सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, लोकपाल आदि कोई न उपजा । एक सृष्टि ऐसी हुई कि सबी उपजे । एक सृष्टि ऐसी हुई कि उसमें स्वामि-कार्तिक नहीं उपजे, दैत्य बढ़ गये और दैत्यों ही का राज्य हो गया । मुझको बहुत स्मरण है, कहाँ तक कहूँ । सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, इन्द्र, उपेन्द्र और लोकपालों के बहुत जन्म मुझको स्मरण हैं । जब हिरण्याक्ष को, जो वेदों को चुरा ले आया था, हरि ने मारा था वह भी स्मरण है और क्षीरसमुद्र मथना भी स्मरण है । ऐसी सृष्टि भी देखी है, जिसमें विष्णुजी का वाहन गरुड़ नहीं हुआ । ब्रह्माजी हंस वाहन के बिना और रुद्र बैल वाहन के बिना हुए हैं ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २७
इसी प्रकार बहुत कुछ देखा है, क्या क्या तुम्हारे आगे वर्णन करूँ । इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने जीवित- वृत्तान्तवर्णनं नामाष्टादशस्सर्गः ॥ १८ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! जब फिर सृष्टि उत्पन्न हुई, तब तुम भरद्वाज, पुलस्त्य, नारद, इन्द्र, मरीचि, उद्दालक, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा, सनत्कुमार, भार्गवेश आदि उपजे । फिर सुमेरु, मन्दराचल, कैलास, हिमालय आदि पर्वत उपजे । अत्रि, वासुदेव, बाल्मीकि इत्यादि तो अल्पकाल के उपजे हैं । हे मुनीश्वर ! तुम ब्रह्मा के पुत्र हो और तुम्हारे आठ जन्म मुझको स्मरण हैं । कभी तुम आकाश से उपजे हो, कभी जल से उपजे, कभी पहाड़ से उपजे, कभी पवन से उपजे और कभी अग्नि से उपजे हो । हे मुनीश्वर ! मन्दराचल पर्वत को क्षीरसमुद्र में डालकर जब देवता और दैत्य मथने लगे और उन्हें क्षोभ हुआ कि मन्दराचल नीचे चला जाता है, तब विष्णुजी ने कच्छपरूप धारणकर पर्वत को रोका और सागर से अमृत निकाला था, यह घटना मुझको द्वादश बार स्मरण आती है । तीन बार हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल में समेट ले गया है और छः बार परशुराम रेणुका माता के पुत्र हुए हैं । यह सृष्टि के बहुत पीछे हुए हैं । जब क्षत्रियों में दैत्य उपजने लगे तो उनके नाश निमित्त विष्णु ने परशुराम का अवतार लिया था ।
हे मुनीश्वर ! एक सृष्टि ऐसी हुई है, जिसमें शास्त्र और पुराणों के अर्थ पहले के विपरीत उलटे लगाये जाने लगे । एक कल्प में शास्त्र के और ही पाठ, और ही युक्ति, और ही अर्थ हुए; क्योंकि युग युग प्रति और ही पुराण होते हैं । किसी को देवता बनाते हैं और किसी को ऋषीश्वर-मुनीश्वर कहते हैं । कथा और इतिहास भी मुझे बहुत स्मरण हैं । बाल्मीकिजी ने द्वादश बार रामायण बनाई और विलय हो गई । व्यासजी ने दो बार महाभारत बनाई और उन्होंने सात बार अवतार लिया है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार आख्यान, कथा, इतिहास और शास्त्र जो जो हुए हैं, वे सब मुझको अच्छी तरह स्मरण हैं । हे साधो ! दैत्यों के मारने के निमित्त विष्णुजी युग युग प्रति
४८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
