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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 871, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 871

६० ❇ योगवाशिष्ठ ❇

प्रपंच भासित होता है वह सब आभासमात्र है और अज्ञान से भासित होता है और 'अहं', 'त्वं' आदिक कल्पना सब मनोमात्र मन में फुरती हैं । तुम जो कहते हो कि देह अस्थि और मांस का गृह रचा है, सो अस्थि-मांस से नहीं रचा, केवल संकल्पमात्र है । संकल्प से भासित होता है और संकल्प के अभाव में देह नहीं पाई जाती । हे राम ! स्वप्न में जो देह रखकर दिशा, तट, पर्वत इत्यादि तुम देखते फिरते हो, जाग्रत् में वह तुम्हारी देह कहाँ जाती है ? जो देह सत्य होती तो जाग्रत् में भी रहती । जीव मनोराज्य से स्वर्ग को जाता है तथा सुमेरु और भूमिलोक में फिरता है । हे राम ! इन स्थानों में जैसे मन का फुरना देह होकर भासित होता है सो असत्यरूप है, वैसे ही यह शरीर मन के स्फुरणमात्र है, इससे असत्य जानो ।

यह मेरा धन है, यह मेरी देह है, यह मेरा देश है इत्यादिक कल्पना मन की रची हुई है-सबका बीज चित्त ही है । हे राम ! जगत् को दीर्घकाल का सपना जानो या दीर्घ चित्त का भ्रम जानो अथवा दीर्घ मनोराज्य जानो । वास्तव में जगत् कुछ नहीं है । जब जीव अपने वास्तव परमात्मस्वरूप को अभ्यास करके जानता है, तब जगत् असत्य-रूप भासित होता है । हे राम ! मैंने पहले भी तुमसे ब्रह्माजी के वचनों से कहा है कि सब जगत् मन का रचा हुआ है-इससे संकल्पमात्र है । चिरकाल के अभ्यास से सत् प्रतीत होता है । जब दृढ़ प्रयत्न से पुरुष को आत्म-अभ्यास हो तब असत्य जान पड़ेगा । हे राम ! जो भावना हृदय में दृढ़ होती है, उसका अभाव भी सुगम नहीं होता; पर जब उसके विपरीत भावना का अभ्यास करिये, तब उसका अभाव हो जाता है । यह मैं हूँ, यह और है इत्यादिक कलना जो हृदय में दृढ़ हो रही है, जब इसके विपरीत आत्मभावना हो, तब वह मिटे और सर्वत्र सब आत्मा ही देख पड़े । हे राम ! जिसकी तीव्र भावना होती है, वही रूप उसका हो जाता है । जैसे कामी पुरुष को सुन्दर स्त्री की कामना रहती है, वैसे ही जीव को जब आत्मपद की चिन्ता रहे; तब वही रूप होता है । जैसे कीट भृङ्गी हो जाता है और जैसे दिन में जिस व्यापार

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