योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 869, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
का दर्शन हुआ। हे साधो! अब सप्तर्षियों के बीच जाता हूँ; मेरी मध्याह्न सन्ध्या का समय हुआ है।
जब मैंने ऐसे कहा, तब भुशुण्डि कल्पवृक्ष से उठ खड़ा हुआ। उसने सुवर्ण का पात्र मोती और रत्नों से भरा और अर्घ्यपाद्य से पूजन किया। जैसे सदाशिव की पूजा करते हैं, वैसे ही उसने चरणों से लेकर मस्तक पर्यन्त मेरा पूजन किया और बहुत नम्र होकर प्रणाम किया। मैंने भी उसको प्रणाम किया। इस प्रकार परस्पर नमस्कार करके मैं वहाँ से उठ खड़ा हुआ और आकाशमार्ग को चला। जैसे पक्षी उड़ता है, वैसे ही मैं उड़ा और वह भी मेरे साथ उड़ा। परस्पर हम दोनों हाथ मिलाये जब एक योजन पर्यन्त चले गये, तब मैंने उससे कहा, हे साधो! तुम अब यहाँ से लौट जाओ। इस प्रकार बारम्बार कहकर मैंने उसको रोका और मैं चला गया। जब तक मैं उसको देख पड़ता रहा, तब तक वह देखता रहा। जब मैं न दिखा, तब वह अपने स्थान में जा बैठा। मैं सप्तर्षियों के मण्डल में जा पहुँचा और अरुन्धती ने मेरा पूजन किया।
हे राम! भुशुण्डि के आश्चर्यजनक वचन मैंने तुमको सुनाये। अब भी सुमेरु के शिखर पर उस कल्पवृक्ष की लता में वह कल्याणरूप वैसे ही स्थित है। वह शान्तिरूप मान करने के योग्य और सदा समाधिस्थ है। हे राम! यह मेरा और उसका समागम सतयुग के दो सौ वर्ष व्यतीत होने पर हुआ था। अब सतयुग बीत गया और त्रेतायुग चल रहा है, जिसमें तुम उपजे हो। हे राम! अभी आठ वर्ष पहले मेरा और उसका फिर समागम हुआ था। वह उसी वृक्षलता पर है। हे राम! यह इतिहास जो मैंने तुमसे कहा है, सो परम उत्तम है। जब इसको विचारोगे, तब संसारभ्रम निवृत्त हो जायगा। मुनि वशिष्ठ और भुशुण्डि की कथा को जो निर्मल बुद्धि से विचारेगा, वह भवरूप संसार के भय से छूट जायगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्यु पाख्यानसमाप्तिर्नाम त्रयोविंशतितमस्सर्गः ॥ २३ ॥