अवतार लेते हैं। मुझको एकादश बार रामजी स्मरण आते हैं। वसुदेव के गृह में पृथ्वी का भार उतारने के निमित्त कृष्णजी ने सोलह बार अवतार लिया है, सो भी मुझको स्मरण है। तीन बार नरसिंह अवतार धारण कर विष्णु ने हिरण्यकशिपु को मारा है। हे मुनीश्वर ! इसी प्रकार मुझको अनेक सृष्टि स्मरण हैं, परन्तु सभी भ्रममात्र हैं, कोई उपजी नहीं। जब आत्मतत्त्व में देखता हूँ, तब कोई सृष्टि नहीं भासती, सब सत्तामात्र है। जैसे जल में बुलबुले उपजकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही आत्मा में मन के फुरने से अनेक सृष्टि उपजती हैं और लीन हो जाती हैं। उस स्फुरण से मैंने कई सृष्टि देखी हैं। कोई सदृश ही उपजती हैं, कोई अर्धसदृश और कोई विपर्ययरूप हैं। हे मुनीश्वर ! किसी-किसी सृष्टि में एक से ही आकार और कर्म-आचार होते हैं। मन्वन्तर मन्वन्तर प्रति कोई और ही सृष्टि होती है। किसी में ऐसा होता है कि पुत्र पिता हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाता है, बान्धव अबान्धव और अबान्धव बान्धव हो जाते हैं। इस प्रकार भी विपर्यय होते देख पड़े हैं। कभी इसी कल्पवृक्ष पर मेरा घर होता है, कभी मन्दराचल में, कभी हिमालय पर्वत में, और कभी मालव पर्वत में होता है। इसी प्रकार कभी वन, वृक्ष और बेलों पर होता है और कभी इस कल्पवृक्ष के ऊपर होता है। पर अब तो बहुत काल से इसी कल्प-वृक्ष पर रहता हूँ।
जब सृष्टि का नाश हो जाता है, तब भी मेरा यही शरीर रहता है। मैं आसन लगाकर अपने पुर्यष्टक को ब्रह्मसत्ता में स्थित करता हूँ, इसी कारण मुझको फिर यही शरीर प्राप्त होता है। हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् संकल्पमात्र है। जैसा संकल्प फुरता है, वैसा ही आगे भासित होता है। यह जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं, केवल भ्रमरूप है। इस भ्रममय जगत्-प्रपंच में अनेक आश्चर्य देखे जाते हैं; पिता पुत्र हो जाता है, मित्र शत्रु हो जाता है, स्त्री पुरुष हो जाती है और पुरुष स्त्री हो जाता है। कभी कलियुग में सतयुग और कभी सतयुग में कलियुग वर्तने लगता है, कभी द्वापर में त्रेता और त्रेता में द्वापर
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
वर्तता है। कभी वेद विद्या के अर्थ अदृश्य ही होते हैं और नाना प्रकार के आश्चर्य भासित होते हैं। हे मुनीश्वर ! जब इन युगों की एक सहस्र चौकड़ी व्यतीत होती है, तब ब्रह्माजी का एक दिन होता है। एक बार दो दिन तक ब्रह्मा समाधिस्थ रहे और सृष्टि शून्य हो रही—यह भी स्मरण है। और भी कई देश क्रिया आदि विचित्र रूप स्मरण आते हैं; क्या-क्या कहूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चिरातीतवर्णनन्नामैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ १९ ॥
बशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार जब भुशुण्डिजी ने कहा, तब मैंने फिर जिज्ञासा से पूछा कि हे पक्षियों के ईश्वर ! तुम तो चिरकाल पर्यन्त जगत् में व्यवहार करते रहे हो, तो तुम्हारे शरीर को मृत्यु ने किस कारण नहीं नष्ट किया ? भुशुण्डि बोले, हे मुनीश्वर ! तुम सब जानते हो, परन्तु ब्रह्मजिज्ञासा के कारण पूछते हो। इसलिए जैसे विद्यार्थी वेदार्थ पढ़कर फिर गुरु के आगे दोहराते हैं, वैसे ही मैं आज्ञा मानकर कहता हूँ। हे मुनीश्वर ! मृत्यु किसको मारती है और किसको नहीं मारती, सो सुनो। दुःखरूपी मोती वासनारूपी सूत से पिरोये हैं। यह माला जिसके हृदयरूपी गले में पड़ी हुई है उसको मृत्यु मारती है। जिसके कण्ठ में यह माला नहीं पड़ी, उसकी मृत्यु नहीं मारती। शरीररूपी वृक्ष में चित्तरूपी सर्प बैठा है। आशारूपी अग्नि जिस वृक्ष को नहीं जलाती, वह मृत्यु के वश नहीं होता। जिसका रागद्वेषरूपी विष से पूर्ण चित्तरूपी सर्प तृष्णा से चूर्ण होता है और लोभरूपी व्याधि से नष्ट होता है, उसी को मृत्यु मारती है और ग्रस लेती है। जिसको इनका दुःख नहीं स्पर्श करता, उसको मृत्यु भी नहीं नष्ट करती। हे मुनीश्वर ! शरीररूपी समुद्र क्रोधरूपी बड़वाग्नि से जलता है। जिसको क्रोधरूपी अग्नि नहीं जलाती, उसको मृत्यु भी नहीं मारती। जिसका मन परम पावन और निर्मल पद में दृढ़ विश्रान्त और स्थित हुआ है, उसका नाश मृत्यु नहीं करती। हे मुनीश्वर ! जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, तृष्णा, चिन्ता,
