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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 870, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 870

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६

वशिष्ठजी बोले, हे अनघ ! यह जो मैंने तुमसे भुशुण्डि का वृत्तान्त कहा, इसे बोध करके भुशुण्डि महासंकट से तरा है। इस दशा को तुम भी आश्रय करके प्राणों की युक्ति से अभ्यास करो। तब तुम भी भुशुण्डि की नांई भवसमुद्र के पार होगे। जैसे भुशुण्डि ने ज्ञानयोग द्वारा पाने के योग्य पद पाया है, वैसे ही तुम भी पाओ और जैसे प्राण-अपान के अभ्यास से भुशुण्डि को परमतत्त्व प्राप्त हुआ, वैसे ही तुम भी अभ्यास करके पाओगे। विज्ञानदृष्टि जो तुमने सुनी है, उसकी ओर चित्त को लगाकर आत्मपद को पाओ, फिर जैसी इच्छा हो, वैसा करो।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! पृथ्वी में आपके ज्ञानरूपी सूर्य की किरणों के प्रकाश से मेरे हृदय से अज्ञानरूपी तम दूर हो गया और अब प्रबुद्ध होकर अपने आनन्दरूप में स्थित हुआ हूँ। मैंने जानने योग्य पद को जान लिया, मानो दूसरा वशिष्ठ हो गया हूँ। हे भगवन् ! यह भुशुण्डि का चरित्र आपने परमार्थबोध के निमित्त कहा, अब, मेरा प्रश्न यह है कि रक्त, मांस और अस्थि का शरीररूपी गृह किसने रचा है, कहाँ से उपजा है, कैसे स्थित हुआ है और कौन इसमें स्थित है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! परमार्थतत्त्व के बोध और दुःख की निवृत्त के अर्थ ये मेरे वचन हैं, सुनो। अस्थि इस शरीररूपी गृह का खम्भा है और इसके नव द्वार हैं। रक्त-मांस से जो यह लेपन किया है, सो किसी ने बनाया नहीं आभासमात्र है और मिथ्या भ्रम से भासित होता है। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से भासित हो, वैसे ही असतरूप यह शरीर भी भ्रम से भासित होता है। हे राम ! जब तक अज्ञान है, तब तक देह सत्य भासित होता है, और जब ज्ञान होता है, तब देह असतरूप भासित होता है। जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न के पदार्थ सत्य जान पड़ते हैं और जाग्रतकाल में स्वप्न असत्य लगता है, वैसे अज्ञानकाल में अज्ञान के देहादिक पदार्थ सत्य लगते हैं, और ज्ञानकाल में असत्य हो जाते हैं। जैसे जल में बुलबुला जल के अज्ञान से सत्य लगता है और जल के जाने से असत्य लगता है, या सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी दिखती है, वैसे ही आत्मा में देह की भावना होती है। हे राम ! जो कुछ जगत्-