योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 872, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❄ निर्वाण प्रकरण ❄ ६१
का अभ्यास होता है तो रात्रि को स्वप्न में भी वही देख पड़ता है, वैसे ही जीव को जिसका दृढ़ अभ्यास होता है, वही अनुभव होता है। जैसे सूर्य आकाश में तपता है और मरुस्थल में जल होकर भासित होता है, पर वहाँ जल का अभाव है, वैसे ही भाव से रहित पृथ्वी आदिक पदार्थ भ्रम से भावरूप भासित होते हैं। जैसे दृष्टि-दोष से आकाश में तारे मोर-पुच्छ जैसे भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञान से यह जगज्जाल भासित होता है। हे राम! यह सब जगत् आभासरूप है। स्वरूप के प्रमाद से जीव भय और दुःख को प्राप्त होता है, पर वह जब स्वरूप को जानता है, तब भ्रम, भय और दुःख से रहित होता है। जैसे स्वप्न में चित्त के भ्रम से सिंहों से भय पाता है, और जब जाग्रत् स्वरूप में चित्त आता है तब सिंह का भय निवृत्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से निर्भय होता है। जब वैराग्य का अभ्यास करके जीव निर्मल आत्म-पद पा जाता है, तब फिर क्षोभ को नहीं प्राप्त होता और रागद्वेष-रूपी मल उसको नहीं स्पर्श करते। जैसे ताँबा जब पारस के स्पर्श से सुवर्ण होता है, तब वह ताँबे के भाव को नहीं ग्रहण करता, वैसे ही जीव फिर मलिन नहीं होता। अहं, त्वं आदिक जो कुछ जगत् भासता है, वह सब आभासमात्र ही है।
हे राम! प्रथम सत्य और असत्य को जानकर असत्य का निरादर करो और सत्य का अभ्यास करो। तब चित्त सब कल्पनाओं से रहित होकर शान्तपद प्राप्त होता है। जो तत्त्वज्ञान से सम्यक्दर्शी हुआ है, उसको जगत् के इष्ट पदार्थ पाने से हर्ष नहीं होता और अनिष्ट को पाने मे शोक नहीं होता। वह न किसी की स्तुति करता है, न किसी की निंदा। वह हृदय में शीतल और शान्तरूप हो जाता है। जब कोई बान्धव मृतक हो, तब उससे दुःख क्यों होता है? वह तो अवश्य ही मरता। जब अपनी मृत्यु आवे, तब अदृश्य शरीर छूटता है। फिर वृथा क्यों संताप होता है। जब सम्पदा प्राप्त हो तो उससे उसे हर्ष नहीं होता; क्योंकि जो कुछ भोगना था सो भोगा; हर्ष किससे हुआ? दुःख आकर प्राप्त हो, तब शोक क्यों करना? शरीर का व्यवहार सुख-