५० ❇ योगवाशिष्ठ ❇
चञ्चलता, अभिमान, प्रमाद इत्यादि दुःख होते हैं, उसको मृत्यु मारती है और जिसको संसारबन्धन का कारण काम, क्रोध, लोभादिक रोग बाँध नहीं सकते और जो इनसे लिप्त नहीं होता, उसको आधि-व्याधि-रूपी मल नहीं स्पर्श करता ।
जो मनुष्य लेता है, देता है और सब कार्य करता है, पर जिसके चित्त को अनात्म अभिमान स्पर्श नहीं करता, उसको समाहितचित्त कहते हैं । जो पुरुष इष्ट की कामना नहीं करता और अनिष्ट में दुःखी नहीं होता, दोनों अवस्थाओं में सम रहता है, उसको समाहितचित्त कहते हैं । हे मुनीश्वर ! जो कुछ ऐश्वर्यसूचक सुन्दर पदार्थ हैं, वे सब असत्-रूप हैं । पृथ्वी पर चक्रवर्ती राजा और स्वर्ग में गन्धर्व, विद्याधर, किन्नर, देवता और उनकी स्त्रियाँ और सुरों की सेना आदि सब नाशवान् हैं । मनुष्य, दैत्य, देवता, असुर, पहाड़, सरोवर, नदियाँ जो कुछ बड़े पदार्थ हैं, वे सभी नाशवान् हैं । स्वर्ग, पृथ्वी और पाताललोक में जो कुछ भोग हैं, वे सब असत् और अशुभ हैं । कोई पदार्थ श्रेष्ठ नहीं । न पृथ्वी का राज्य श्रेष्ठ है, न देवताओं का रूप श्रेष्ठ है, न नागों का पाताललोक श्रेष्ठ है, न शास्त्रों का पठन-मनन श्रेष्ठ है, न काव्य का जानना श्रेष्ठ है, न पुरातन कथाक्रम वर्णन करना श्रेष्ठ है, न बहुत जीना श्रेष्ठ है, न मूढ़ता से मर जाना श्रेष्ठ है, न नरक में पड़ना श्रेष्ठ है और न इस त्रिलोकी में और कोई पदार्थ श्रेष्ठ है; जहाँ सन्त का मन स्थित है, वही श्रेष्ठ है । यह नाना प्रकार का जगत्क्रम चल है । जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे मूढ़ होकर चल पदार्थ में नहीं मरते और बहुत जीने की इच्छा भी नहीं करते ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डोपाख्याने सङ्कल्पनिराकरणनाम विशतितमस्सर्गः ॥ २० ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! केवल एक आत्मदृष्टि सबसे श्रेष्ठ है; जिसे पाने से सब दुःख नष्ट होते हैं और परमपद प्राप्त होता है । वह आत्मचिन्तन सब दुःखों का नाशक है । वह चिरकाल के तीनों तापों से तपे और जन्म-मरण के मार्ग में चलने से थके हुए जीवों के
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५१
श्रम को दूर करता और तपन मिटाता है। अनर्थकारिणी समस्त दुःखों की खानि अविद्या को यह आत्मचिन्तन नष्ट करता है। जैसे अन्धकार को प्रकाश नष्ट करता है, वैसे ही यह जीव के हृदय में शीतल प्रकाश उपजाता है। हे भगवन्! सब संकल्पों से रहित ऐसा आत्मचिन्तन है। तुम जैसों को सुगम है और हम जैसों को कठिन है; क्योंकि वह समस्त कल्पना से अतीत है। हे मुनीश्वर! उस आत्मचिन्तन की ओर भी कोई सखी यदि प्राप्त हो तो सब ताप मिट जायँ और परम शान्ति प्राप्त हो। उनमें से मुझको एक सखी प्राप्त हुई है। वह सब दुःखों को नाश करती है, सब सौभाग्य देनेवाली और जीने का मूल है। उसका नाम प्राणचिन्तन है। हे राम! जब काकभुशुण्डि ने इस प्रकार मुझसे कहा, तब मैंने जानकर भी क्रीड़ा के निमित्त फिर उनसे पूछा कि हे सब संशयों को निवृत्त करनेवाले, चिरंजीवी पुरुष! सच कहो, प्राण-चिन्ता किसे कहते हैं?
भुशुण्डिजी बोले, हे सब वेदान्त के ज्ञाता और सब संशयों को मिटानेवाले! मेरे उपहास के निमित्त तुम मुझसे यह पूछते हो। तुम तो सब कुछ जानते हो। तथापि मैं तुमसे शिष्य की भाँति कहता हूँ, क्योंकि गुरु के आगे कहना भी कल्याण के निमित्त है। मेरे चिर-जीवन का कारण और मुझको आत्मलाभ देनेवाली प्राणचिन्ता ही है। हे भगवन्! इसी दृष्टि का आश्रय लेकर मैं परमपद को प्राप्त हुआ हूँ। मुझको बन्धन नहीं होता। सब अवस्थाओं में, बैठते, चलते, जागते, सोते सब ठौर, मेरा चित्त सावधान रहता है, इस कारण मुझे कोई बन्धन नहीं होता। हे मुनीश्वर! मैंने प्राण और अपान के संसरण की गति पाई है; उस युक्ति से मुझको आत्मबोध हुआ है और उस बोध से मेरे मद, मोहादिक सब विकार नष्ट हो गये हैं और मैं शान्त-रूप होकर स्थित हुआ हूँ। हे मुनीश्वर! जिसको प्राण-अपान की गति प्राप्त हुई है वह चाहे सब आरब्ध कर्म करे अथवा सबका आरम्भ त्याग करे, परन्तु सदा शान्तरूप रहता है; उसका काल सुख से व्यतीत होता है।
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<div align="center">☸ योगवाशिष्ठ ☸</div>हे मुनीश्वर ! अब प्राण-अपान का संस्मरण कहता हूँ, सुनो। प्राण हृदय से उपजकर द्वादश अंगुल पर्यन्त बाहर जाता है और वहाँ जाकर स्थित होता है; फिर उस स्थान से अपानरूप हो हृदय में आकर स्थित होता है। हे मुनीश्वर ! बाहर आकाश के सम्मुख जो प्राण जाता है, वह अग्नि-सा उष्ण होता है और जो हृदयाकाश के सम्मुख आता है, वह शीतल नदी के प्रवाह-सा आती है। अपान चन्द्रमारूप है और बाहर से भीतर आता है और जो प्राण भीतर से बाहर जाता है, वह अग्नि, उष्ण और सूर्यरूप है। प्राणवायु हृदयाकाश को तपाता है और अन्न को पचाता है और अपान हृदय को चन्द्रमा की तरह शीतल करता है। हे मुनीश्वर ! अपानरूपी चन्द्रमा जब प्राणरूपी सूर्य में जहाँ तत्त्व है, लीन होता है तो उसमें स्थित हुआ मन फिर शोक को नहीं प्राप्त होता। और प्राणरूपी सूर्य जब अपानरूपी चन्द्रमा के घर में लीन होता है, उस अवस्था में स्थित हुआ मन फिर जन्म का भागी नहीं होता।
हे मुनीश्वर ! सूर्यरूपी प्राण अपने सूर्यभाव को त्यागकर अपान-रूपी चन्द्रमा को जब तक नहीं प्राप्त हुआ, उस अवस्था के देशकाल को विचारे तो फिर शोक नहीं पाता और सब भ्रम नष्ट हो जाते हैं। द्वादश अंगुल पर्यन्त जो आकाश है, उससे अपानरूपी चन्द्रमा उपज-कर हृदय के प्राणरूपी सूर्य में लीन होता है। पर सूर्यभाव को जब तक नहीं प्राप्त होता उस मध्यभाव की अवस्था में जिसका मन लगा है, वह परमपद को प्राप्त होता है। हृदय में चन्द्रमा और सूर्य के अस्त और उदय होने का ज्ञाता और इसका आधारभूत जो आत्मा है, उसको जानकर फिर मन नहीं उपजता। हे मुनीश्वर ! प्राण और अपानरूपी जो सूर्य और चन्द्रमा हृदयाकाश में उदय और अस्त होते हैं, उनके प्रकाश से हृदय में जो भास्कर देव है उसको जो देखता है, वही यथार्थ में देखता है। बाहर सूर्य कभी प्रकाश और कभी अंधकार करता है। उस प्रकाश के उदय और तम के क्षीण होने से कुछ सिद्ध नहीं होता। जब हृदय का तम दूर होता है, तभी परमसिद्धता प्राप्त होती है। बाहर
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५३
का तम नष्ट होने से लोकों में प्रकाश होता है और हृदय का तम नष्ट होने से आत्मप्रकाश का उदय और अज्ञान-अन्धकार का अभाव होता है, उसी प्रकाश में परमपद को जानकर जीव मुक्त होता है। प्राणअपान की युक्ति जानने से तम नष्ट हो जाता है।
हे मुनीश्वर ! प्राण अपानरूपी जो चन्द्रमा और सूर्य हैं, वे यत्न बिना उदय और अस्त होते हैं। जब प्राणरूपी सूर्य हृदयकोट से उपज कर बाहर जाता है तब उसी क्षण अपानरूपी चन्द्रमा में लीन होता है और अपानरूपी चन्द्रमा उदय हो आता है। और जब अपानरूपी चन्द्रमा हृदयकोट के प्राणवायूरूपी सूर्य में स्थित होता है, तब उसी क्षण में प्राणरूपी सूर्य उदय होता है। प्राण के अस्त होने पर अपान का उदय होता है और अपान के अस्त होने पर प्राण का उदय होता है। जैसे छाया के अस्त होने पर धूप निकलती है और धूप के अस्त होने पर छाया प्रकट होती है, वैसे ही प्राण-अपान की गति है। हे मुनीश्वर ! जब हृदयकोट से प्राण का उदय होता है, तब प्राण का रेचक और अपान का पूरक होने लगता है, और जब प्राण अपान में स्थित होता है, तब अपान का कुम्भक होता है, उस कुम्भक में जब स्थित होती है, तब फिर तीनों ताप नहीं तपाते। जब अपान का रेचक होता है, तब प्राण का पूरक होने लगता है और जब अपान जाकर स्थित होता है, तब प्राण का कुम्भक होता है। उसमें जब मन स्थित होता है, तब भी तीन तापों से तप्त नहीं होता। हे मुनीश्वर ! प्राण-अपान के भीतर जो शान्तरूप आत्मतत्त्व है उसमें जब स्थिति होती है, तब मन तप्त नहीं होता। जब अपान आकर स्थित होता है और प्राण का उदय नहीं हुआ होता उस अवस्था में जो साक्षीभूत सत्ता है, वह आत्मतत्त्व है। उसमें जब स्थिति होती है, तब फिर वह साधना कठिन नहीं होती। जब अपान के स्थान में प्राण जाकर स्थित होता है, और अपान जब तक उदय नहीं हुआ होता, वहाँ जो देश, काल, अवस्था है उसमें जब मन स्थित होता है, तब मन का मनत्व जाता रहता है और फिर नहीं उपजता । हे मुनीश्वर ! प्राण जब अपान में स्थित हुआ होता है
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और अपान का उदय नहीं हुआ होता, वह कुम्भक है। अपान जब प्राण में स्थित हुआ और प्राण का जब उदय नहीं हुआ, उस कुम्भक में जो शान्त तत्त्व है, वह आत्मा का स्वरूप, शुद्ध और परम चैतन्य है। जो उसको प्राप्त होता है वह फिर शोकयुक्त नहीं होता। जैसे पुष्प में गन्ध से प्रयोजन होता है वैसे ही प्राण-अपान के भीतर जो अनुभव-तत्त्व स्थित है, उससे प्रयोजन है। वह न प्राण है, न अपान, उस अनुभवस्वरूप आत्मतत्त्व की हम उपासना करते हैं। प्राण अपानकोट में क्षय को प्राप्त होता है और अपान प्राणकोट में क्षय को प्राप्त होता है; उस प्राण-अपान के मध्य में जो चिदात्मा है, उसकी हम उपासना करते हैं।
हे मुनीश्वर ! जो प्राण का प्राण, अपान का अपान, जीव का जीव और देह का आधारभूत है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जिसमें सर्व है, जिससे यह सर्व है और जो यह सर्व है, ऐसा जो चिदात्मा है उसकी हम उपासना करते हैं। जो सब प्रकाशों का प्रकाश है, सब पावनों का पावन है और सब भाव-अभाव पदार्थों का अपना आप है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जो पवन परस्पर हृदय में संपुटरूप है, उसमें स्थित जो साक्षीरूप और भीतर बाहर सब जगह है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जब अपान अस्त हुआ और प्राण नहीं उपजा, उस क्षण में जो कलंक से रहित है, उस चैतन्यतत्त्व की हम उपासना करते हैं। जब प्राण अस्त हुआ और अपान नहीं उपजा, ऐसा जो नासिका के अग्र भाग में शुद्ध आकाश है और उसमें जो सत्यता है, उस चित्तसत्ता की हम उपासना करते हैं। जो प्राण-अपान की उत्पत्ति का स्थान, भीतर बाहर सब ओर व्याप्त और सब योगकला का आधारभूत है, उस चित्ततत्त्व की हम उपासना करते हैं। जो प्राण-अपान के रथ पर आरूढ़ है और शक्ति का शक्तिरूप है; उस चित्ततत्त्व की हम उपासना करते हैं। हे मुनीश्वर ! जो सम्पूर्ण कला-कलंक से रहित है और सब कला जिसके आश्रय में हैं, ऐसा जो अनुभवतत्त्व है, और सब देवता जिसकी
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५५
शरण को प्राप्त होते हैं, उस आत्मतत्त्व की हम उपासना करते हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने समाधिवर्णनं नाम एकविंशतितमसर्गः ॥ २१ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! इस प्रकार मैंने प्राणसमाधि प्राप्त की है और इस क्रम से मैं आत्मपद को पहुँचा हूँ। इसी निर्मल दृष्टि का आश्रय लेकर स्थित हूँ और एक पल भी इससे चलायमान नहीं होता। सुमेरु पर्वत की भाँति स्थित हूँ और चलता हुआ भी स्थिर हूँ। जाग्रत् में सुषुप्ति स्वप्न में स्थित हूँ और सर्वदा आत्मसमाधि में लगा रहता हूँ; विक्षेप कभी नहीं होता। हे मुनीश्वर ! नित्य-अनित्य भाव से जो जगत् स्थित है, उसको त्यागकर मैं अन्तर्मुख अपने आपमें स्थित हूँ। प्राण-अपान की कला जो तुम्हारे सामने कही है, उसका सदा ऐसे ही प्रवाह चला जाता है; उसमें मेरी अचल समाधि है, इसमें मैं सदा सुखी रहता हूँ, कुछ कष्ट नहीं होता। जिसको यह कला नहीं प्राप्त हुई, वही कष्ट पाता है। हे मुनीश्वर ! अज्ञानी जीव महाप्रलय-पर्यन्त संसार-समुद्र में गोते खाते हैं। उभर कर फिर डूबते हैं और इसी प्रकार गोते खाते रहते हैं। जिन पुरुषों ने पुरुषार्थ करके आत्मपद पाया है, वे सुख से विचरते हैं। हे मुनीश्वर ! भूतकाल की मुझको चिन्ता नहीं और भविष्य की इच्छा नहीं; वर्तमान में यथाप्राप्त राग-द्वेष से रहित होकर विचरता हूँ। मैं सुषुप्त की तरह स्थित हूँ, इससे केवल 'स्वरूप' में भाव-अभाव पदार्थों से रहित हूँ और इसी कारण चिरंजीवी हो दुःख से रहित हूँ। प्राण-अपान की कला को शान्त करके स्वरूप में स्थित हूँ। आज यह कुछ पाया है और कल यह पाऊँगा; यह चिन्ता मेरी दूर हो गई है, इसी कारण दुःखरहित होकर जीता हूँ। न किसी की प्रशंसा करता हूँ और न किसी की निन्दा करता हूँ; सब आत्मस्वरूप देखता हूँ, इसी कारण सुखी जीता हूँ। मुझे इष्ट की प्राप्ति में हर्ष और अनिष्ट प्राप्ति में शोक नहीं होता। मैंने परम त्याग किया है, सर्वत्र आत्मभाव देखता हूँ और मेरा जीवभाव दूर हो गया है, इसी कारण दुःखरहित जीता हूँ। हे मुनीश्वर ! मेरे मन की चपलता मिट
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गई है और राग-द्वेष दूर हो गये हैं, मन शान्त हुआ है। इस कारण अरोग जीता हूँ। मैं काष्ठ, सुन्दर स्त्री, पहाड़, तृण, अग्नि और सुवर्ण को सम देखता हूँ।
हे मुनीश्वर ! मैं जरामरण के दुःख और राजलाभ के सुख और शोक से रहित समभाव में स्थित हूँ और दुःखरहित जीता हूँ। ये मेरे बांधव हैं, ये अन्य हैं, यह मैं हूँ, यह मेरा है, यह सब कलना मुझको नहीं, इसी से सुखी जीता हूँ। आहार-व्यवहार करता, बैठता, चलता, सूँघता, स्पर्श करता और श्वास लेता हूँ; परन्तु यह जो अभिमान है कि मैं 'देह हूँ,' इस अभिमान से रहित हो सुखी जीता हूँ। इस संसार की ओर से मैं सुषुप्तरूप हूँ और इस संसार की गति को देखकर हँसता हूँ कि वास्तव में यह है ही नहीं। इस कारण शान्ति से जीता हूँ। हे मुनीश्वर ! मैं सब कालों में सब प्रकार, सभी पदार्थों में समबुद्धि हूँ; विषमता मुझको नहीं भासित होती । न किसी से सुखी होता हूँ और न दुखी। जैसे हाथ फैलाइये तो भी शरीर है और सिकोड़िए तो भी शरीर है, इसी प्रकार मैंने सर्वात्मा आपको जाना है । इसी से मुझको कोई दुःख नहीं । मेरी बोली और निश्चय स्निग्ध, कोमल और सबको हृदयगम्य है । सर्वत्र इसी दृष्टि के कारण मैं दुःखरहित जीता हूँ । चरण से मस्तक पर्यन्त देह में मुझको ममता नहीं है । अहंकाररूपी कीच से मैं निकल गया हूँ, इस कारण अरोग जीता हूँ। मैं कार्यकर्त्ता और भोजनकर्त्ता भी देख पड़ता हूँ, परन्तु मेरे मन में दृढ़ निष्कर्मता है।
हे मुनीश्वर ! सामर्थ्य करके कार्य करूँ तो भी मुझको अभिमान नहीं और दरिद्री होऊँ तो भी संपत्ति और सुख की इच्छा नहीं; अर्थात् किमी में आसक्त नहीं होता। इस असतरूप शरीर का नाश होने पर भी अभिमान नष्ट नहीं होता। भूतों का समूह सब असतरूप है, केवल आत्मा सतरूप है, ऐसा जानकर मैं स्थित हूँ। आशारूपी फाँसी से मेरे मुक्तचित्त की वृत्ति समाहित हुई है । मुझे अनात्म में आत्माभिमान की वृत्ति नहीं फुरती ।
हे मुनीश्वर ! मैंने जगत् को असत्य जाना है और आत्मा को
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५७
सत्य और हाथ में रखे बिल्वफल सा प्रत्यक्ष जाना है। इस जगत् में मैं सुसुप्त, प्रबुद्ध हूँ। सुख पाकर मैं सुखी नहीं होता और दुःख पाकर दुःखी नहीं होता। सबका परममित्र हूँ, इसी कारण मैं दुःखरहित जीता हूँ। आपदा में अचलचित्त हूँ; संपदा में सब जगत् का मित्र हूँ और भाव-अभाव से ज्यों का त्यों हूँ; इस कारण सदा सुखी जीता हूँ। न मैं परिच्छिन्न अहं हूँ; न मेरी दृष्टि में कोई अन्य है; न कोई मेरा है और न मैं किसी का हूँ; यह भावना मेरे चित्त में दृढ़ है। मैं जगत् हूँ; मैं ही आकाश, देश, काल, क्रिया, सब हूँ; मुझे यह दृढ़ निश्चय है। घट भी चैतन्य है, पट भी चैतन्य है, रथ भी चैतन्य है और यह सब प्रपंच चैतन्य तत्त्व है; यह मुझको दृढ़ निश्चय है, इसी कारण दुःख-रहित जीता हूँ। हे मुनिशार्दूल ! यह सब जो मैंने तुमसे कहा, सो भुशुण्डि नाम काक ने, जो त्रिलोकीरूपी कमल का भँवरा है, मुझसे कहा था।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने चिरञ्जीविहेतुकथनं नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! जैसा मैं हूँ, सो तुम्हारी आज्ञा का पालन करने के लिए कहा है; नहीं तो गुरु के आगे कहना भी ढिठाई है। तुम ज्ञान के पारगामी हो। फिर मैं बोला, हे भगवन् ! आश्चर्य है और आश्चर्य से भी आश्चर्य है कि तुमने श्रवण का भूषण इस कथा को कहा। आत्मउदितरूप जो वचन तुमने कहे, वे परम विस्मय-जनक हैं। हे भगवन् ! तुम धन्य हो। तुम महात्मा पुरुष हो और चिरंजीवियों में तुम मुझको साक्षात् दूसरे ब्रह्मा जान पड़ते हो। आज मैं भी धन्य हूँ कि तुम जैसे महापुरुष के मुख से इस प्रकार आत्मतत्त्व सुना। जैसे मैंने पूछा, वैसे ही तुमने कहा। हे साधो ! मैंने सब भूतल के लोक, दिशाएँ, आकाश और पाताल के लोक भी देखे हैं; त्रिलोकी में तुम सा कोई बिरला ही होगा। जैसे बाँस बहुत हैं, पर मोती उपजानेवाला बिरला ही होता है, वैसे ही तुम जैसे बिरले हैं। हे साधो ! आज मैं पुण्यरूप हुआ, आज मेरी देह पवित्र हुई, जो तुम जैसे मुक्त आत्मा
५८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
का दर्शन हुआ। हे साधो! अब सप्तर्षियों के बीच जाता हूँ; मेरी मध्याह्न सन्ध्या का समय हुआ है।
जब मैंने ऐसे कहा, तब भुशुण्डि कल्पवृक्ष से उठ खड़ा हुआ। उसने सुवर्ण का पात्र मोती और रत्नों से भरा और अर्घ्यपाद्य से पूजन किया। जैसे सदाशिव की पूजा करते हैं, वैसे ही उसने चरणों से लेकर मस्तक पर्यन्त मेरा पूजन किया और बहुत नम्र होकर प्रणाम किया। मैंने भी उसको प्रणाम किया। इस प्रकार परस्पर नमस्कार करके मैं वहाँ से उठ खड़ा हुआ और आकाशमार्ग को चला। जैसे पक्षी उड़ता है, वैसे ही मैं उड़ा और वह भी मेरे साथ उड़ा। परस्पर हम दोनों हाथ मिलाये जब एक योजन पर्यन्त चले गये, तब मैंने उससे कहा, हे साधो! तुम अब यहाँ से लौट जाओ। इस प्रकार बारम्बार कहकर मैंने उसको रोका और मैं चला गया। जब तक मैं उसको देख पड़ता रहा, तब तक वह देखता रहा। जब मैं न दिखा, तब वह अपने स्थान में जा बैठा। मैं सप्तर्षियों के मण्डल में जा पहुँचा और अरुन्धती ने मेरा पूजन किया।
हे राम! भुशुण्डि के आश्चर्यजनक वचन मैंने तुमको सुनाये। अब भी सुमेरु के शिखर पर उस कल्पवृक्ष की लता में वह कल्याणरूप वैसे ही स्थित है। वह शान्तिरूप मान करने के योग्य और सदा समाधिस्थ है। हे राम! यह मेरा और उसका समागम सतयुग के दो सौ वर्ष व्यतीत होने पर हुआ था। अब सतयुग बीत गया और त्रेतायुग चल रहा है, जिसमें तुम उपजे हो। हे राम! अभी आठ वर्ष पहले मेरा और उसका फिर समागम हुआ था। वह उसी वृक्षलता पर है। हे राम! यह इतिहास जो मैंने तुमसे कहा है, सो परम उत्तम है। जब इसको विचारोगे, तब संसारभ्रम निवृत्त हो जायगा। मुनि वशिष्ठ और भुशुण्डि की कथा को जो निर्मल बुद्धि से विचारेगा, वह भवरूप संसार के भय से छूट जायगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्यु पाख्यानसमाप्तिर्नाम त्रयोविंशतितमस्सर्गः ॥ २३ ॥
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६
वशिष्ठजी बोले, हे अनघ ! यह जो मैंने तुमसे भुशुण्डि का वृत्तान्त कहा, इसे बोध करके भुशुण्डि महासंकट से तरा है। इस दशा को तुम भी आश्रय करके प्राणों की युक्ति से अभ्यास करो। तब तुम भी भुशुण्डि की नांई भवसमुद्र के पार होगे। जैसे भुशुण्डि ने ज्ञानयोग द्वारा पाने के योग्य पद पाया है, वैसे ही तुम भी पाओ और जैसे प्राण-अपान के अभ्यास से भुशुण्डि को परमतत्त्व प्राप्त हुआ, वैसे ही तुम भी अभ्यास करके पाओगे। विज्ञानदृष्टि जो तुमने सुनी है, उसकी ओर चित्त को लगाकर आत्मपद को पाओ, फिर जैसी इच्छा हो, वैसा करो।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! पृथ्वी में आपके ज्ञानरूपी सूर्य की किरणों के प्रकाश से मेरे हृदय से अज्ञानरूपी तम दूर हो गया और अब प्रबुद्ध होकर अपने आनन्दरूप में स्थित हुआ हूँ। मैंने जानने योग्य पद को जान लिया, मानो दूसरा वशिष्ठ हो गया हूँ। हे भगवन् ! यह भुशुण्डि का चरित्र आपने परमार्थबोध के निमित्त कहा, अब, मेरा प्रश्न यह है कि रक्त, मांस और अस्थि का शरीररूपी गृह किसने रचा है, कहाँ से उपजा है, कैसे स्थित हुआ है और कौन इसमें स्थित है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! परमार्थतत्त्व के बोध और दुःख की निवृत्त के अर्थ ये मेरे वचन हैं, सुनो। अस्थि इस शरीररूपी गृह का खम्भा है और इसके नव द्वार हैं। रक्त-मांस से जो यह लेपन किया है, सो किसी ने बनाया नहीं आभासमात्र है और मिथ्या भ्रम से भासित होता है। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से भासित हो, वैसे ही असतरूप यह शरीर भी भ्रम से भासित होता है। हे राम ! जब तक अज्ञान है, तब तक देह सत्य भासित होता है, और जब ज्ञान होता है, तब देह असतरूप भासित होता है। जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न के पदार्थ सत्य जान पड़ते हैं और जाग्रतकाल में स्वप्न असत्य लगता है, वैसे अज्ञानकाल में अज्ञान के देहादिक पदार्थ सत्य लगते हैं, और ज्ञानकाल में असत्य हो जाते हैं। जैसे जल में बुलबुला जल के अज्ञान से सत्य लगता है और जल के जाने से असत्य लगता है, या सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी दिखती है, वैसे ही आत्मा में देह की भावना होती है। हे राम ! जो कुछ जगत्-